चाँदनी रात मैथिलीशरण गुप्त के खंडकाव्य ‘पंचवटी’ का अंश है। इसमें पंचवटी में चाँदनी रात की सुंदरता का वर्णन है – चंद्रमा की चंचल किरणें जल-थल में खेल रही हैं, धरती और आकाश में स्वच्छ चाँदनी बिछी है, मंद पवन से पेड़ झूम रहे हैं। इसी शांत रात में पर्णकुटी के सामने शिला पर बैठा एक धनुर्धर (लक्ष्मण) जागकर पहरा दे रहा है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: मैथिलीशरण गुप्त (जन्म ३ अगस्त १८८६, चिरगाँव, झाँसी, उ.प्र.; मृत्यु १२ दिसंबर १९६४) – खड़ी बोली के महत्त्वपूर्ण कवि; रचनाओं में मानवीय संवेदना और विशेषतः नारी के प्रति करुणा।
प्रमुख कृतियाँ: साकेत (महाकाव्य); यशोधरा, जयद्रथ वध, पंचवटी, भारत-भारती (खंडकाव्य); रंग में भंग, राजा-प्रजा (नाटक)।
विधा – खंडकाव्य: मानव जीवन की किसी एक घटना की प्रधानता; प्रासंगिक कथाओं को स्थान नहीं।
सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और थल में खेल रही हैं; धरती (अवनि) और आकाश (अंबर) में स्वच्छ चाँदनी बिछी है।
धरती हरी घास की नोकों से अपनी खुशी (पुलक/रोमांच) प्रकट कर रही है; मंद पवन के झोंकों से पेड़ भी झूम रहे हैं।
रात बहुत स्वच्छ और निस्तब्ध (शांत) है; सुगंधित हवा धीरे-धीरे बह रही है – कोई दिशा आनंद से खाली नहीं।
नियति नटी (प्रकृति रूपी नर्तकी) के कार्य अब भी चल रहे हैं, पर बहुत शांत और चुपचाप।
तारों की कल्पना: सबके सो जाने पर वसुंधरा (धरती) मोती (ओस/तारे) बिखेर देती है और सबेरा होने पर सूर्य उन्हें बटोर लेता है।
सूर्य संध्या को अपना विश्राम देने वाला श्याम रूप दे जाता है, जिससे उसका नया रूप छलकता है।
पंचवटी की छाया में सुंदर पर्णकुटी है; उसके सामने स्वच्छ शिला पर एक धीर-वीर, निडर धनुर्धर बैठा है।
सारा संसार सो रहा है, पर वह जाग रहा है – कामदेव जैसा सुंदर होते हुए भी योगी-सा दिखाई देता है।
महत्वपूर्ण शब्द
चारु – सुंदर
अवनि – धरती; अंबर – आकाश
पुलक – रोमांच, खुशी
निस्तब्ध – बिलकुल शांत
निशा – रात
कार्य-कलाप – गतिविधि
कुटीर – झोंपड़ी, कुटिया
धनुर्धर – तीरंदाज
कुसुमायुध – कामदेव, अनंग
भाषा अध्ययन
पर्यायवाची शब्द (भाषा बिंदु): तरु – पेड़, वृक्ष; वसुंधरा – धरती, पृथ्वी; चंद्र – चाँद, शशि; कृषक – किसान, हलधर; उद्यान – बाग, उपवन; अरण्य – जंगल, वन।
अनुप्रास: ‘चारु चंद्र की चंचल किरणें’।
मानवीकरण: किरणें खेल रही हैं, धरती पुलक प्रकट करती है, पेड़ झूम रहे हैं।
उत्प्रेक्षा: ‘मानो झूम रहे हैं तरु भी’।
रूपक: ‘नियति नटी’।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : तारों के उदित और अस्त होने के बारे में कल्पना।
सबके सोने पर धरती मोती बिखेर देती है (तारे उदित होते हैं); सबेरा होने पर सूर्य उन्हें बटोर लेता है (तारे अस्त होते हैं)।
Q2. चाँदनी रात की चार विशेषताएँ लिखिए।
चंद्र की चंचल किरणें जल-थल में खेल रही हैं।
धरती और आकाश में स्वच्छ चाँदनी बिछी है।
रात निस्तब्ध और शांत है।
सुगंधित मंद हवा बह रही है, पेड़ झूम रहे हैं।
Q3. सरल अर्थ लिखिए : ‘चारु चंद्र की चंचल किरणें … मंद पवन के झोंकों से।’
सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और थल पर खेल रही हैं। धरती से आकाश तक स्वच्छ चाँदनी फैली हुई है। धरती हरी घास की नोकों के रूप में अपना रोमांच प्रकट कर रही है और मंद हवा के झोंकों से पेड़ भी मानो खुशी से झूम रहे हैं।
Q4. पर्णकुटी के सामने बैठे धनुर्धर का वर्णन कीजिए।
वह पंचवटी की पर्णकुटी के सामने स्वच्छ शिला पर बैठा है।
धीर, वीर और निर्भीक मन वाला है।
सारा संसार सो रहा है, फिर भी वह जाग रहा है।
कामदेव जैसा सुंदर होकर भी योगी जैसा संयमी दिखता है।
Q5. कल्पना विस्तार : ‘पुलक प्रगट करती है धरती हरित तृणों की नोकों से।’
चाँदनी रात में धरती बहुत प्रसन्न है। जैसे खुशी में मनुष्य के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, वैसे ही धरती पर उगी हरी घास की नोकें खड़ी हैं। कवि को लगता है कि ये तिनके धरती का रोमांच हैं। इस कल्पना से प्रकृति सजीव और आनंदमय दिखाई देती है।
परीक्षा टिप
कविता के अलंकार (अनुप्रास, मानवीकरण, उत्प्रेक्षा) और खंडकाव्य की परिभाषा याद रखें; सरल अर्थ में हर पंक्ति का भाव क्रम से लिखें।
बिल्ली का बिलुंगड़ा राजेंद्र लाल हांडा की हास्य कहानी है। लेखक के घर में चूहों से छुटकारा पाने के लिए बिल्ली पाली गई, पर कुछ समय बाद बिल्ली ही चोरी-छिपे दूध-दही खाकर परेशान करने लगी। नौकर अमरू उसे बोरी में बंद करके दूर छोड़ने चला, तो दिल्ली में बच्चे उठाए जाने की अफवाहों के कारण लोगों ने समझा कि बोरी में बच्चा है। भीड़ और थानेदार के सामने बोरी खुली तो बिल्ली का बिलुंगड़ा छलाँग मारकर भाग गया – गलतफहमी से पैदा हुई हँसी ही कहानी का सार है।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: राजेंद्र लाल हांडा – जाने-माने कथाकार; पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित; सामयिक विषयों पर लिखी रचनाएँ सामाजिक समस्याओं को उजागर करती हैं।
विधा – हास्य कहानी: जीवन की किसी घटना का रोचक, प्रवाही वर्णन, हल्के-फुल्के हँसी के अंदाज में।
पहले घरों में बिल्ली का आना बुरा समझा जाता था, पर अब ‘जिससे काम चले, वही विचार ठीक’।
घर में चूहे बहुत हो गए; लोहे के ढोल भी काम न आए; मित्रों से परामर्श के बाद बिल्ली पाली गई।
बिल्ली की खूब खातिर हुई; उसने चूहों का सफाया कर दिया; वह जूठन खाती, इसलिए कोई खर्च नहीं।
दो महीने बाद घर वाले बिल्ली से तंग आ गए – वह रसोई के पास दुबककर बैठती और मौका पाकर चोरी करती; एक दिन रात का जमाया दही खा गई।
नौकर अमरू ने खाली बोरी में दो रोटियाँ डालकर बिल्ली को पकड़ लिया; सुबह उसे दूर ‘भूली भटियारिन’ की तरफ छोड़ने भेजा गया।
दिल्ली (करौल बाग) में उन दिनों बच्चे उठाए जाने की सनसनी थी – जमुना पुल पर बोरियों में बच्चे पकड़े जाने की खबरें, संसद-नगरपालिका में सवाल।
बोरी हिलती देखकर लोगों को शक हुआ; पचासों लोग इकट्ठा हो गए, थानेदार और सिपाही बुलाए गए; भीड़ अमरू को पीटना चाहती थी।
अल्पभाषी और मसखरा अमरू पहले चुप रहा, फिर नम्रता से बोला – पहले देख तो लें, बोरी में है क्या?
बोरी खुलते ही बिल्ली का बिलुंगड़ा भाग गया; झेंप मिटाने के लिए थानेदार ने एक ताँगेवाले की पीठ पर बेंत मार दी।
सीख: अफवाह और भीड़ की मानसिकता में बिना सच जाने निर्णय नहीं लेना चाहिए।
महत्वपूर्ण शब्द
बिलुंगड़ा – बिल्ली का बच्चा (हास्य भाव में)
कारगर – उपयोगी, प्रभावी
चुनाँचे – इसलिए
मसखरा – हँसोड़
गिरोह – समूह, गैंग
दुत्कारना – तिरस्कार करना
झेंप मिटाना – शर्मिंदगी छिपाना
भाषा अध्ययन
मुहावरे: सिर चढ़ जाना – उद्दंडता की छूट देना; टूट पड़ना – झपट पड़ना; परामर्श करना – राय लेना; एक न चलना – कोई उपाय सफल न होना।
विलोम शब्द (भाषा बिंदु): समझदार – नासमझ; अल्पभाषी – बहुभाषी/वाचाल; पुरानी – नई; समर्थन – विरोध; दुर्लभ – सुलभ; भौतिक – आध्यात्मिक; शुष्क – आर्द्र; अपव्यय – मितव्यय।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. घर में बिल्ली पालने के कारण लिखिए।
घर में चूहे बहुत हो गए थे; लोहे के ढोल बनवाने का उपाय भी असफल रहा, इसलिए मित्रों की सलाह पर बिल्ली पाली गई।
Q2. कहानी के प्रमुख पात्र लिखिए।
लेखक, नौकर अमरू, बिल्ली, भीड़ के लोग और थानेदार।
Q3. बिल्ली के रवैये में आया परिवर्तन स्पष्ट कीजिए।
पहले वह घर वालों के आगे-पीछे घूमती और चूहों का सफाया करती थी।
घर वालों का व्यवहार बदलने पर उसने भी रवैया बदला।
वह रसोई के पास कोने में दुबककर बैठने लगी।
मौका मिलते ही दूध-दही चुराकर खाने लगी।
Q4. लोगों को अमरू पर संदेह क्यों हुआ?
उन दिनों दिल्ली में बच्चे उठाए जाने की सनसनी फैली थी।
अखबारों में बोरियों में बच्चे पकड़े जाने की खबरें छपी थीं।
अमरू की बोरी अंदर से हिल रही थी।
वह चुप रहा, इसलिए लोगों ने उसे बच्चा चुराने वाले गिरोह का सदस्य समझ लिया।
Q5. स्वमत : ‘प्राणी हमसे कहते हैं – जियो और जीने दो।’
धरती पर सभी प्राणियों को जीने का अधिकार है।
पालतू जानवरों से स्नेह करें, पर उनकी जिम्मेदारी भी लें।
बेघर या अनचाहे जानवरों को सताना ठीक नहीं; उनके लिए सुरक्षित व्यवस्था करें।
प्राणियों के प्रति दया हमारी मानवता की पहचान है।
परीक्षा टिप
कहानी का क्रम (चूहे → बिल्ली → चोरी → बोरी → भीड़ → बिल्ली भागी) याद रखें; हास्य कहानी की परिभाषा और मुहावरों के वाक्य प्रयोग अक्सर पूछे जाते हैं।
कबीर (पूरक पठन) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का आलोचनात्मक गद्य है, जिसमें संत कबीर के व्यक्तित्व, उपदेश, साधना और स्वभाव का रोचक विवेचन है। द्विवेदी जी कहते हैं कि हिंदी साहित्य के हजार वर्षों में कबीर जैसा व्यक्तित्व वाला लेखक नहीं हुआ – मस्ती, फक्कड़ स्वभाव, अक्खड़ता और अखंड आत्मविश्वास उन्हें अद्वितीय बनाते हैं। उनकी वाणी का अनुकरण नहीं हो सकता।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: हजारी प्रसाद द्विवेदी (जन्म १९ अगस्त १९०७, दुबे का छपरा, बलिया, उ.प्र.; मृत्यु १९ मई १९७९) – हिंदी के शीर्षस्थ साहित्यकार; उच्चकोटि के निबंधकार, उपन्यासकार, आलोचक, चिंतक और शोधकर्ता।
प्रमुख कृतियाँ: अशोक के फूल, कल्पलता (निबंध); बाणभट्ट की आत्मकथा, चारु चंद्रलेख, पुनर्नवा (उपन्यास); कबीर, हिंदी साहित्य की भूमिका, मेघदूत : एक पुरानी कहानी (आलोचना और इतिहास)।
विधा – आलोचना: किसी विषय-वस्तु के गुण-दोष और उपयुक्तता का विवेचन।
महिमा में कबीर का एक ही प्रतिद्वंद्वी है – तुलसीदास; दोनों भक्त थे, पर स्वभाव, संस्कार और दृष्टिकोण में एकदम भिन्न।
कबीर की वाणी वह लता है जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ने से अंकुरित हुई।
उत्तर के हठयोगी ‘टूट जाता था पर झुकता न था’, दक्षिण के भक्त ‘झुक जाता था पर टूटता न था’।
कबीर भटकते जीवों पर करुणा से कातर नहीं होते थे, बल्कि और कठोर होकर फटकारते थे।
अक्खड़ता उनका सर्वप्रधान गुण नहीं; योगी/अवधूत को संबोधित करते समय वह चरम पर होती है।
वे फक्कड़ और सत्य के जिज्ञासु थे – ‘हम घर जारा अपना, लिया मुराड़ा हाथ’ – घर जलाकर (मोह त्यागकर) निकले और उसी को साथी बनाने को तैयार थे जो अपना घर जलवा सके।
मस्त-मौला के लक्षण: पुराने कृत्यों का हिसाब नहीं रखता, वर्तमान कर्मों को सर्वस्व नहीं समझता, भविष्य में सब झाड़-फटकारकर निकल जाता है, दुनिया के माप-जोख से सफलता नहीं नापता।
योग-प्रक्रिया को डटकर अनुभव किया, पर जँची नहीं – केवल क्रिया बाह्य है, बिना ज्ञान के योग व्यर्थ।
उनकी घर-फूँक मस्ती, फक्कड़पन और अक्खड़ता अखंड आत्मविश्वास का परिणाम थी; वे वीर साधक थे – राम से सौदा ‘सिर देकर’ ही होता है।
प्रेम किसी खेत में नहीं उपजता, किसी हाट में नहीं बिकता – राजा हो या प्रजा, शर्त एक ही है: सिर देना (अहंकार का त्याग)।
महत्वपूर्ण शब्द
फक्कड़ – मस्त, बेपरवाह
अक्खड़ता – स्पष्ट और रूखा स्वभाव, हठ
अवधूत – संन्यासी, योगी
मुराड़ा – जलती लकड़ी, मशाल
तहकीक – जाँच-पड़ताल
क्रांतदर्शी – दूर तक देखने वाला
कातर – व्याकुल, दुखी
भाषा अध्ययन
विधा की विशेषता: उद्धरणों (कबीर की साखी-पद) के साथ विवेचन; तत्सम-तद्भव और उर्दू शब्दों का मिश्रण।
मुहावरे: झाड़-फटकारकर चल देना – सब छोड़कर निकल जाना; सिर पर कफन बाँधना – मरने को तैयार रहना; घर फूँकना – सब कुछ त्याग देना; दिल जमना – मन लगना।
विलोम: कठोर – कोमल; आसक्त – विरक्त; बाह्य – आंतरिक; सफलता – असफलता।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : मस्त-मौला के लक्षण।
पुराने कृत्यों का हिसाब नहीं रखता; वर्तमान कर्मों को सर्वस्व नहीं समझता; भविष्य में सब झाड़-फटकारकर निकल जाता है; दुनिया के माप-जोख से अपनी सफलता का हिसाब नहीं करता।
Q2. उत्तर के हठयोगियों और दक्षिण के भक्तों में अंतर लिखिए।
हठयोगी टूट जाता था पर झुकता न था, उसके लिए ऊँच-नीच की भावना मजाक और आक्रमण का विषय थी; भक्त झुक जाता था पर टूटता न था, उसके लिए वह मर्यादा और स्फूर्ति का विषय थी।
Q3. कबीर के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।
फक्कड़ और मस्त-मौला स्वभाव।
सत्य के जिज्ञासु, मोह-ममता से मुक्त।
अखंड आत्मविश्वास और अक्खड़ता।
बाहरी आडंबर और केवल क्रिया वाले योग के विरोधी; ज्ञान और प्रेम के साधक।
Q4. ‘कबीर सौदा राम सौं, सिर बिन कदै न होय’ – आशय स्पष्ट कीजिए।
ईश्वर मुफ्त की बातों से नहीं मिलता।
उसके लिए अहंकार और सर्वस्व का त्याग (सिर देना) आवश्यक है।
साधना एक कठिन संग्राम है, जहाँ कोई वीर ही टिक सकता है।
प्रेम की यह शर्त राजा-प्रजा सबके लिए समान है।
Q5. विचार लिखिए : ‘कबीर संत ही नहीं, समाज सुधारक भी थे।’
उन्होंने जाति-पाँति और ऊँच-नीच का विरोध किया।
हिंदू-मुसलमान दोनों के आडंबरों पर प्रहार किया।
सरल लोकभाषा में सच्चे प्रेम और मानवता का संदेश दिया।
आज भी उनके दोहे समाज को दिशा देते हैं।
परीक्षा टिप
यह पूरक पठन है – मस्त-मौला के लक्षण, हठयोगी बनाम भक्त का अंतर और द्विवेदी जी की कृतियाँ याद रखें।
किताबें गुलजार की नई कविता है। इसमें किताबों का मानवीकरण करके कवि बताते हैं कि कंप्यूटर के युग में लोग किताबों से दूर हो गए हैं। बंद अलमारी के शीशों से किताबें बड़ी हसरत से झाँकती हैं, बेचैन रहती हैं; उनसे जुड़े मूल्य, रिश्ते, पढ़ने का स्वाद और भावनात्मक संबंध खोते जा रहे हैं। ज्ञान तो कंप्यूटर से मिलता रहेगा, पर किताबों में रखे सूखे फूल और महकते रुक्कों से बनने वाले रिश्ते शायद अब नहीं होंगे।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: गुलजार (मूल नाम संपूर्ण सिंह कालरा; जन्म १८ अगस्त १९३६, दीना, झेलम जिला, पंजाब, स्वतंत्रता पूर्व भारत) – कवि, पटकथा लेखक, फिल्म निर्देशक, नाटककार और हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकार।
प्रमुख कृतियाँ: चौरस रात (लघुकथाएँ), रावी पार (कथा संग्रह), रात, चाँद और मैं, एक बूँद चाँद, रात पश्मीने की (कविता संग्रह), खराशें (कविता-कहानी का कोलाज)।
विधा – नई कविता: आधुनिक संवेदना के साथ परिवेश की विविधता को नए शिल्प में व्यक्त करने वाली काव्यधारा।
किताबें बंद अलमारी के शीशों से झाँकती हैं; जिन शामों में उनका साथ होता था, अब वे कंप्यूटर के परदों पर गुजर जाती हैं।
किताबें बेचैन रहती हैं – उन्हें अब ‘नींद में चलने की आदत’ हो गई है।
किताबें जो मूल्य (कदरें) और रिश्ते सुनाती थीं, वे अब घर में नजर नहीं आते; रिश्ते उधड़े-उधड़े हैं।
पन्ना पलटने पर एक सिसकी निकलती है; कई शब्दों के अर्थ गिर पड़े हैं – शब्द बिना पत्तों के सूखे ठूँठ जैसे लगते हैं।
पन्ना पलटने का जो स्वाद था, वह अब उँगली के ‘क्लिक’ में खो गया; किताबों से जो जाती संपर्क (राब्ता) था, वह कट गया है।
पहले किताबें सीने पर रखकर लेटते, गोदी में लेते, घुटनों को रिहल बनाकर पढ़ते और माथे से छूते थे।
ज्ञान (इल्म) आगे भी मिलता रहेगा, पर किताबों में मिलने वाले सूखे फूल, महके रुक्के और किताबें गिरने-उठाने के बहाने बनने वाले रिश्ते शायद अब नहीं होंगे।
केंद्रीय भाव: तकनीक के कारण पुस्तकों और मनुष्य के बीच बढ़ती दूरी की पीड़ा।
महत्वपूर्ण शब्द
हसरत – कामना, इच्छा
सोहबत – संगत
कदरें – मूल्य, मायने
जायका – स्वाद
सफा – पन्ना; अल्फाज – शब्द
राब्ता – संपर्क
जबीं – माथा; इल्म – ज्ञान
रुक्के – चिट्ठी, संदेश पत्र
रिहल – वह स्टैंड जिस पर धर्मग्रंथ रखकर पढ़ा जाता है
किताबों का मानवीकरण कर उनकी बेचैनी और उदासी दिखाई गई है।
पढ़ने का सुख, किताबों से भावनात्मक लगाव और उनसे बनने वाले रिश्ते खो रहे हैं।
उद्देश्य: पाठकों को फिर से किताबों से जोड़ना।
Q5. कल्पना पल्लवन : ‘ग्रंथ हमारे गुरु’।
ग्रंथ बिना कुछ माँगे ज्ञान देते हैं। वे हर समय साथ रहने वाले मित्र और मार्गदर्शक हैं। महापुरुषों के विचार, इतिहास, विज्ञान और जीवन के अनुभव पुस्तकों में सुरक्षित हैं। अच्छी पुस्तकें चरित्र गढ़ती हैं और कठिन समय में सही राह दिखाती हैं। इसलिए ग्रंथों को गुरु मानकर उनका आदर और नियमित अध्ययन करना चाहिए।
परीक्षा टिप
उर्दू शब्दों के अर्थ और मानवीकरण के उदाहरण तैयार रखें; पूरी कविता लिखने की जगह भावार्थ अपने शब्दों में लिखें।
जूलिया रूसी साहित्यकार अंतोन चेखव की कहानी पर आधारित एकांकी है। गृहस्वामी अपनी बच्चों की गवर्नेस (सेविका) जूलिया वासिल्येवना का दो महीने का वेतन हिसाब करते हुए तरह-तरह की झूठी कटौतियाँ करता है और ८० रूबल की जगह केवल ११ रूबल देता है। जूलिया विरोध करने के बजाय ‘धन्यवाद’ कहती है। तब गृहस्वामी बताता है कि यह क्रूर मजाक उसे सबक सिखाने के लिए था और पूरे ८० रूबल देकर समझाता है कि अन्याय के विरुद्ध लड़ना ही होगा – इस संसार में दब्बू और रीढ़रहित लोगों के लिए कोई स्थान नहीं।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: अंतोन चेखव (जन्म २९ जनवरी १८६०, तगानरोग, रूस; मृत्यु १५ जुलाई १९०४) – महान रूसी कथाकार और नाटककार; कहानियों में सामाजिक कुरीतियों का व्यंग्यात्मक चित्रण।
प्रमुख कृतियाँ: ए ड्रीरी स्टोरी, द वाइफ (उपन्यास); अन्ना ऑन द नेक, अ बैड बिजनेस, द बर्ड मार्केट, ओल्ड एज, ग्रीषा (कहानी); इवानोव, द चैरी आर्चर्ड (नाटक)।
विधा – एकांकी: आकार छोटा, एक ही कथा; कथा और संवाद शुरू से अंत तक रोचक।
तय वेतन ४० रूबल महीना था, पर गृहस्वामी ३० बताता है; दो महीने पाँच दिन को ‘ठीक दो महीने’ कहता है।
कटौतियाँ: नौ इतवार और तीन छुट्टियाँ (१२ रूबल); कोल्या की बीमारी, दाँत दर्द आदि के सात नागे – कुल १९; ६० में से बचे ४१।
फिर कीमती प्याली तोड़ने के २, बच्चे की फटी जैकेट के १०, नौकरानी द्वारा चुराए गए वान्या के जूतों के ५ और कभी न दिए गए १० रूबल ‘अग्रिम’ – कुल २७ घटाकर १४।
मालकिन से मिले ३ रूबल भी काटे – अंत में ११ रूबल।
जूलिया हर बार दबे स्वर में ‘जी हाँ’ कहती है, रोती है, पर विरोध नहीं करती; पैसे लेकर ‘धन्यवाद’ भी कहती है।
कारण पूछने पर बताती है – पहले जहाँ काम किया, उन्होंने एक पैसा भी नहीं दिया; आप कुछ तो दे रहे हैं।
गृहस्वामी माफी माँगता है – यह छोटा-सा क्रूर मजाक सबक सिखाने के लिए था – और पूरे ८० रूबल देता है।
संदेश: भला कहलाने के लिए दब्बू, भीरु और बोदा बनना जरूरी नहीं; अपने अधिकार और न्याय के लिए सजग रहकर कठोर संसार से लड़ना होगा।
महत्वपूर्ण शब्द
गवर्नेस – बच्चों की देखभाल करने और पढ़ाने वाली सेविका
रूबल – रूस की मुद्रा
नागा – वह दिन जिस दिन काम न किया हो
निर्मम – निर्दयी
भीरु – डरपोक
बोदा – सुस्त, मूर्ख
ठग लेना (मुहावरा) – धोखा देना
हड़प लेना (मुहावरा) – बेईमानी से दूसरे की वस्तु हजम कर जाना
भाषा अध्ययन
उदाहरण: ‘अरे ! क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ ?’; ‘मोहन बोला, “तुमने जो कुछ कहा, ठीक है।”’
ऐ सखि ! (पूरक पठन) में अमीर खुसरो की मुकरियाँ (कह-मुकरियाँ) हैं। हर मुकरी में एक सखी दूसरी सखी से किसी प्रिय वस्तु का ऐसा वर्णन करती है कि लगता है वह अपने साजन (पति/प्रिय) की बात कर रही है; पर जब सखी पूछती है ‘ऐ सखि साजन ?’ तो वह मुकर जाती है – ‘ना सखि तारा’। इस तरह पहेली और उसका उत्तर एक साथ मिलते हैं। पाठ में तारा, ढोल, लोटा, मक्खी, तोता, चाँद, अंजन, नीर और पाती पर मुकरियाँ हैं।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: अमीर खुसरो (मूल नाम अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद खुसरो; जन्म १२५३, पटियाली, एटा, उ.प्र.; मृत्यु १३२५) – हिंदी, हिंदवी और फारसी में एक साथ लिखने वाले पहले व्यक्ति; पहेलियों और मुकरियों के लिए प्रसिद्ध।
Q1. मुकरियों के आधार पर विशेषताएँ लिखिए : नीर, अंजन, ढोल।
नीर – सारा संसार जिसे जीवन कहता है, जो क्षण में हृदय की पीड़ा हरता है; अंजन – सदा शोभा बढ़ाने वाला, आँखों से क्षण भर भी अलग न होने वाला; ढोल – जिसके आने पर शादी होती है, जिसके बोल मीठे लगते हैं।
Q2. भावार्थ लिखिए : मुकरी १ (तारा)।
सखी कहती है कि वह रात के समय मेरे पास आता है और सुबह होते ही घर छोड़कर चला जाता है – यह सबसे अनोखा आश्चर्य है। दूसरी सखी पूछती है, क्या यह तेरा साजन है? वह कहती है – नहीं सखी, यह तो तारा है।
Q3. भावार्थ लिखिए : मुकरी ९ (पाती)।
उसके न आने पर सारे सुख भूल जाते हैं।
उसके आने पर अंग-अंग खुशी से खिल उठता है।
उसे छाती से लगाने पर मन को ठंडक मिलती है।
सखी के पूछने पर उत्तर – यह साजन नहीं, प्रिय की चिट्ठी (पाती) है।
Q4. मुकरी विधा की विशेषताएँ लिखिए।
लोकप्रचलित पहेली का एक रूप।
मनोरंजन के साथ बुद्धि की परीक्षा।
प्रश्न और उत्तर दोनों एक ही छंद में।
वर्णन दो अर्थों (साजन और वस्तु) पर लागू होता है।
Q5. प्राकृतिक घटक पर एक पहेली बनाइए।
‘दिन भर चमके, रात को सोए, उसके बिना अँधेरा होए। गरमी देता, फसल पकाए – बोलो कौन, जो पूरब से आए?’ – उत्तर: सूरज।
परीक्षा टिप
नौ मुकरियों के उत्तर (तारा, ढोल, लोटा, मक्खी, तोता, चंद, अंजन, नीर, पाती) क्रम से याद रखें; विशेषता वाली तालिका पूरी करने का प्रश्न आता है।
डॉक्टर का अपहरण डॉ. हरिकृष्ण देवसरे की विज्ञान कथा है। मरीजों की सेवा को परम कर्तव्य मानने वाले डॉक्टर भटनागर एक रात दो बजे बुलावे पर गए और लापता हो गए। महीनों बाद घर के बाहर एक सी.डी. मिली, जिसमें उन्होंने बताया कि दूसरे सौरमंडल के एक ग्रह के लोग उनका अपहरण कर ले गए हैं। वह ग्रह विज्ञान में बहुत आगे है, पर मशीनों के गुलाम लोगों को एक विचित्र सड़न रोग हो रहा है और वे चिकित्साशास्त्र में पिछड़े हैं। कहानी मशीनों और उद्योगों के अंधाधुंध विकास और प्रदूषण के खतरों के प्रति सजग करती है।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: डॉ. हरिकृष्ण देवसरे (जन्म ९ मार्च १९३८; मृत्यु १४ नवंबर २०१३, इंदिरापुरम, गाजियाबाद, उ.प्र.) – प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार; रचनाएँ बच्चों की जिज्ञासा जगाने वाली।
प्रमुख कृतियाँ: खेल बच्चे का, आओ चंदा के देश चलें, मंगल ग्रह में राजू, उड़ती तश्तरियाँ, गिरना स्काईलैब का, दूसरे ग्रहों के गुप्तचर (वैज्ञानिक बाल उपन्यास)।
विधा – विज्ञान कथा: विज्ञान पर आधारित कल्पना का रोचक, प्रवाही वर्णन।
डॉ. भटनागर फीस की चिंता किए बिना रात-बेरात मरीजों के पास जाते थे; उस रात गाउन पहने ही दवाइयों का बैग लेकर गए और लौटे नहीं।
पत्नी ने देखा – वे अपनी कार में नहीं गए; घर के बाहर बड़े पहियों के निशान थे। पुलिस ने गुंडों या डाकुओं पर शक किया; डर फैलने के कारण खबर दबा दी गई।
महीनों बाद फिर पहियों के निशान और श्रीमती भटनागर के नाम एक सी.डी. मिली।
सी.डी. में डॉक्टर ने बताया – वे करोड़ों मील दूर एक अन्य सौरमंडल के ग्रह पर हैं; ब्रह्मांड में हमारे जैसे कई सूर्य और बसे हुए ग्रह हैं – ‘दुनिया में सिर्फ हम ही हैं’ यह भ्रम दूर हुआ।
उस ग्रह के लोगों ने अमरीका में हुए उनके सम्मान और ज्ञान की गुप्त जानकारी जुटाई थी; विचित्र यान में डालकर ले गए; ग्रह के वातावरण के लिए उन्हें प्लास्टिक सूट पहनाया गया।
वहाँ विज्ञान चरमसीमा पर है – आदमी मशीन हो गए, मशीनें ज्यादा और आदमी कम; लोग मशीनों के गुलाम हैं।
पिछड़ने का कारण: लोगों की चमड़ी मोटे प्लास्टिक जैसी, जिस पर हवा-पानी-मिट्टी का असर नहीं; वे बीमार नहीं पड़ते थे, इसलिए चिकित्सा की जरूरत ही नहीं समझी।
अब सड़न रोग से अंग सड़ने लगते हैं; डॉक्टर से अंग प्रत्यारोपण का उपाय चाहते हैं; और डॉक्टरों-वैज्ञानिकों के अपहरण की गुप्त योजना है, जिससे डॉ. भटनागर सहमत नहीं।
चेतावनी: पृथ्वी पर भी कैंसर, हृदय रोग, तनाव, ब्लड शुगर उसी भविष्य के संकेत हैं।
महत्वपूर्ण शब्द
अपहरण – जबरदस्ती उठा ले जाना
लापता – जिसका पता न लगे
सौरमंडल – सूर्य और उसके ग्रहों का परिवार
यान – वाहन (अंतरिक्ष यान)
अंग प्रत्यारोपण – खराब अंग की जगह दूसरा अंग लगाना
हतप्रभ रहना (मुहावरा) – स्तब्ध रह जाना
नामो-निशान मिटना (मुहावरा) – अस्तित्व समाप्त होना
भाषा अध्ययन
विज्ञान संबंधी शब्द: सौरमंडल, ग्रह, ब्रह्मांड, यान, वायरलेस, सी.डी., अंग प्रत्यारोपण।
मुहावरे: विरोध मोल लेना – दुश्मनी लेना; बिजली की तरह फैलना – बहुत तेजी से फैलना।
अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग: कॉलबेल, सीरियस, वायरलेस, एक्सीडेंट – पात्रानुकूल भाषा।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. अन्य ग्रह पर बसे लोगों के चिकित्साशास्त्र में पिछड़े रहने के कारण लिखिए।
उनकी चमड़ी मोटे प्लास्टिक जैसे पदार्थ की होती है।
उस पर हवा, पानी, मिट्टी का असर नहीं होता।
वे बीमार नहीं पड़ते थे, इसलिए चिकित्सा की जरूरत नहीं पड़ी।
जरूरत न होने से उन्होंने इस शास्त्र के बारे में सोचा ही नहीं।
Q2. उस ग्रह की पृथ्वी से भिन्नता दर्शाने वाले घटक लिखिए।
विज्ञान चरमसीमा पर; एक सौरमंडल से दूसरे तक जाने वाले यान; आदमी मशीनों के गुलाम; मशीनें अधिक और आदमी कम; अपने अलग वैज्ञानिक सिद्धांत।
Q3. डॉक्टर भटनागर का अपहरण क्यों किया गया?
उस ग्रह के लोगों को सड़न रोग हो रहा था, जिसका इलाज वे नहीं जानते थे। वे चाहते थे कि डॉक्टर सड़े अंग को काटकर दूसरा अंग लगाने का उपाय खोजें।
Q4. डॉ. भटनागर के संदेश से पृथ्वीवासियों को क्या सीख मिलती है?
उद्योगों और मशीनों का अंधाधुंध विकास खतरनाक है।
मशीनों पर अति निर्भरता मनुष्य का महत्त्व घटाती है।
प्रदूषण से नई-नई बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
समय रहते संतुलित विकास और पर्यावरण रक्षा जरूरी है।
Q5. स्वमत : ‘स्वास्थ्य की समस्या सभी जगह पाई जाती है।’
बदलती जीवनशैली, जंक फूड और व्यायाम की कमी से रोग बढ़ रहे हैं।
प्रदूषण से साँस और त्वचा के रोग होते हैं।
मानसिक तनाव भी बड़ी समस्या है।
संतुलित आहार, योग, स्वच्छता और नियमित जाँच से अच्छा स्वास्थ्य संभव है।
परीक्षा टिप
घटनाक्रम (रात २ बजे बुलावा → लापता → पहियों के निशान → सी.डी. → ग्रह का वर्णन → सड़न रोग) याद रखें; ‘पिछड़ने के कारण’ वाला प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण है।
वीरभूमि पर कुछ दिन रुक्मणी संगल का यात्रा वर्णन है। लेखिका रेल से राजस्थान की यात्रा करती हैं और जोधपुर (उम्मेद भवन, मंडोर गार्डन, मेहरानगढ़, जसवंत थड़ा), जैसलमेर (पटवा की हवेलियाँ, ‘सम’ के रेगिस्तान में ऊँट की सवारी और सूर्यास्त) तथा चित्तौड़गढ़ (महाराणा प्रताप, भामाशाह, मीरा की स्मृतियाँ और विशाल दुर्ग) देखती हैं। राजस्थान को वे ऐसी वीरभूमि कहती हैं जहाँ त्याग, बलिदान, कला, देशभक्ति और ईश-भक्ति सब एक साथ हैं।
मुख्य बिंदु
लेखिका परिचय: रुक्मणी संगल (जन्म १ सितंबर १९४५, बुढ़ाना, उ.प्र.) – विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन; पहली कृति ‘दिनकर के काव्य में जीवन मूल्य’ (शोध प्रबंध)।
विधा – यात्रा वर्णन: अपने पर्यटन की अनुभूतियों, प्रकृति, कला और स्थान की विशेषताओं का लगावपूर्ण वर्णन।
मार्ग: भटिंडा, हनुमानगढ़, लालगढ़, बीकानेर, नागौर, मेड़ता होते हुए जोधपुर।
उम्मेद भवन (राई का बाग): महाराजा उम्मेद सिंह द्वारा निर्मित, छीतर झील के पास होने से ‘छीतर भवन’ भी; निर्माण में बीस वर्ष; ३४३ कमरे होटल में बदले गए; भूतल पर म्यूजियम।
मंडोर गार्डन: मारवाड़ की पुरानी राजधानी मांडव्यपुर (अपभ्रंश ‘मंडोर’) के पास; कृष्ण मंदिर, चट्टानें काटकर बना सीढ़ीनुमा उद्यान, चट्टान पर देवताओं की विशाल मूर्तियाँ।
मेहरानगढ़: ४०० फीट ऊँची पहाड़ी पर, २० से १२० फीट ऊँची दीवार; १४५९ में जोधा जी राव द्वारा निर्माण; द्वारों पर जौहर करने वाली वीरांगनाओं के हस्तचिह्न; मोतीमहल, फूलमहल, शीशमहल आदि।
जसवंत थड़ा: १९०३ में महाराजा जसवंतसिंह की स्मृति में बना स्मारक; एक ओर महादेव मंदिर, दूसरी ओर देव सरोवर।
पटवा की हवेलियाँ (जैसलमेर): १८वीं सदी में सेठ पटवा ने पाँच पुत्रों के लिए बनवाईं; एक के निर्माण में १२ वर्ष; पत्थर की जालियाँ, झरोखे, सोने की कलम से चित्रकारी, सीपी-काँच का काम।
‘सम’ ग्राम: होटल से ११-१२ किमी दूर रेत पर बसा; रेगिस्तान के जहाज (ऊँट) की पहली सवारी – डर, प्रसन्नता और उत्सुकता एक साथ; मंजिल ‘सूर्यास्त केंद्र बिंदु’; रेत के मखमली गद्दे।
चित्तौड़गढ़ (२४ दिसंबर): चेतक और महाराणा प्रताप की याद; भामाशाह ने सारी पूँजी राणा प्रताप के चरणों में रखी; मीरा की स्मृतियाँ।
दुर्ग के लिए कहावत – ‘गढ़ों में गढ़ चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया’; मीरा मंदिर, विजय स्तंभ, गौमुखी कुंड, कालिका मंदिर, पद्मिनी महल, जौहरकुंड, कुंभा महल, जैन मंदिर (२४ तीर्थंकर), महाराणा म्यूजियम।
महत्वपूर्ण शब्द
गंतव्य – जहाँ जाना हो
पड़ाव – ठहरने का स्थान
परकोटा – किले की चारदीवारी
बुर्ज – किले की दीवार पर बना गोल हिस्सा
जौहर – सम्मान रक्षा के लिए वीरांगनाओं का अग्नि में प्राण देना
अस्ताचलगामी – अस्त होता हुआ (सूर्य)
रेगिस्तान का जहाज – ऊँट
भाषा अध्ययन
संधि के भेद (भाषा बिंदु): स्वर संधि – विद्या + अर्थी = विद्यार्थी, प्रति + एक = प्रत्येक; व्यंजन संधि – उत् + नति = उन्नति, सत् + भावना = सद्भावना; विसर्ग संधि – निः + कपट = निष्कपट, निः + भय = निर्भय, मनः + ताप = मनस्ताप।
पाठ के शब्दों का विग्रह: स्वागत = सु + आगत (स्वर); सूर्यास्त = सूर्य + अस्त (स्वर); मनोहर = मनः + हर (विसर्ग); लोकोक्ति = लोक + उक्ति (स्वर); वाङ्मय = वाक् + मय (व्यंजन); दुष्कर = दुः + कर (विसर्ग); नमन/अत्यधिक = अति + अधिक (स्वर)।
एक शब्द: वीर जवानों का वह देश जो धरती का गहना है – भारत; महाराणा प्रताप का घोड़ा – चेतक।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : चित्तौड़गढ़ के दर्शनीय स्थल।
मीरा मंदिर, विजय स्तंभ, गौमुखी कुंड, कालिका मंदिर, पद्मिनी महल, जौहरकुंड, कुंभा महल, जैन मंदिर, महाराणा म्यूजियम।
Q2. जोड़ियाँ मिलाइए : रेगिस्तान का जहाज, मखमली गद्दे, रंग-बिरंगी पोशाक, पर्यटकों की मंजिल।
रेगिस्तान का जहाज – ऊँट; मखमली गद्दे – रेत; रंग-बिरंगी पोशाक – पर्यटक; पर्यटकों की मंजिल – सूर्यास्त (केंद्र बिंदु)।
Q3. ऊँट की सवारी का लेखिका का अनुभव लिखिए।
यह उनका पहला अनुभव था।
डर भी लग रहा था, प्रसन्नता और उत्सुकता भी।
ऊँटों की कतारों पर बाल-वृद्ध सब सवार थे, सबकी धड़कन तेज थी।
फिर भी अनुभव रोमांचकारी और मनोरंजक रहा।
Q4. पटवा की हवेलियों की विशेषताएँ लिखिए।
१८वीं सदी में सेठ पटवा ने पाँच पुत्रों के लिए बनवाईं।
एक हवेली के निर्माण में १२ वर्ष लगे।
छतें सुंदर पत्थर के खंभों पर टिकी हैं।
पत्थर की जालियाँ, पारदर्शक झरोखे, सोने की कलम से चित्रकारी और सीपी-काँच का काम।
Q5. स्वमत : ‘ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा एवं संवर्धन करना हमारा कर्तव्य है।’
ये स्थल हमारे इतिहास, कला और संस्कृति के जीवित प्रमाण हैं।
दीवारों पर नाम लिखना, कचरा-प्लास्टिक फेंकना उन्हें नुकसान पहुँचाता है।
पर्यटन से रोजगार और देश की पहचान बढ़ती है।
नियमों का पालन और जनजागृति से ही इनकी रक्षा संभव है।
परीक्षा टिप
यात्रा का क्रम (जोधपुर → जैसलमेर → चित्तौड़गढ़) और हर स्थान के २-३ तथ्य याद रखें; संधि विग्रह भाषा बिंदु का पक्का प्रश्न है।
वरदान माँगूँगा नहीं शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का स्वाभिमान भरा गीत है। कवि कहते हैं कि जीवन एक महासंग्राम है और हार केवल एक विराम है। वे तिल-तिल मिट जाएँगे, पर किसी से दया की भीख या वरदान नहीं माँगेंगे। हार हो या जीत, वे भयभीत नहीं हैं; संघर्ष पथ पर जो भी मिले, स्वीकार है – पर कर्तव्य पथ से कभी नहीं भागेंगे।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ (जन्म ५ अगस्त १९१५, उन्नाव, उ.प्र.; मृत्यु २६ नवंबर २००२) – जनकवि, प्रगतिवादी कविता के स्तंभ; कविताओं में जनकल्याण, प्रेम, इन्सानी जुड़ाव और रचनात्मक विद्रोह के स्वर।
प्रमुख कृतियाँ: हिल्लोल, जीवन के गान, युग का मोल, मिट्टी की बारात, विश्वास बढ़ता ही गया, वाणी की व्यथा (काव्य संग्रह); महादेवी की काव्य साधना, गीतिकाव्य उद्भव और विकास (गद्य)।
विधा – गीत: स्वर, पद और ताल से युक्त गान; एक मुखड़ा और कुछ अंतरे; हर अंतरे के बाद मुखड़ा दोहराया जाता है; गेय।
कवि की दृष्टि में जीवन महासंग्राम है, हार अंत नहीं, केवल एक विराम है – ‘यह हार एक विराम है’।
धीरे-धीरे मिट जाना स्वीकार है, पर दया की भीख नहीं लेंगे।
बीते सुखद प्रहरों की स्मृति को वे अपने खंडहरों (टूटे जीवन) के लिए संजोकर रखेंगे; विश्व की संपत्ति की चाह नहीं।
हार हो या जीत, वे जरा भी भयभीत नहीं; संघर्ष पथ पर जो मिले – ‘यह भी सही वह भी सही’।
दूसरों से कहते हैं – मेरी लघुता को मत छुओ, तुम ही महान बने रहो; अपने हृदय की वेदना वे व्यर्थ नहीं त्यागेंगे।
चाहे हृदय को ताप दो या अभिशाप, वे कर्तव्य पथ से नहीं भागेंगे।
टेक (पुनरावृत्त पंक्ति): ‘वरदान माँगूँगा नहीं’।
संदेश: स्वाभिमान से जीना, सुख-दुख में समभाव और कर्तव्य पथ पर डटे रहना।
महत्वपूर्ण शब्द
महा-संग्राम – बड़ा युद्ध
विराम – ठहराव
खंडहर – भग्नावशेष
ताप – गर्मी, कष्ट
अभिशाप – श्राप
लघुता – छोटापन
तिल-तिल मिटना (मुहावरा) – धीरे-धीरे समाप्त होना
भाषा अध्ययन
लता कितना मधुर गाती है।
तितली के पंख सुंदर होते हैं।
यह भोजन दस आदमियों के लिए है।
कश्मीर में कई दर्शनीय स्थल हैं।
उसने प्राणों की बाजी लगा दी।
आओ, सिंहासन पर बैठो।
यह गंगा की नवल धार है।
वाक्य शुद्धि (भाषा बिंदु):
विरोधी शब्द-युग्म: हार-जीत, ताप-अभिशाप, लघुता-महानता।
अनुप्रास: ‘तिल-तिल मिटूँगा’।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कवि इन परिस्थितियों में वरदान नहीं माँगना चाहते – लिखिए।
जीवन के महासंग्राम में हार होने पर।
तिल-तिल मिट जाने पर भी।
हृदय को ताप या अभिशाप मिलने पर।
हार हो या जीत, किसी भी स्थिति में।
Q2. आकृति पूर्ण कीजिए : (१) सुखद स्मृति इनके लिए है (२) कवि भयभीत नहीं है
(१) अपने खंडहरों के लिए। (२) हार में या जीत में।
Q3. रेखांकित वाक्यांश के स्थान पर उचित मुहावरा लिखिए : ‘माताजी को देखकर मोहन का धीरज धीरे-धीरे समाप्त हो रहा था।’
माताजी को देखकर मोहन का धीरज तिल-तिल मिट रहा था।
Q4. ‘वरदान माँगूँगा नहीं’ गीत का केंद्रीय भाव लिखिए।
जीवन संघर्ष है, हार केवल एक विराम है।
स्वाभिमानी व्यक्ति दया या वरदान की भीख नहीं माँगता।
सुख-दुख, हार-जीत में समभाव रखना चाहिए।
कर्तव्य पथ पर हर हाल में डटे रहना ही सच्चा जीवन है।
Q5. स्वमत : ‘जीवन में परिश्रम का महत्त्व।’
परिश्रम से ही सफलता और आत्मसम्मान मिलता है।
मेहनती व्यक्ति किसी पर निर्भर नहीं रहता।
असफलता भी परिश्रम करने वाले को अनुभव देकर मजबूत बनाती है।
इसलिए भाग्य के भरोसे न बैठकर लगातार प्रयास करना चाहिए।
परीक्षा टिप
गीत की परिभाषा (मुखड़ा-अंतरा) और पुनरावृत्त पंक्ति ‘वरदान माँगूँगा नहीं’ याद रखें; वाक्य शुद्धि के उदाहरण अभ्यास करें।
रात का चौकीदार (पूरक पठन) सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ की लघुकथा है। कॉलोनी का चौकीदार बहादुर हर मौसम में रात भर लाठी ठोकते, सीटी बजाते पहरा देता है और एक रुपया रोज के हिसाब से महीने के तीस रुपए माँगता है। सौ-सवा सौ घरों में से केवल पचास-साठ ही पैसे देते हैं, फिर भी वह सबकी चौकसी करता है। कथावाचक पहले मुफ्त में चौकसी करवाने की बात कहता है, पर रात भर सोचकर अगले दिन उसे पूरा मेहनताना देने का निर्णय लेता है – चौकीदार के प्रति उसकी श्रद्धा बढ़ जाती है।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ (जन्म १ जनवरी १९५५, खरगौन, म.प्र.) – कवि और लेखक; रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
प्रमुख कृतियाँ: अक्षरदीप जलाएँ (बालकविता संग्रह), छोटू का दर्द (कहानी), शेष कुशल है (काव्य संग्रह)।
विधा – लघुकथा: किसी बड़े परिदृश्य में से एक विशेष क्षण या प्रसंग को प्रस्तुत करने का चातुर्य।
चौकीदार दिसंबर-जनवरी की ठंड, वर्षा या उमस भरी गरमी – हर मौसम में रात बारह बजे के बाद चक्कर लगाता है।
हर महीने की पहली तारीख को गेट बजाकर कहता है – ‘साब जी, पैसे?’
पैसे न देने वालों की भी चौकसी: चौकसी उसकी जिम्मेदारी है, वह केवल पैसे के लिए काम नहीं करता; और चोरी होने पर पुलिस उसी से पूछेगी, लोग झूठा आरोप भी लगा सकते हैं – ऐसा पहले हो चुका है।
डर और असुरक्षा: नशेड़ी, गुंडे-बदमाशों से मारपीट; शरीफ दिखने वालों से झिड़कियाँ, दुत्कार और धौंस रोज की बात।
सुबह आठ-नौ बजे एक चक्कर लगाकर तसल्ली करता है, फिर नींद पूरी करता है।
कथावाचक कहता है – अब मेरे घर की चौकसी भी बिना पैसे के करनी होगी; चौकीदार बस कहता है – ‘जैसी आपकी इच्छा साब जी’।
रात भर ऊहापोह के बाद कथावाचक ने निर्णय लिया – पूरा मेहनताना मिलेगा; चौकीदार सलाम करके चला गया और कथावाचक ने चैन की साँस ली।
संदेश: ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ लोगों के श्रम का सम्मान करें; मुफ्तखोरी गलत है।
निर्माणों के पावन युग में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और कवि अटल बिहारी वाजपेयी की प्रेरक कविता है। कवि कहते हैं कि आज निर्माण और विकास के पवित्र युग में हमें चरित्र निर्माण नहीं भूलना चाहिए और स्वार्थ की आँधी में पूरी धरती (वसुधा) का कल्याण याद रखना चाहिए। नैतिकता के बिना शिक्षा, मानव प्रेम के बिना आविष्कार और सृजन के बिना विज्ञान व्यर्थ है – भौतिक उन्नति के साथ जीवन की उन्नति भी आवश्यक है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: अटल बिहारी वाजपेयी (जन्म २५ दिसंबर १९२४, म.प्र.) – भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, कवि, पत्रकार और प्रखर वक्ता; रचनाएँ जिजीविषा, राष्ट्रप्रेम और ओज से भरी।
प्रमुख कृतियाँ: मेरी इक्यावन कविताएँ (कविता संग्रह); कुछ लेख : कुछ भाषण, बिंदु-बिंदु विचार, अमर बलिदान (गद्य)।
विधा – कविता: रस की अनुभूति कराने वाली, सुंदर अर्थ प्रकट करने वाली, लोकोत्तर आनंद देने वाली रचना।
टेक: निर्माणों के पावन युग में चरित्र निर्माण न भूलें; स्वार्थ साधना की आँधी में वसुधा का कल्याण न भूलें।
संघर्षों का सागर अगम-अगाध है, उसका पार नहीं; फिर भी मँझधार में डूबना साहस को स्वीकार नहीं।
जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिए नूतन अनुसंधान न भूलें।
शील, विनय, आदर्श, श्रेष्ठता – जैसे तार के बिना झंकार नहीं, वैसे ही नैतिक आधार के बिना शिक्षा स्वर नहीं साध सकती।
कीर्ति की चाँदनी (यश) की गरिमा में संस्कृति का सम्मान न भूलें।
आविष्कारों में मानव का प्यार न हो, तो सृजनहीन विज्ञान व्यर्थ है – उससे प्राणी का उपकार नहीं।
भौतिकता के उत्थान में जीवन (मानवीय मूल्यों) का उत्थान न भूलें।
संदेश: विकास के साथ नैतिकता, संस्कृति, साहस और विश्वकल्याण आवश्यक।
महत्वपूर्ण शब्द
पावन – पवित्र
वसुधा – पृथ्वी
अगम – अपार; अगाध – अथाह
मँझधार – लहरों के बीचोंबीच
कौमुदी – चाँदनी
भौतिकता – सांसारिकता
उत्थान – उन्नति
नूतन – नया
भाषा अध्ययन
आर्यभट्ट ने शून्य की खोज की।
प्रगति के लिए आपसी स्पर्धा आवश्यक है।
कार्यक्रम शुरू करने के लिए अध्यक्ष महोदय की अनुमति चाहिए।
काले बादलों को देखकर बारिश की संभावना है।
सड़क-योजना में सैकड़ों मजदूरों को रोजगार मिला।
समानार्थी लगने वाले शब्दों का सही प्रयोग (भाषा बिंदु):
रूपक: ‘संघर्षों का सिंधु’, ‘स्वार्थ साधना की आँधी’, ‘कीर्ति कौमुदी’।
दृष्टांत: ‘तार बिना झंकार नहीं है’ – नैतिकता बिना शिक्षा नहीं।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कृति पूर्ण कीजिए : निर्माणों के पावन युग में हम इन्हें न भूलें।
चरित्र निर्माण, वसुधा का कल्याण, नूतन अनुसंधान, संस्कृति का सम्मान, जीवन का उत्थान।
Q2. कृति पूर्ण कीजिए : होना जरूरी – आविष्कारों में … ; विज्ञान में …
आविष्कारों में – मानव का प्यार; विज्ञान में – सृजन (प्राणी का उपकार)।
Q3. कविता के अनुसार शिक्षा कब व्यर्थ है?
जैसे तार के बिना झंकार नहीं होती, वैसे ही शील, विनय, आदर्श जैसे नैतिक आधार के बिना शिक्षा जीवन का स्वर नहीं साध सकती; ऐसी शिक्षा व्यर्थ है।
Q4. कल्पना पल्लवन : ‘भौतिकता के उत्थानों में जीवन का उत्थान न भूलें।’
आज विज्ञान और तकनीक से सुख-सुविधाएँ बहुत बढ़ी हैं।
पर इस दौड़ में प्रेम, करुणा, ईमानदारी जैसे मूल्य पीछे छूट रहे हैं।
केवल धन और साधन से जीवन सुखी नहीं होता।
भौतिक प्रगति के साथ चरित्र और मानवीय मूल्यों का विकास ही सच्ची उन्नति है।
Q5. स्वमत : ‘देश हित के लिए आप क्या करते हैं?’
नियमों का पालन और ईमानदारी से कर्तव्य निभाना।
स्वच्छता, पानी-बिजली की बचत और पर्यावरण रक्षा।
सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा।
पढ़ाई में मेहनत करके देश के लिए उपयोगी नागरिक बनना।
परीक्षा टिप
टेक की पंक्तियाँ और ‘न भूलें’ वाली सूची (चरित्र निर्माण, वसुधा का कल्याण, अनुसंधान, संस्कृति, जीवन का उत्थान) पक्की करें – कृति प्रश्न इन्हीं से बनते हैं।
कह कविराय में रीतिकालीन कवि गिरिधर कविराय की पाँच नीतिपरक कुंडलियाँ हैं। इनमें गुण का महत्त्व (कौआ और कोयल), स्वार्थी मित्रता, उधार लेकर न लौटाने वालों की प्रवृत्ति, बिना विचारे काम करने का पछतावा, बीती बातें भूलकर आगे की सुधि लेना और परोपकार की सीख दी गई है। हर कुंडली ‘कह गिरिधर कविराय’ से अपनी बात को निष्कर्ष तक पहुँचाती है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: गिरिधर कविराय (एक अनुमान के अनुसार जन्म १७१३ ई.) – कुंडलियों के लिए प्रसिद्ध; नीति, वैराग्य और अध्यात्म उनके विषय; जीवन के व्यावहारिक पक्ष का प्रभावशाली वर्णन।
कृति: ‘गिरिधर कविराय ग्रंथावली’ – ५०० से अधिक दोहे और कुंडलियाँ।
कुंडली छंद: दोहा + रोला; दोहे का अंतिम पद रोला का पहला चरण बनता है; जिस शब्द से शुरू, उसी पर समापन।
१. गुण का महत्त्व: गुण के ग्राहक हजारों हैं, गुण के बिना कोई नहीं पूछता। कौआ और कोयल दोनों का रंग एक है, पर कोयल की मीठी बोली सबको सुहाती है और कौआ अपावन माना जाता है।
२. स्वार्थी मित्रता: संसार में मतलब का व्यवहार है – जब तक गाँठ में पैसा है, तब तक यार साथ घूमता है; पैसा न रहा तो मुँह से बोलता भी नहीं। निःस्वार्थ प्रीति करने वाला मित्र कोई बिरला ही होता है।
३. ऋण लेने-लौटाने की रीति: झूठा व्यक्ति मीठे वचन कहकर उधार ले जाता है; लेते समय बहुत सुख, पर लौटाया नहीं जाता; माँगने पर ऊँच-नीच कहता है, मारने दौड़ता है और कहता है ‘तेरा कागज झूठा’।
४. बिना विचारे काम: बिना विचारे काम करने वाला बाद में पछताता है, अपना काम बिगाड़ता है, जग में हँसी होती है, मन को चैन नहीं, खान-पान-सम्मान-राग-रंग कुछ नहीं भाता।
५. बीती ताहि बिसारि दे: बीती बात भूलकर आगे की सुधि लो; जो सहज में बन आए उसी में मन लगाओ – तब दुर्जन नहीं हँसेंगे।
६. परोपकार: नाव में पानी बढ़े और घर में धन बढ़े, तो दोनों हाथों से उलीचना (बाँटना) ही समझदारी है; परहित के लिए सिर आगे कर दो और अपना पानी (सम्मान) बनाए रखो।
जंगल (पूरक पठन) चित्रा मुद्गल की संवादात्मक कहानी है। कॉलेज में पढ़ाने वाली मांडवी दीदी के पोते पीयूष (पीयू) ने जन्मदिन पर जिद करके खरगोश का जोड़ा सोनू-मोनू पाला था। एक दिन सोनू मरा मिला। मोनू उदास होकर दूध तक नहीं पीता। दादी पीयूष को समझाती हैं कि सोनू को अपने माँ-बाप से बिछड़ने का दुख था, क्योंकि जंगल उसका घर है। यह सुनकर पीयूष स्वयं कहता है कि मोनू को जंगल में उसके माँ-बाप के पास छोड़ आएँ – और अब उसे तोता भी नहीं चाहिए।
मुख्य बिंदु
लेखिका परिचय: चित्रा मुद्गल (जन्म १० सितंबर १९४३, चेन्नई, तमिलनाडु) – लेखन में रीतती मानवीय संवेदनाओं, नए जमाने की गतिशीलता और जिंदगी की मजबूरियों का गहरा चित्रण।
प्रमुख कृतियाँ: एक जमीन अपनी, आवां (उपन्यास); भूख, लाक्षागृह, लपटें, मामला आगे बढ़ेगा अभी, आदि-अनादि (कहानी संग्रह); जीवक, मणिमेख (बाल उपन्यास); दूर के ढोल, सूझ-बूझ (बालकथा संग्रह)।
विधा – संवादात्मक कहानी: किसी विशेष घटना की रोचक ढंग से संवाद रूप में प्रस्तुति।
बहू तविषा ने अणिमा जोशी के मोबाइल पर फोन करके बताया – जुड़वाँ खरगोशों में से सोनू नहीं रहा; कामवाली कमला ने उसे सोफे के नीचे अचेत पाया; डॉक्टर ने कहा – प्राण नहीं हैं।
पीयूष पहली बार मौत से मिल रहा था; मोनू सोनू की परिक्रमा करता, उसकी आँखों में आँसू थे – दादी ने पहली बार किसी जानवर को रोते देखा।
बेटे शैलेश ने सोनू को नाले में फिंकवाने की सलाह दी, पर दादी ने मना किया – घर के बच्चे की तरह अंतिम संस्कार हो; स्थिति से भागने के बजाय सामना करना बेहतर।
पालने की कहानी: महरौली में मित्र के घर तोता और खरगोश देखकर पीयूष ने जिद पकड़ी; दादी उसे लाजपत नगर की चिड़ियों की दुकान ले गईं; जालीदार बांकड़े के साथ सोनू-मोनू आए।
तविषा को अपराध-बोध था – चावल की टंकी के घुन मारने के लिए पारे की गोलियाँ खोलते समय कुछ छिटक गई थीं; शायद सोनू ने खा ली हों।
दादी ने कहा – सोनू दुख से मरा, क्योंकि दुकानदार ने उसे माँ-बाप से अलग कर दिया; पीयूष को भी मम्मी के चार दिन दूर रहने पर दुख हुआ था।
पीयूष ने पूछा – मोनू को माँ-बाप से अलग रखेंगे तो वह भी मर जाएगा? – और मोनू को जंगल में छोड़ने का निर्णय लिया।
संदेश: पशु-पक्षियों का असली घर जंगल है; उन्हें कैद करना गलत है; प्राणिमात्र के प्रति दया और संरक्षण।
महत्वपूर्ण शब्द
अनुशासन – नियम
झिझक – लज्जा, संकोच
निश्चेष्ट – बिना हरकत के
बांकड़ा – जालीदार पिंजरा
हमजोली – साथी
मुनासिब – उचित
ढाढ़स – सांत्वना
घोड़े बेचकर सोना (मुहावरा) – निश्चिंत होकर गहरी नींद सोना
भाषा अध्ययन
मुहावरे: काली बदली उतरना – उदासी छा जाना; कंठ भर आना – भावुक होना; हठ पकड़ना – जिद करना; निरुत्तर होना – जवाब न दे पाना।
उपमा: ‘रेशम-सी देह’, ‘टूटी कोंपल-सी झूल गई’।
संवादात्मक शैली: छोटे-छोटे प्रश्न-उत्तर से बाल मन की जिज्ञासा का चित्रण।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कारण लिखिए : (१) तविषा अपराध-बोध से भरी थी (२) दादी ने सोनू को नाले में नहीं फिंकवाया
(१) उसे शक था कि घुन मारने वाली पारे की गोलियों में से एकाध गोली छूट गई होगी, जिसे सोनू ने खा लिया होगा। (२) पीयूष सोनू से बहुत प्यार करता था; वे घर के बच्चे की तरह उसका अंतिम संस्कार करना चाहती थीं और स्थिति का सामना करना बेहतर समझती थीं।
Q2. संजाल पूर्ण कीजिए : पीयूष को खरगोश पालने से रोकने के लिए दिए गए तर्क।
फ्लैट में पशु पालना कठिन है; खरगोश पूरे दिन बांकड़े में बंद नहीं रह सकते; छोटे घर में वे भागा-दौड़ी करेंगे; उनकी गंदगी कौन साफ करेगा।
Q3. सोनू की मृत्यु के बाद मोनू का व्यवहार लिखिए।
सोनू की परिक्रमा करता रहा, उसे गौर से ताकता रहा।
उसकी आँखों में आँसू भरे थे, वह हिचकियाँ भर रहा था।
दूध के कटोरे को छुआ तक नहीं।
सोनू के खाली कटोरे को रह-रहकर सूँघता रहा; पीयूष के साथ नहीं खेला।
Q4. पीयूष के मन में आया परिवर्तन स्पष्ट कीजिए।
पहले वह खरगोश और तोता पालने की जिद करता था।
सोनू की मौत और दादी की बातों से उसने बिछड़ने का दुख समझा।
उसने स्वयं मोनू को जंगल में उसके माँ-बाप के पास छोड़ने को कहा।
अब उसे तोता भी नहीं चाहिए – उसमें प्राणियों के प्रति संवेदना जाग गई।
Q5. स्वमत : ‘पशु-पक्षियों को पिंजरे में कैद करना उचित नहीं।’
स्वतंत्रता सभी प्राणियों का अधिकार है।
प्राकृतिक घर (जंगल) से अलग होकर वे दुखी और बीमार हो जाते हैं।
पशु-पक्षियों की खरीद-फरोख्त से उनके परिवार बिछड़ते हैं।
प्रेम दिखाना है तो उन्हें प्रकृति में सुरक्षित रहने दें, जंगल बचाएँ।
परीक्षा टिप
पात्रों के नाम (मांडवी दीदी, पीयूष, तविषा, शैलेश, कमला, सोनू-मोनू) और पीयूष का अंतिम निर्णय याद रखें; यह पूरक पठन है।
इनाम अरुण का हास्य-व्यंग्यात्मक निबंध है। लेखक एक देशी कंपनी की प्रतियोगिता (‘इस रेफ्रीजरेटर को खरीदने के सात लाभ’) में रेफ्रीजरेटर जीत जाते हैं। फिर मोहल्ले में तमाशा शुरू होता है – देखने वालों का ताँता, जलने वालों की जली-कटी बातें और फिर सब लोग अपनी-अपनी चीजें उनके फ्रिज में रखने लगते हैं। घर की प्राइवेसी छिन जाती है। अंत में मित्र कैलाश के सुझाव से लेखक और उनकी पत्नी लोगों की रखी चीजें खुद खा लेते हैं और बहाने बना देते हैं – तब से कोई पास नहीं फटकता।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: अरुण (जन्म ३ जनवरी १९२८, मेरठ, उ.प्र.) – कहानीकार, उपन्यासकार; समग्र साहित्य की १४ पुस्तकों का संकलन प्रकाशित।
प्रमुख कृतियाँ: मेरे नवरस (एकांकी संकलन), वृहद हास्य संकलन (कहानी संग्रह)।
विधा – हास्य-व्यंग्यात्मक निबंध: तार्किक, विवेचनापूर्ण लेख, जिसमें उपहास की प्रधानता हो।
देशी कंपनी ने विदेशी ढंग का विज्ञापन अपनाया; जिनके उत्तर कंपनी के मुहरबंद उत्तर से मिलें, उन्हें रेफ्रीजरेटर मुफ्त; फल एक अप्रैल को।
लॉटरी से पहले की रात बच्चे हेमंत और अमिता सपने देखते हैं – आइसक्रीम, बर्फ के क्यूब; पड़ोसी लाला दीनदयाल कहते हैं, फ्रिज तो मुझे मिलेगा।
रेडियो पर घोषणा – सब उत्तर ठीक होने वाले दो भाग्यवानों में एक लेखक; फ्रिज मुंबई से आया।
रिश्तेदार और मोहल्ले वाले ऐसे देखने आए ‘जैसे कोई बहू देखने आता है’; पत्नी विमला ने पहले शिकंजी-चाय पिलाई, फिर हथियार डाल दिए।
जलने वालों के ताने: ‘यह तो पानी गरम कर रहा है’; ‘बिजली का बिल आएगा तो पता लगेगा सफेद हाथी बाँध लिया’; ‘रिश्तेदार कंपनी में नौकर है’; बच्चे से पूछा – पिताजी कितने दिन पहले मुंबई गए थे।
सिंधु का जल अशोक चक्रधर की नई कविता है, जिसमें सिंधु नदी का पावन जल स्वयं अपनी कहानी कहता है। वह सतत बहता है और जीवन की पहचान है; उसके किनारों पर सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ पनपीं। जल नहाने वाले या प्यासे से उसकी जाति, धर्म, दोस्त-दुश्मन नहीं पूछता – सबका है। युद्ध में जब उसके घाटों पर खून बहता है, तब भी वह हर शहीद के घाव धोता है और विधवा की आँखों में आँसू बनकर रोता है। कविता सर्वधर्म समभाव, इंसानियत और परदुःखकातरता का संदेश देती है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: अशोक चक्रधर (जन्म ८ फरवरी १९५१, खुर्जा, उ.प्र.) – बहुमुखी प्रतिभा; कविता, हास्य-व्यंग्य, निबंध, नाटक, बालसाहित्य, समीक्षा, अनुवाद, पटकथा आदि में लेखन।
प्रमुख कृतियाँ: बूढ़े बच्चे, तमाशा, खिड़कियाँ, बोल-गप्पे, जो करे सो जोकर (कविता संग्रह)।
विधा – नई कविता: मानवीय परिवेश की विविधता को नए शिल्प में व्यक्त करने वाली काव्यधारा।
जल कहता है – मैं सतत प्रवाहमान, जीवन की पहचान, ‘गीली हलचल’ हूँ; मेरे स्वर में कल-कल है।
सिंधु धरती पर सभ्यताओं का आदि बिंदु है; उसके किनारों पर संस्कृतियों ने साँस ली, इंसानियत के यज्ञ हुए।
गति में चंचल, पर भावना में अचल।
जल नहाने वाले से जात, मजहब, धर्म नहीं पूछता; प्यास बुझाने से पहले दोस्त-दुश्मन, मैल हटाने से पहले हिंदू-मुसलमान नहीं पूछता – ‘मैं तो सबका हूँ’।
छोटी-छोटी सांस्कृतिक नदियाँ दौड़ी आकर उसमें समाती और घुल-मिल जाती हैं।
युद्ध का दुख: कभी-कभी घाटों पर लहू बहकर आता है – तलवारें खनकती हैं, टापें गूँजती हैं, तोपें गरजती हैं, धमाके होते हैं और रणबाँकुरे शहीद होते हैं।
जल नहीं देखता कि वे यहाँ के हैं या वहाँ के – सबके घाव धोता है, विधवा की आँखों में आँसू बनकर रोता है।
अंत: ‘मैं सिंधु में बिंदु हूँ, बिंदु में सिंधु हूँ’ – लहराते बिंबों में झिलमिलाता इंदु (चंद्रमा)।
महत्वपूर्ण शब्द
प्रवाहमान – निरंतर बहने वाला
मजहब – धर्म
मर्म – सार
टापें – घोड़ों के पैरों की आवाज
रणबाँकुरे – वीर योद्धा
बिंब – छाया, आभास
इंदु – चंद्रमा
घाव धोना – मरहम-पट्टी करना
भाषा अध्ययन
प्रेरणार्थक क्रिया (भाषा बिंदु): हटाना – हटवाना; कहलाना – कहलवाना (प्रथम और द्वितीय प्रेरणार्थक)। वाक्य: मालिक ने नौकर से सामान हटवाया।
सहायक क्रिया: ‘बढ़ने लगे’ में ‘लगे’; ‘कर देता है’ में ‘देता है’। प्रयोग: वह थक गया है; मुझे जाना पड़ा; बच्चा खेल रहा था।
भिन्नार्थक शब्द: अलि – भौंरा; अली – सखी।
संगीत-लय वाले शब्द: कल-कल, खनकती, गूँजती, गरजती, झिलमिलाता।
विरोधाभास/चमत्कार: ‘सिंधु में बिंदु हूँ, बिंदु में सिंधु हूँ’।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. पूर्ण कीजिए : पावन जल स्नान करने वालों से नहीं पूछता –
उनकी जात, उनका मजहब, उनका धर्म।
Q2. पाठ से ढूँढ़कर लिखिए : संगीत-लय निर्माण करने वाले शब्द।
कल-कल, खनकती, गूँजती, गरजती, झिलमिलाता।
Q3. सिंधु के जल को युद्ध के समय क्या दुख होता है?
उसके घाटों पर लहू बहकर आता है।
तलवारें, तोपें और धमाके गूँजते हैं।
दोनों ओर के वीर शहीद होते हैं।
वह सबके घाव धोता है और विधवा की आँखों में आँसू बनकर रोता है।
Q4. कविता में व्यक्त मानवीय मूल्य स्पष्ट कीजिए।
सर्वधर्म समभाव – जाति-धर्म का भेद नहीं।
परोपकार – सबकी प्यास बुझाना, मैल हटाना।
इंसानियत और करुणा – दुश्मन-दोस्त सबके घाव धोना।
एकता – छोटी संस्कृतियों का घुल-मिलकर एक होना।
Q5. स्वमत : ‘जल ही जीवन है’ – जल संरक्षण के उपाय।
वर्षा जल संचयन और छोटे बाँध-तालाब।
नल बंद रखना, पानी का दोबारा उपयोग।
नदियों में कचरा और रसायन न डालना।
खेती में ठिबक/फव्वारा सिंचाई अपनाना।
परीक्षा टिप
जल के ‘नहीं पूछता’ वाले बिंदु और युद्ध वाले अंश का भाव याद रखें; प्रेरणार्थक और सहायक क्रिया भाषा बिंदु में पक्की करें।
अतीत के पत्र में विनोबा भावे और महात्मा गांधी के बीच हुए दो पत्र हैं। पहले पत्र में विनोबा जी बताते हैं कि स्वास्थ्य के कारण आश्रम से बाहर गए थे, पर उपनिषदों के अध्ययन के ‘लोभ’ में वाई में एक साल रह गए; इस दौरान उनके व्यायाम, आहार, अध्यापन, पैदल यात्रा और आश्रम के व्रतों के पालन का पूरा ब्योरा है। दूसरे पत्र में गांधीजी पितृवत प्रेम से विनोबा पर विश्वास जताते हैं, उन्हें अपने से अधिक चरित्रवान पुत्र मानकर ‘पिता का पद’ स्वीकार करते हैं।
मुख्य बिंदु
विनोबा भावे (विनायक नरहरी भावे; जन्म ११ सितंबर १८९५, मृत्यु १५ नवंबर १९८२) – स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता, गांधी विचारक; कृतियाँ – गीताई (गीता का मराठी अनुवाद), गीता पर वार्ता, शिक्षा पर विचार।
महात्मा गांधी (मोहनदास करमचंद गांधी; जन्म २ अक्तूबर १८६९, मृत्यु ३० जनवरी १९४८) – स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता; कृतियाँ – ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ (आत्मकथा), ‘हिंद स्वराज्य या इंडियन होमरूल’।
विधा – पत्र: व्यक्तिगत भाव-विचारों का आत्मीय माध्यम; ऐतिहासिक महत्त्व।
विनोबा ने दस वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य और देशसेवा का व्रत लिया; पिता की आज्ञा से फ्रेंच ली, पर घर पर संस्कृत सीखी; वाई में नारायण शास्त्री मराठे से उपनिषद पढ़ने का लोभ हुआ।
व्यायाम: दस-बारह मील घूमना, छह से आठ सेर अनाज पीसना, तीन सौ सूर्य नमस्कार।
आहार: नमक-मसाले न खाने का आजन्म व्रत; दूध के बिना नहीं चला; एक महीना केले, दूध, नींबू पर।
कार्य: छह विद्यार्थियों को बिना पारिश्रमिक पूरी गीता; ज्ञानेश्वरी के छह अध्याय; नौ उपनिषद; हिंदी समाचार-पत्र पढ़ाना; दो विद्यार्थियों को अंग्रेजी; लगभग चार सौ मील पैदल यात्रा (राजगढ़, सिंहगढ़, तोरणगढ़); गीता पर लगभग पचास प्रवचन।
वाई में ‘विद्यार्थी मंडल’ की स्थापना; चक्की पीसकर (एक पैसे में दो सेर) वाचनालय के लिए धन – दो मास में चार सौ पुस्तकें।
बड़ौदा की मातृभाषा प्रसार संस्था में हिंदी प्रचार का विचार रखा।
व्रत: अस्वाद, अपरिग्रह (लकड़ी की थाली-कटोरी, लोटा, धोती, कंबल, पुस्तकें), करघे का बुना कपड़ा, सत्य-अहिंसा-ब्रह्मचर्य; केवल अपनी भाकरी स्वयं बनाना न हो सका।
गांधीजी का उत्तर: ‘तुम्हारा प्रेम और चरित्र मुझे मोह में डुबो देता है’; सच्चा पिता अपने से अधिक चरित्रवान पुत्र पैदा करता है, सच्चा पुत्र पिता के कार्य में वृद्धि करता है; मैं हिरण्यकश्यप साबित होऊँ तो प्रह्लाद की तरह सादर निरादर करना; दूध मत छोड़ना; रेल-सत्याग्रह की अभी जरूरत नहीं।
पत्र पढ़कर बापू के उद्गार – ‘गोरख ने मछंदर को हराया। भीम है भीम।’
महत्वपूर्ण शब्द
अस्वादव्रत – फीका (बिना स्वाद का) भोजन करने का व्रत
अपरिग्रह – संग्रह न करना
करघा – कपड़ा बुनने का यंत्र
रमता राम – एक स्थान पर न टिकने वाला, फक्कड़
वाक्चातुर्य – बोलने में चतुराई
परिग्रह – संग्रह
पितृतुल्य – पिता के समान
भाषा अध्ययन
पत्र की विशेषताएँ: संबोधन (‘परम पूज्य बापूजी’), आत्मीय भाषा, क्रमांक सहित ब्योरा, समापन (‘विनोबा के प्रणाम’, ‘बापू के आशीर्वाद’)।
कारक चिह्न: ने, को, से, के लिए, का-के-की, में-पर – पत्र के वाक्यों में पहचानें।
मुहावरे: मौका हाथ लगना – अवसर मिलना; मोह में डुबोना – अत्यधिक प्रेम में बाँधना।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : विनोबा जी का व्यायाम।
दस-बारह मील घूमना, छह से आठ सेर अनाज पीसना, तीन सौ सूर्य नमस्कार।
Q2. विनोबा जी द्वारा वाई में किए गए चार कार्य लिखिए।
गीता का वर्ग (बिना पारिश्रमिक), ज्ञानेश्वरी और उपनिषदों का अध्यापन, ‘विद्यार्थी मंडल’ और वाचनालय की स्थापना, गीता पर प्रवचन।
Q3. विनोबा जी ने आश्रम के किन व्रतों का पालन किया?
अस्वादव्रत – नमक-मसाले का त्याग।
अपरिग्रह – केवल आवश्यक वस्तुएँ रखना।
स्वदेशी – करघे पर बुना कपड़ा।
सत्य, अहिंसा और ब्रह्मचर्य।
Q4. गांधीजी के अनुसार सच्चे पिता और सच्चे पुत्र की परिभाषा लिखिए।
सच्चा पिता वह है जो अपने से अधिक चरित्रवान पुत्र पैदा करे; सच्चा पुत्र वह है जो पिता के किए कार्यों में वृद्धि करे और पिता के सत्य, दृढ़ता, दया जैसे गुण विशेष रूप से धारण करे।
Q5. स्वमत : ‘मेरे सपनों का भारत’।
शिक्षित, स्वच्छ और स्वस्थ भारत।
जाति-धर्म के भेदभाव से मुक्त, समानता वाला समाज।
आत्मनिर्भर गाँव और रोजगार के अवसर।
सत्य, अहिंसा और परिश्रम जैसे गांधीवादी मूल्यों पर चलने वाले नागरिक।
परीक्षा टिप
विनोबा जी के कार्यों की सूची (संख्या सहित) और गांधीजी के पत्र की मुख्य बातें (पिता-पुत्र की परिभाषा, दूध न छोड़ना) याद रखें।
निसर्ग वैभव (पूरक पठन) छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत की कविता है (‘पतझड़’ से)। कवि ईश्वर को संबोधित करते हुए पर्वतीय प्रकृति की असीम सुंदरता का वर्णन करते हैं – गिरि-शिखरों से झरती और घाटी में लोटती सुंदरता, पवन से पुलकित घास, फूल, भौंरे, तितलियाँ, कोयल, उषा और संध्या। अंत में कवि प्रश्न करते हैं कि जब जड़ जगत इतना सुंदर है, तो चेतन मनुष्य का जीवन दुख और संघर्ष से भरा क्यों है? उत्तर – मनुष्य अपनी क्षुद्र अहंता में सीमित होकर विश्व चेतना से कट गया है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: सुमित्रानंदन पंत (जन्म २० मई १९००, कौसानी, उत्तराखंड; मृत्यु २८ दिसंबर १९७७) – छायावाद के चार स्तंभों में से एक; प्रकृति, मानव सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना के कुशल कवि।
प्रमुख कृतियाँ: वीणा, गुंजन, पल्लव, ग्राम्या, चिदंबरा, कला और बूढ़ा चाँद (काव्य संग्रह); हार (उपन्यास); साठ वर्ष : एक रेखांकन (आत्मकथात्मक संस्मरण)।
विधा – कविता: रस की अनुभूति और कोमल भावनाओं का साकार रूप।
पहला चरण: प्राकृतिक जगत में सुंदरता बिखरी है – गिरि-शिखरों से टपकती, घाटी में लोटती, धूप-छाँह में चुपचाप लिपटी।
पवन के स्पर्श से घास पुलकित है; वन-भूमि का मर्मर सीमाहीन मधुर संगीत-सा बहता है।
फूल और जीव: फूलों की ज्वालाएँ आँखों को शीतल करती हैं; भौंरे कलियों का मधु पीते हैं; तितलियाँ उड़ती हैं; पल्लव छाया में कोयल रुक-रुककर गाती है।
पर्वत का दृश्य: नीली छायाएँ, दुर्गम ढालें निश्चल तरंग-सी स्तंभित; सुनहरे शिखर पर उषा सबसे पहले अभिनंदन करती है, संध्या यहीं छिपकर सोती है।
तारों भरा आकाश चंद्रमुख का दर्पण बनता है; पर्वत के कंधों पर सुगंधित पवन सोता-जागता है।
पक्षी फल चखते हैं, गिलहरियाँ कोंपल कुतरती हैं, वन-पशु पन्ने (मरकत) जैसे हरे आँगन में प्रसन्न हैं।
अंतिम प्रश्न: जड़ जग इतना सुंदर है, तो चेतन जग में मन का संघर्ष क्यों? ईश्वर का प्रतिनिधि मनुष्य अभिशापित क्यों?
उत्तर/संदेश: मनुष्य अपनी क्षुद्र अहंता में सीमित होकर विश्व चेतना से कट गया है; प्रकृति से जुड़कर ही जीवन सुंदर बन सकता है।
महत्वपूर्ण शब्द
निसर्ग – प्रकृति; वैभव – ऐश्वर्य
श्लक्ष्ण – मधुर
अनिल / समीरण – पवन
अहरह – प्रतिदिन, निरंतर
मुकुल – कली
शैल – पर्वत
मरकत – पन्ना (रत्न)
अपलक – बिना पलक झपकाए
वैचित्र्य – अनोखापन
अहंता – अहंकार
भाषा अध्ययन
मुहावरों में शुद्ध शब्द (भाषा बिंदु): टोपी पहनाना (धोखा देना); कमर कसना (तैयार होना); आटा गीला होना (मुसीबत में और मुसीबत आना); आँख की किरकिरी होना (खटकना); आसमान सिर पर उठाना (बहुत शोर करना); आग-पानी का बैर (कट्टर दुश्मनी)।
मानवीकरण: उषा अभिनंदन करती है, साँझ छिपकर सोती है, समीरण सोता-जागता है।
उपमा: ‘संगीत स्रोत-सी’, ‘निश्चल तरंग-सी’।
तत्सम शब्दावली: छायावादी कोमल, संस्कृतनिष्ठ भाषा।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : कविता में आए प्राकृतिक सौंदर्य के घटक।
(१) अनिल स्पर्श से पुलकित तृणदल → (२) निश्चल तरंग-सी स्तंभित! → (३) परिचित मरकत आँगन में! → (४) अभिशापित हो उसका जीवन?
Q3. तृतीय चरण का भावार्थ लिखिए।
दुर्बल सूर्य किरणों में गुँथी नीली छायाएँ पर्वत पर लेटी हैं। कठिनाई से चढ़ी जाने वाली ढलानें ऐसी लगती हैं मानो लहरें रुककर जम गई हों। सुनहरे शिखर पर उषा सबसे पहले सूर्य का अभिनंदन करती है और संध्या भी संध्यावंदन करके इसी निर्जन पर्वत में छिपकर सो जाती है।
Q4. कविता से प्राप्त संदेश लिखिए।
प्रकृति असीम सौंदर्य और आनंद का भंडार है।
प्रकृति के सब जीव प्रसन्न और स्वाभाविक जीवन जीते हैं।
मनुष्य अहंकार के कारण दुखी और संघर्षरत है।
अहंकार छोड़कर प्रकृति और विश्व चेतना से जुड़ना चाहिए।
Q5. कल्पना पल्लवन : ‘प्रकृति मनुष्य की सबसे बड़ी शिक्षिका है।’
नदी निरंतर आगे बढ़ना सिखाती है, पेड़ परोपकार, फूल मुस्कुराना और पर्वत अडिग रहना। ऋतुओं का चक्र बताता है कि दुख के बाद सुख आता है। चींटी परिश्रम और मधुमक्खी एकता का पाठ पढ़ाती है। जो मनुष्य प्रकृति को ध्यान से देखता है, वह जीवन का संतुलन सीख लेता है।
परीक्षा टिप
यह पूरक पठन है – सौंदर्य के घटक और अंतिम प्रश्न-उत्तर (जड़ सुंदर, चेतन दुखी क्यों) याद रखें; मुहावरों की शुद्धि भाषा बिंदु में आती है।
शिष्टाचार भीष्म साहनी की चरित्रात्मक कहानी है। बाबू रामगोपाल बारह रुपए महीने पर गाँव के भोले, अरूप नौकर हेतू को लाते हैं; श्रीमती उसे शक की नजर से देखती हैं। बेटे के मुंडन के जलसे के दिन हेतू बार-बार छुट्टी माँगता है, पर कारण नहीं बताता। गुस्से में श्रीमान उसे चाँटा मारकर, तनख्वाह रोककर निकाल देते हैं। महीनों बाद हेतू मिलता है और रोते हुए बताता है कि उस दिन उसका बच्चा मर गया था – ‘खुशीवाले घर में यह नहीं कहते, हमारे गाँव में इसे बुरा मानते हैं।’ गँवार समझे गए नौकर का यह सच्चा शिष्टाचार देखकर श्रीमान स्तब्ध रह जाते हैं।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: भीष्म साहनी (जन्म ८ अगस्त १९१५, रावलपिंडी, अविभाजित भारत; मृत्यु ११ जुलाई २००३) – सामाजिक विषमता, संघर्ष, मानवीय करुणा और नैतिकता उनकी लेखनी का आधार।
प्रमुख कृतियाँ: भाग्य-रेखा, पहला पाठ, भटकती राख, निशाचर (कहानी संग्रह); झरोखे, तमस, कुंतो, नीलू नीलिमा नीलोफर (उपन्यास); कबिरा खड़ा बाजार में, माधवी (नाटक); आज के अतीत (आत्मकथा)।
विधा – चरित्रात्मक कहानी: जीवन की किसी घटना का रोचक और चरित्रपूर्ण वर्णन।
तीन दिन की खोज के बाद रामगोपाल हेतू को लाए; श्रीमती ने उसे ‘बनमानस’ कहा; वह शिमला के पास एक गाँव से आया था।
श्रीमती के विचार: नौकर झूठे, गलीज, लंपट होते हैं, पैसे काटते हैं, हर वक्त दूसरी नौकरी की तलाश में रहते हैं; जासूसी नॉवेल पढ़ने से हर क्रिया में षड्यंत्र दिखता था।
हेतू उजड्ड और अरूप था, गिलास तोड़ता, परदों पर धब्बे डालता; श्रीमती दिन में दस बार उसे बरखास्त करतीं, पर सस्ता होने (बारह रुपए, दिन में दो बार खाना) के कारण वह टिका रहा; नुकसान पर तनख्वाह कटती।
तीन महीने बाद मुंडन की तैयारियों में चाबियों का गुच्छा भी हेतू के हाथ आ गया।
जलसे के दिन हेतू ने छुट्टी माँगी; न मिलने पर टस-से-मस नहीं हुआ; श्रीमान ने चाँटा मारा, श्रीमती ने चोरी का शक किया।
डायरी में पता लिखकर, अँगूठा लगवाकर, तनख्वाह रोककर धक्के मारकर निकाला।
श्रीमती ने ट्रंक की पड़ताल की; श्रीमान मन ही मन अफसोस करते रहे, मनीऑर्डर भेजने की सोचते पर रुक जाते।
धर्मशाला के सामने हेतू मिला – बच्चे की मृत्यु का सच सुनकर श्रीमान स्तब्ध और हैरान रह गए।
संदेश: शिष्टाचार पढ़ाई या पैसे से नहीं, संवेदना से आता है; किसी को रूप या पद से नहीं आँकना चाहिए।
महत्वपूर्ण शब्द
अनथक – बिना थके
तलब – वेतन
षड्यंत्र – कपटपूर्ण योजना
उजड्ड – असभ्य, गँवार
अरूप – कुरूप
तब्दील – परिवर्तित
पसीजना – पिघलना, दया आना
हाथ साफ करना (मुहावरा) – चोरी करना
भाषा अध्ययन
मुहावरे: मुँह फेरना – उपेक्षा करना; बरखास्त करना – निकाल देना; टस-से-मस न होना – दृढ़ रहना; बेकाबू होना – अनियंत्रित होना; आपे से बाहर होना – बहुत क्रोधित होना; भौंहें चढ़ना – नाराज होना।
उपमा: ‘उँगली पिस्तौल की तरह … दागकर बोलीं’।
शीर्षक का व्यंग्य: सभ्य कहलाने वाले मालिक अशिष्ट निकले, गँवार नौकर शिष्ट।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : श्रीमती की विशेषताएँ।
शक्की स्वभाव, घर में हुकूमत चलाने वाली, नौकरों से कठोर व्यवहार करने वाली, तेज नजर वाली (हर खर्च का हिसाब रखने वाली), जासूसी उपन्यास पढ़ने वाली।
Q2. श्रीमती के नौकरों के बारे में विचार लिखिए।
नौकर झूठे, गलीज और लंपट होते हैं; किसी पर विश्वास नहीं किया जा सकता; सब पैसे काटते हैं; हर वक्त नई नौकरी की तलाश में रहते हैं।
Q3. सत्य/असत्य लिखिए : (१) अगले दिन श्रीमती ने ट्रंक खोलकर चीजों की पड़ताल शुरू की। (२) सहसा हेतू की आँखों में आँसू आ गए।
(१) सत्य (२) सत्य।
Q4. ‘शिष्टाचार’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
हेतू ने बच्चे की मृत्यु का दुख मालिक के खुशी के अवसर पर नहीं बताया।
गाँव की मान्यता के अनुसार खुशी में दुख की बात कहना अशिष्टता है।
पढ़े-लिखे मालिकों ने उसे चाँटा मारा और चोर समझा – यह अशिष्टता थी।
सच्चा शिष्टाचार गँवार कहे गए नौकर में दिखा, इसलिए शीर्षक सार्थक है।
Q5. स्वमत : ‘नौकर और मालिक के बीच सौहार्दपूर्ण व्यवहार होना चाहिए।’
नौकर भी इंसान है, उसकी भावनाओं का सम्मान जरूरी है।
उचित वेतन, छुट्टी और विश्वास से वह मन लगाकर काम करता है।
बिना कारण शक और अपमान संबंध बिगाड़ते हैं।
आपसी सम्मान से घर का वातावरण अच्छा रहता है।
परीक्षा टिप
कहानी का अंत (बच्चे की मृत्यु, ‘खुशीवाले घर में यह नहीं कहते’) और शीर्षक की सार्थकता सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
उड़ान में चंद्रसेन विराट की दो गजलें हैं। पहली गजल का स्वर स्वाभिमान है – जिसके पास योग्यता है, उसे कुछ माँगना नहीं पड़ता: आदर, नमन, सपने अपने आप मिलते हैं; परों में शक्ति हो तो पंछी पूरा आकाश नाप लेता है, गगन माँगता नहीं। दूसरी गजल में जीवन के अनुभव हैं – ऊँची उड़ान के साथ थकान भी आती है, कम बोलने वाले की आँख ही उसकी जुबान होती है, अपनी हथेली ही धूप में छाया देती है और शायर की जिंदगी धूपदान की तरह खुशबू देती है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: चंद्रसेन विराट (जन्म ३ दिसंबर १९३६, इंदौर, म.प्र.) – हिंदी गजल के शीर्षस्थ गजलकारों में; नवगीतों और गजलों से मिली-जुली मुक्तिकाओं में आम आदमी के जीवन का गहरा चित्रण।
प्रमुख कृतियाँ: मेंहदी रची हथेली, स्वर के सोपान, मिट्टी मेरे देश की, धार के विपरीत (गीत संग्रह); आस्था के अमलतास, कचनार की टहनी, न्याय कर मेरे समय (गजल संग्रह); कुछ पलाश कुछ पाटल, कुछ सपने कुछ सच (मुक्तक संग्रह)।
विधा – गजल: एक ही बहर और वजन में लिखे शेरों का समूह; पहला शेर मतला, अंतिम शेर मकता।
गजल १ – माँगा नहीं करते: अँधेरे के इलाके में किरण, काँटों के वन में फूल नहीं माँगे जाते – परिस्थिति से लड़ना पड़ता है।
जिसे आदर का अधिकार है, उसके आगे लोग स्वयं सिर झुकाते हैं – नमन माँगा नहीं जाता।
परों में शक्ति हो तो पूरा उपलब्ध आकाश नाप लो – पंछी उड़ान के लिए गगन नहीं माँगते।
जिसे मन-प्राण से चाहा, उसके सपने बिना निमंत्रण आते हैं।
जिन्होंने पश्चात्ताप में जलना स्वीकार कर लिया, वे भीतर से सुलगते हैं – बाहर से अगन नहीं माँगते।
गजल २ – अनुभव: ऊँची उड़ान वाले को भारी थकान होती है; कम बोलने और ज्यादा देखने वाले की आँख उसकी जुबान होती है।
अपनी हथेली ही धूप में सायबान (छाया) बनती है – आत्मनिर्भरता।
बहरे को गूँगा बयान दे – ऐसी है जिंदगी (विवशता पर व्यंग्य); जिसकी कमान कान तक खिंचती है, उसका तीर दूर जाता है (पूरी तैयारी)।
शायर की जिंदगी धूपदान होती है – स्वयं जलकर खुशबू देती है।
Q3. सरल भावार्थ लिखिए : ‘अँधेरे के इलाके में … नमन माँगा नहीं करते।’
अँधेरे में रहने वाले रोशनी की भीख नहीं माँगते, और काँटों के जंगल में फूलों की माँग नहीं की जाती – कठिनाइयों का सामना स्वयं करना पड़ता है। जो सचमुच सम्मान के योग्य होता है, उसके आगे लोग स्वयं सिर झुकाते हैं; सम्मान माँगकर नहीं मिलता।
Q4. कविता द्वारा दिया गया संदेश अपने शब्दों में लिखिए।
योग्यता और परिश्रम से सब कुछ अपने आप मिलता है।
स्वाभिमान से जियो, किसी से भीख मत माँगो।
अपनी शक्ति पर भरोसा रखो – आत्मनिर्भर बनो।
बड़े लक्ष्य के लिए पूरी तैयारी और त्याग जरूरी है।
Q5. कल्पना पल्लवन : ‘मैं चिड़िया बोल रही हूँ।’
मैं एक छोटी-सी चिड़िया हूँ। मेरे छोटे पंखों में बड़ा हौसला है। पहले आँगन के पेड़ों पर मेरा घोंसला होता था, पर अब कटते पेड़ों और मोबाइल टावरों से मेरा घर छिन रहा है। मुझे दाना-पानी और थोड़ी-सी हरियाली चाहिए। अगर आप पेड़ लगाएँगे और छत पर पानी का बर्तन रखेंगे, तो मैं फिर आपके आँगन में चहचहाऊँगी।
परीक्षा टिप
गजल की परिभाषा (मतला, मकता) और ‘माँगा नहीं करते’ वाली पंक्तियों के प्रतीक याद रखें; पूरी गजल न लिखें, भावार्थ अपने शब्दों में दें।
मेरे पिता जी (पूरक पठन) हरिवंशराय ‘बच्चन’ की आत्मकथा का अंश है। इसमें बच्चन जी अपने पिता प्रताप (पायनियर प्रेस में क्लर्क) के रहन-सहन, व्यक्तित्व और दिनचर्या का चित्रण करते हैं – समय की पाबंदी, सादी पोशाक, रोज कई मील पैदल चलना, सुबह तीन बजे उठकर गंगा स्नान, रामचरितमानस का नवाह्निक पाठ, दंगे में साहस और सद्भाव का संदेश। लेखक बताते हैं कि पिता के मानस-पाठ के स्वर ने उनके संस्कार गढ़े।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: हरिवंशराय ‘बच्चन’ (जन्म २७ नवंबर १९०७, प्रतापगढ़, उ.प्र.; मृत्यु १८ जनवरी २००३) – उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवि; ‘मधुशाला’ ने लोकप्रियता के नए कीर्तिमान बनाए।
प्रमुख कृतियाँ: मधुशाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अंतर, खादी के फूल, हलाहल, धार के इधर-उधर (कविता संग्रह); क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक (आत्मकथा के ४ खंड)।
विधा – आत्मकथा: व्यक्ति स्वयं अपने जीवन की कथा स्मृतियों के आधार पर लिखता है; निष्पक्षता आवश्यक।
दफ्तर में: समय की पाबंदी, शुद्ध-स्वच्छ लिखावट, साफ हिसाब-किताब, विनम्र व्यवहार; सहकर्मियों का पिछड़ा काम भी रात तक निपटाते – अधिकारियों और सहकर्मियों दोनों के प्रिय।
दफ्तर चार मील पैदल – न साइकिल खरीदी, न सवारी की।
पोशाक: दफ्तर के लिए काला जूता, ढीला पाजामा, अचकन, दुपल्ली टोपी, जाड़े में माँ का बुना गुलूबंद; बाहर धोती, बंद गले का कोट, फेल्ट कैप, हाथ में छाता या मोटी छड़ी।
दंगे का प्रसंग: मोटा डंडा कंधे पर लेकर नंगे पाँव गए और कहा – मैं लड़ने नहीं आया, डंडा आत्मरक्षा के लिए है; धर्म का नाता है तो इन्सानियत का नाता भी है; कुछ लोगों के कट-मरने से न हिंदुत्व खत्म होगा न इस्लाम; मेल से रहने में ही खूबी है। उनके मुहल्ले में फिर शांति रही।
दिनचर्या: सुबह तीन बजे उठना, साढ़े तीन बजे तीन-चार मील दूर गंगा स्नान, साढ़े छह बजे सुराही में गंगाजल लेकर लौटना, पूजा की कोठरी (कोई मूर्ति नहीं, देवताओं की तस्वीरें) में मानस का नवाह्निक पाठ और मौन गीता पाठ।
साढ़े आठ बजे पूजा से उठकर नौ बजे तक दफ्तर; ३५ वर्ष की नौकरी में एक दिन भी देर नहीं; भोजन तैयार न हो तो बिना खाए चले जाते, माँ खाना भिजवाने तक उपवास करतीं।
दिन में सोलह मील पैदल, फिर भी रात को घूमना – ‘चलने का मर्ज’; मानना था – ‘नींद लंबाई नहीं गहराई माँगती है’।
संस्कार: बचपन में रोते लेखक का खटोला पूजा की कोठरी के सामने रखते ही वे चुप हो जाते; मानस की ध्वनियों ने बाद में गीता का अवधी रूप ‘जनगीता’ लिखने में मदद की।
महत्वपूर्ण शब्द
अचकन – लंबा कोट जैसा पहनावा
गुलूबंद – गले में लपेटा जाने वाला ऊनी कपड़ा
नवाह्निक पाठ – नौ दिन में पूरी रामायण पढ़ना
रेहल – पुस्तक रखने का स्टैंड
सौरी – प्रसूति गृह
नैमित्तिक – नियत, निश्चित
चलास – चलने की इच्छा
भाषा अध्ययन
विधा की विशेषताएँ: उत्तम पुरुष (‘मैं’) में वर्णन, स्मृतियों का क्रम, निष्पक्ष चित्रण।
मुहावरे: जीभ ऐंठना – बोलने में कठिनाई; मर्ज होना – आदत/लत होना; असर होना – प्रभाव पड़ना।
भाषा-संबंधी विचार: लेखक को ब्रज-अवधी की कविता घंटों पढ़ना सहज लगता है; खड़ी बोली की कविता उन्हें ‘कोष से उतरी हुई’ लगती है।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : पिता जी की दफ्तर संबंधी विशेषताएँ।
समय की पाबंदी, शुद्ध-स्वच्छ लिखावट, सही-साफ हिसाब-किताब, विनम्र-निश्छल व्यवहार, सहकर्मियों के काम में मदद।
Q2. पिता जी की पोशाक का वर्णन कीजिए।
दफ्तर के लिए काला जूता, ढीला पाजामा, अचकन और दुपल्ली टोपी; जाड़ों में ऊनी गुलूबंद; दफ्तर के बाहर धोती, बंद गले का कोट और फेल्ट कैप; हाथ में छाता या मोटी छड़ी।
Q3. दंगे के समय पिता जी द्वारा दिया गया संदेश लिखिए।
वे लड़ने नहीं आए, डंडा केवल आत्मरक्षा के लिए है।
चार मिलकर एक को पीटें, यह बहादुरी नहीं।
धर्म के साथ इन्सानियत का नाता भी है; इन्सान मेल से रहने को बना है।
कुछ लोगों के मरने से कोई धर्म खत्म नहीं होता, इसलिए मेल से रहें।
Q4. पिता जी की दिनचर्या संक्षेप में लिखिए।
सुबह तीन बजे उठकर गंगा स्नान और पूजा-पाठ।
साढ़े आठ बजे भोजन, नौ बजे दफ्तर।
देर शाम लौटकर पढ़ना या घूमना।
रात कितनी भी देर से सोएँ, सुबह तीन बजे उठना।
Q5. स्वमत : ‘अलग-अलग भाषाओं का ज्ञान व्यक्तित्व को समृद्ध करता है।’
भाषाएँ विभिन्न संस्कृतियों और साहित्य से जोड़ती हैं।
संवाद कौशल और आत्मविश्वास बढ़ता है।
रोजगार और यात्रा में सुविधा होती है।
सोचने का दायरा विस्तृत होता है।
परीक्षा टिप
यह पूरक पठन है – पिता जी के गुण (समयपालन, सादगी, साहस, धार्मिकता) और दंगे का प्रसंग उदाहरण सहित याद रखें।
अपराजेय कमल कुमार की वर्णनात्मक कहानी है। साठ वर्षीय अमरनाथ हाईवे पर कार दुर्घटना में घायल होते हैं; ड्राइवर की मृत्यु हो जाती है। जहर फैलने के कारण पहले उनकी टाँग, फिर दाईं बाँह काटनी पड़ती है, और अंत में आवाज भी चली जाती है। फिर भी वे हर बार हँसकर नई राह चुनते हैं – पहले चित्रकारी और बागवानी, फिर शास्त्रीय संगीत, और अंत में प्रकृति की सूक्ष्म ध्वनियाँ सुनकर आनंद लेना। कोई भी संकट उन्हें हरा नहीं पाता – वे सचमुच अपराजेय हैं।
मुख्य बिंदु
लेखिका परिचय: कमल कुमार (जन्म ७ अक्तूबर १९४६, अंबाला, हरियाणा) – कहानियाँ जीवन के अनुभवों से भरी; उनमें आसक्ति, आस्था, आशा और जीवन का स्पंदन।
प्रमुख कृतियाँ: पहचान, क्रमशः, फिर से शुरू (कहानी संग्रह); अपार्थ, आवर्तन, हैमबरगर, पासवर्ड (उपन्यास)।
विधा – वर्णनात्मक कहानी: जीवन की किसी घटना का रोचक, प्रवाही वर्णन।
दुर्घटना अलवर के रास्ते पर हुई; ट्रकवाला टक्कर मारकर भाग गया; अधिक रक्तस्राव से दस साल पुराने ड्राइवर की मृत्यु।
होश आने पर अमरनाथ हँसे – ‘मुझे अभी मरना ही नहीं था’; उन्हें ड्राइवर को न बचा पाने का दुख था।
टाँग कटना: चार घंटे बिना देखभाल पड़े रहने से जहर फैला; बोले – साठ साल इन टाँगों से खूब घुमक्कड़ी की, जीने के लिए सिर्फ टाँगें थोड़े ही हैं, हाथ हैं – ‘मेरा जीवन तीन फीट की टाँग से तो बड़ा ही होगा।’
बाहर की जमीन में ऋतुओं के क्रम से फूलों का बगीचा, पीछे फलों के पेड़, चारदीवारी पर बेलें – ‘मैं जीवन का व्याकरण बना रहा हूँ।’
बाँह कटना: दाईं बाँह में खून की गर्दिश बंद, जहर फैला – ‘आखिर मैं बाँह तो नहीं हूँ न!’; बाएँ हाथ से सारे काम सीख लिए।
शास्त्री जी से शास्त्रीय गायन सीखना – ध्रुपद, खयाल, ठुमरी; सुबह-शाम रियाज।
आवाज जाना: तेज बुखार के बाद आवाज चली गई, पर आँखें हँसती रहीं; संगीतज्ञों के कैसेट-डिस्क सुनने लगे – ‘मेरी साधना अधूरी रही, पर दूसरों की सिद्धि का लाभ ले सकता हूँ।’
अब बगीचे में पक्षियों का कलरव, सूखे पत्तों का झरना, कलियों का चटखना, ओस की टिपटिप जैसी सूक्ष्म ध्वनियाँ सुनते – चेहरे पर उजास।
संदेश: हर परिस्थिति का सामना साहस और सकारात्मकता से करो; कला जीवन के दुख भुला देती है।
महत्वपूर्ण शब्द
अपराजेय – जिसे हराया न जा सके
अकुलाहट – व्याकुलता, बेचैनी
त्वरा – शीघ्रता
घुमक्कड़ी – घूमने की क्रिया
परिदृश्य – चारों ओर का दृश्य
ईजल – कैनवस रखने का स्टैंड
रियाज – अभ्यास
उजास – प्रकाश
भाषा अध्ययन
जिनका वचन नहीं बदलता (परिच्छेद से): जीवन, सच, प्यार, पानी, दूध – कुछ शब्द सदा एकवचन में; कुछ जैसे ‘प्राण’, ‘दर्शन’, ‘हस्ताक्षर’ सदा बहुवचन में।
स्वतंत्रता गान गोपालसिंह नेपाली का प्रेरणागीत है। इसमें स्वतंत्रता को एक दीपक माना गया है, जो शक्ति, भक्ति और बलिदान से जलाया गया है। कवि हर परिस्थिति में – घोर अंधकार, तेज हवा, नदी की तेज धार, शांति-अशांति, युद्ध-संधि-क्रांति, आँधी-तूफान – इस दीपक को बुझने न देने का आह्वान करते हैं, क्योंकि यह रात का दिया सवेरा लाने वाला है, स्वदेश का प्राण है और शहीदों का पुण्य दान है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: गोपालसिंह नेपाली (मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह; जन्म ११ अगस्त १९११, बेतिया, चंपारण, बिहार; मृत्यु १७ अप्रैल १९६३) – छायावादोत्तर काल के महत्त्वपूर्ण कवि; राष्ट्रप्रेम, प्रकृति प्रेम और मानवीय भावनाओं का सुंदर चित्रण।
प्रमुख कृतियाँ: उमंग, पंछी, रागिनी, नीलिमा, पंचमी, रिमझिम (काव्य संग्रह); रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी पत्रिकाओं का संपादन।
विधा – प्रेरणागीत: ऐसे गीत जो दिलों में उतरकर जूझने की शक्ति और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
टेक: ‘यह दिया बुझे नहीं’।
पहला बंद: घोर अंधकार हो या तेज हवा, आज द्वार-द्वार पर यह दिया न बुझे – यह रात (निशीथ) का दिया सवेरा (विहान) ला रहा है।
दूसरा बंद: यह दीपक शक्ति ने, भक्ति ने दिया है – यह स्वतंत्रता का दिया है; नाव रुके नहीं, बहाव तेज हो – गंगा की धार पर भी यह न बुझे, यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है।
तीसरा बंद: यह अतीत की कल्पना, विनीत प्रार्थना, पुनीत भावना और अनंत साधना है; शांति हो या अशांति, युद्ध, संधि या क्रांति – किनारे पर, देश और समाज पर यह ज्योति का वितान (छत्र) है।
चौथा बंद: आस-पास थोड़े फूल और धूल, बाँस-बबूल, घास के दुकूल; हवा हिलोर दे – कब्र और मजार पर भी यह दिया न बुझे, यह किसी शहीद का पुण्य प्राणदान है।
पाँचवाँ बंद: बदलियाँ झूमें, बिजलियाँ चमकें, आँधियाँ उठें, देश लड़ रहा हो, विशेष यातना हो – छोटी-मोटी जीत-हार पर यह दिया न बुझे; यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है।
संदेश: स्वतंत्रता शहीदों के बलिदान से मिली है; हर हाल में उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।
शक्ति का, शक्ति को, भक्ति से दिया हुआ – यह स्वतंत्रता का दिया है।
Q3. ‘यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है’ – कवि की भावना स्पष्ट कीजिए।
स्वतंत्रता देशवासियों के मन की स्वतंत्र भावना है।
यह गीत उसी भावना को प्रकट करता है।
संकट, यातना या छोटी-मोटी हार में भी यह भावना कमजोर न हो।
हर देशवासी को स्वतंत्रता की रक्षा का संकल्प लेना चाहिए।
Q4. कवि किन-किन परिस्थितियों में दिया बुझने नहीं देना चाहते?
घोर अंधकार और तेज हवा में।
नदी के तेज बहाव में।
शांति-अशांति, युद्ध, संधि और क्रांति में।
आँधी-तूफान, देश के संघर्ष और यातना में।
Q5. कल्पना पल्लवन : ‘विश्व स्तर पर भारत की पहचान निराली है।’
भारत विविधता में एकता का देश है – अनेक भाषाएँ, धर्म और संस्कृतियाँ एक साथ फलती-फूलती हैं। योग, आयुर्वेद और शांति का संदेश भारत ने दुनिया को दिया। अंतरिक्ष अनुसंधान, सूचना प्रौद्योगिकी और लोकतंत्र में भारत ने अपनी अलग पहचान बनाई है। इसलिए विश्व में भारत का स्थान सम्मान का है।
परीक्षा टिप
टेक ‘यह दिया बुझे नहीं’ और हर बंद के अंत की पंक्ति (विहान, प्राण, वितान, प्राणदान, स्वतंत्र गान) याद रखें – कृति प्रश्न इन्हीं से बनते हैं।
रचना विभाग एवं व्याकरण विभाग पुस्तक का अंतिम भाग है, जिसमें पूरे वर्ष के व्याकरण और लेखन कौशल का सार दिया गया है। व्याकरण विभाग में शब्द के भेद (विकारी-अविकारी), संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, अव्यय, क्रिया के काल, वाक्य के प्रकार, संधि, शुद्धीकरण, मुहावरे और शब्द संपदा हैं। रचना विभाग में पत्रलेखन (कार्यालयीन/व्यावसायिक), कहानी लेखन, गद्य आकलन (प्रश्न निर्मिति), वृत्तांत लेखन, प्रसंग वर्णन, विज्ञापन और निबंध लेखन की जानकारी है।
मुख्य बिंदु
शब्द के भेद: विकारी (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया) और अविकारी/अव्यय (क्रियाविशेषण, संबंधसूचक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक)।
काल: वर्तमान (सामान्य, अपूर्ण, पूर्ण), भूत (सामान्य, अपूर्ण, पूर्ण), भविष्य (सामान्य)।
वाक्य – अर्थ की दृष्टि से: विधानार्थक, निषेधार्थक, प्रश्नार्थक, आज्ञार्थक, विस्मयादिबोधक, संदेशसूचक। रचना की दृष्टि से: साधारण, मिश्र, संयुक्त।
संधि: स्वर, व्यंजन, विसर्ग।
शब्द संपदा: लिंग, वचन, विलोम, पर्यायवाची, शब्द-युग्म, अनेक शब्दों के लिए एक शब्द, भिन्नार्थक शब्द, विरामचिह्न, उपसर्ग-प्रत्यय।
पत्रलेखन: कार्यालयीन – बैंक, डाक, बिजली, महानगर निगम, शिक्षण मंडल, प्रशंसा पत्र, बिल संबंधी शिकायत; व्यावसायिक – वस्तु की माँग, दोषपूर्ण सामग्री की शिकायत, आरक्षण, प्रवेश/नौकरी के लिए आवेदन।
कहानी लेखन: मुद्दों, शब्दों या कहावत/सुवचन पर आधारित; शीर्षक और सीख आवश्यक।
गद्य आकलन: ‘कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे, कितना, किसका’ जैसे प्रश्नवाचक शब्दों से एक-वाक्य उत्तर वाले पाँच प्रश्न बनाना।
वृत्तांत (६०-८० शब्द), प्रसंग वर्णन (६०-७० शब्द), विज्ञापन, निबंध – विषय: हिंदी दिवस, शिक्षक दिवस, स्वच्छता आदि।
महत्वपूर्ण शब्द
विकारी शब्द – जिनका रूप लिंग, वचन, कारक से बदलता है
अव्यय – जिनका रूप नहीं बदलता
वृत्तांत – किसी कार्यक्रम का क्रमबद्ध विवरण (स्थान, तिथि, समय सहित)
प्रसंग वर्णन – दी गई स्थिति का सजीव वर्णन
लोकोक्ति – लोक में प्रचलित कहावत, पूर्ण वाक्य
सुवचन – सूक्ति, प्रेरक वचन
भाषा अध्ययन
मुहावरे (पुस्तक की सूची से): एड़ी-चोटी का जोर लगाना – पूरी ताकत लगाना; घाट-घाट का पानी पीना – बहुत अनुभवी होना; पत्थर की लकीर होना – अटल होना; लकीर का फकीर होना – पुरानी रीति पर चलना; रंगा सियार होना – धोखेबाज होना।
लोकोक्तियाँ: अधजल गगरी छलकत जाए – कम ज्ञानी अधिक दिखावा करता है; चोर की दाढ़ी में तिनका – दोषी स्वयं घबरा जाता है; अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत – समय निकलने पर पछताना व्यर्थ।
सुवचन: वसुधैव कुटुंबकम्, सत्यमेव जयते, जल ही जीवन है, करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. विकारी शब्दों के चार भेद लिखिए।
संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया।
Q2. रचना की दृष्टि से वाक्य के भेद उदाहरण सहित लिखिए।
साधारण – राम पढ़ता है। मिश्र – जो परिश्रम करता है, वह सफल होता है। संयुक्त – मैं बाजार गया और फल खरीदे।
Q3. पत्र के प्रकार और उनके क्षेत्र लिखिए।
कार्यालयीन – बैंक, डाक विभाग, महानगर निगम, शिक्षण मंडल।
व्यावसायिक – वस्तु/पुस्तक की माँग, दोषपूर्ण सामग्री की शिकायत।
आरक्षण हेतु पत्र।
आवेदन पत्र – प्रवेश, नौकरी।
Q4. गद्यांश पर पाँच प्रश्न तैयार करते समय किन बातों का ध्यान रखें?
प्रश्न के उत्तर गद्यांश में ही हों।
उत्तर एक वाक्य में आने चाहिए।
कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे जैसे प्रश्नवाचक शब्दों का प्रयोग।
अंतिम प्रश्न में शीर्षक पूछा जा सकता है।
Q5. वृत्तांत लेखन : ‘हिंदी दिवस’ (संक्षिप्त)।
दिनांक १४ सितंबर को हमारे विद्यालय में हिंदी दिवस उत्साह से मनाया गया। कार्यक्रम सुबह दस बजे सभागृह में सरस्वती पूजन से आरंभ हुआ। मुख्य अतिथि ने हिंदी के महत्त्व पर विचार रखे। विद्यार्थियों ने कविता पाठ, भाषण और नाटिका प्रस्तुत की। निबंध प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार दिए गए। आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।
परीक्षा टिप
व्याकरण में भेदों के साथ एक-एक उदाहरण लिखें; वृत्तांत में स्थान, तिथि, समय और कार्यक्रम का क्रम अवश्य दें।