हिंदी उपन्यास का आरंभ भारतेंदु युग में हुआ। लाला श्रीनिवासदास का परीक्षा गुरु (1882) अंग्रेज़ी ढंग का पहला मौलिक हिंदी उपन्यास माना जाता है। प्रेमचंद ने उपन्यास को समाज के यथार्थ से जोड़कर शिखर पर पहुँचाया। उनके बाद मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक, आंचलिक और समकालीन उपन्यासों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई।
मुख्य बिंदु
पूर्व-प्रेमचंद युग: उपदेशात्मक और सामाजिक उपन्यास (परीक्षा गुरु, श्रद्धाराम फुल्लौरी का 'भाग्यवती'); देवकीनंदन खत्री के तिलिस्मी-ऐयारी उपन्यास चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति, जिन्हें पढ़ने के लिए बहुत लोगों ने हिंदी सीखी; किशोरीलाल गोस्वामी के सामाजिक-ऐतिहासिक उपन्यास।
प्रेमचंद युग: सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, निर्मला, गबन और गोदान (1936)। किसान, स्त्री, दहेज, शोषण और राष्ट्रीय आंदोलन का यथार्थ चित्रण।
मनोवैज्ञानिक उपन्यास: जैनेंद्र कुमार (परख, सुनीता, त्यागपत्र), इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय (शेखर: एक जीवनी, नदी के द्वीप)।
समकालीन उपन्यास में दलित, स्त्री, आदिवासी जीवन, विभाजन, भूमंडलीकरण और ग्रामीण संकट प्रमुख विषय हैं।
महत्वपूर्ण शब्द
उपन्यास – जीवन का विस्तृत, समग्र चित्र देने वाली लंबी गद्य कथा।
तिलिस्मी-ऐयारी – जादुई महलों और चालाक जासूसों की कल्पनात्मक कथाएँ।
आंचलिक उपन्यास – किसी एक अंचल (क्षेत्र) का जीवन, बोली और संस्कृति ही जिसका नायक हो।
मनोवैज्ञानिक उपन्यास – पात्रों के अंतर्मन और मानसिक संघर्ष पर केंद्रित।
उपन्यास के तत्व – कथावस्तु, पात्र, संवाद, देशकाल-वातावरण, भाषा-शैली, उद्देश्य।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
1882 – परीक्षा गुरु (लाला श्रीनिवासदास)।
देवकीनंदन खत्री – चंद्रकांता।
प्रेमचंद – गोदान (1936), गबन, निर्मला, रंगभूमि।
जैनेंद्र कुमार – त्यागपत्र, सुनीता।
अज्ञेय – शेखर: एक जीवनी।
फणीश्वरनाथ रेणु – मैला आँचल (1954)।
श्रीलाल शुक्ल – राग दरबारी।
भीष्म साहनी – तमस।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. हिंदी का पहला मौलिक उपन्यास किसे माना जाता है?
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार लाला श्रीनिवासदास का 'परीक्षा गुरु' (1882) अंग्रेज़ी ढंग का पहला मौलिक हिंदी उपन्यास है। कुछ विद्वान श्रद्धाराम फुल्लौरी के 'भाग्यवती' को भी पहला उपन्यास मानते हैं।
Q2. आंचलिक उपन्यास किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए।
जिस उपन्यास में किसी विशेष अंचल का जीवन, लोक-संस्कृति, बोली और समस्याएँ केंद्र में हों, उसे आंचलिक उपन्यास कहते हैं। रेणु का 'मैला आँचल' इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।
हिंदी नाटक का वास्तविक विकास भारतेंदु युग से हुआ। भारतेंदु ने रंगमंच के योग्य, सामाजिक और राष्ट्रीय विषयों वाले नाटक लिखे। जयशंकर प्रसाद ने ऐतिहासिक नाटकों से इसे ऊँचाई दी, लक्ष्मीनारायण मिश्र ने समस्या नाटक लिखे और स्वतंत्रता के बाद मोहन राकेश ने आधुनिक हिंदी रंगमंच को नई दिशा दी।
मुख्य बिंदु
भारतेंदु के अनुसार उनके पिता गोपालचंद्र 'गिरिधरदास' का 'नहुष' हिंदी का पहला नाटक है।
भारतेंदु युग: अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र, नीलदेवी; प्रहसन और व्यंग्य; पारसी रंगमंच के मनोरंजक नाटकों के मुकाबले सार्थक नाटक।
प्रसाद युग: जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, अजातशत्रु, ध्रुवस्वामिनी। इनमें राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति का गौरव और काव्यात्मक भाषा है।
प्रसाद के नाटकों पर अभिनेयता (मंच पर खेलने में कठिनाई) को लेकर आलोचना भी हुई।
प्रसादोत्तर युग: लक्ष्मीनारायण मिश्र के समस्या नाटक (संन्यासी, राक्षस का मंदिर, सिंदूर की होली); हरिकृष्ण 'प्रेमी' (रक्षाबंधन); सेठ गोविंददास; उपेंद्रनाथ अश्क (अंजो दीदी); जगदीशचंद्र माथुर (कोणार्क)।
स्वातंत्र्योत्तर युग: मोहन राकेश के आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे; धर्मवीर भारती का काव्य-नाटक अंधा युग।
अन्य: लक्ष्मीनारायण लाल, सुरेंद्र वर्मा (सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक), भीष्म साहनी (हानूश, कबिरा खड़ा बाज़ार में), हबीब तनवीर (चरणदास चोर) – लोकनाट्य शैली के प्रयोग।
आधुनिक नाटक में मध्यवर्गीय जीवन, टूटते संबंध, अस्तित्व का संकट और लोक-रंगमंच के प्रयोग प्रमुख हैं।
एकांकी का भी विकास हुआ: रामकुमार वर्मा, उदयशंकर भट्ट, भुवनेश्वर।
महत्वपूर्ण शब्द
नाटक – रंगमंच पर अभिनय के लिए लिखी दृश्य-काव्य रचना।
रंगमंच – नाटक के प्रदर्शन का स्थान और उसकी पूरी कला।
अभिनेयता – नाटक का मंच पर सफलतापूर्वक खेले जाने का गुण।
समस्या नाटक – किसी सामाजिक या वैयक्तिक समस्या पर केंद्रित नाटक।
प्रहसन – हास्य-व्यंग्य प्रधान छोटा नाटक।
एकांकी – एक अंक का नाटक।
नाटक के तत्व – कथावस्तु, पात्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य, अभिनेयता।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
गोपालचंद्र 'गिरिधरदास' – नहुष।
भारतेंदु हरिश्चंद्र – अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा।
जयशंकर प्रसाद – चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी।
लक्ष्मीनारायण मिश्र – समस्या नाटकों के प्रवर्तक।
जगदीशचंद्र माथुर – कोणार्क।
मोहन राकेश – आषाढ़ का एक दिन, आधे-अधूरे।
धर्मवीर भारती – अंधा युग।
हबीब तनवीर – चरणदास चोर।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. प्रसाद के नाटकों की दो विशेषताएँ लिखिए।
प्रसाद के नाटक ऐतिहासिक हैं और उनमें राष्ट्रीयता तथा भारतीय संस्कृति का गौरव है। उनकी भाषा काव्यात्मक और संस्कृतनिष्ठ है, जिसमें गीतों का भी प्रयोग हुआ है।
Q2. 'आषाढ़ का एक दिन' के लेखक कौन हैं? इसका विषय बताइए।
इसके लेखक मोहन राकेश हैं। यह कवि कालिदास और मल्लिका के जीवन पर आधारित है, जिसमें सृजन, प्रेम और सत्ता के बीच के द्वंद्व को दिखाया गया है।
Q3. हिंदी नाटक के विकास पर प्रकाश डालिए।
आरंभ: नहुष और भारतेंदु के नाटक।
भारतेंदु युग: सामाजिक-राष्ट्रीय विषय, प्रहसन।
प्रसाद युग: ऐतिहासिक नाटक।
प्रसादोत्तर: समस्या नाटक (लक्ष्मीनारायण मिश्र)।
स्वातंत्र्योत्तर: मोहन राकेश, अंधा युग।
लोकनाट्य प्रयोग: हबीब तनवीर।
एकांकी का विकास।
Q4. मोहन राकेश के नाट्य साहित्य का मूल्यांकन कीजिए।
तीन प्रमुख नाटक: आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे।
आधुनिक मनुष्य का अकेलापन और द्वंद्व।
स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता।
'आधे-अधूरे' में मध्यवर्गीय परिवार का बिखराव।
सहज, बोलचाल की नाट्य भाषा।
रंगमंच की गहरी समझ; हिंदी रंगमंच को नई दिशा।
Q5. नाटक के तत्वों का परिचय दीजिए।
कथावस्तु: मुख्य और गौण कथाएँ।
पात्र और चरित्र-चित्रण।
संवाद: संक्षिप्त, पात्रानुकूल।
देशकाल और वातावरण।
भाषा-शैली।
उद्देश्य।
अभिनेयता: रंगमंच पर खेले जाने की योग्यता।
परीक्षा टिप
नाटक के उत्तर में 'अभिनेयता' और 'रंगमंच' शब्दों का प्रयोग करें; यही नाटक को अन्य विधाओं से अलग करता है। नाटककार-नाटक की जोड़ियाँ सही लिखें।
एकांकी एक अंक का छोटा नाटक है, जिसमें जीवन की किसी एक घटना, समस्या या मनःस्थिति को कम पात्रों और कम समय में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। भारतेंदु युग के छोटे नाटकों और प्रहसनों में इसके बीज मिलते हैं, पर आधुनिक हिंदी एकांकी का वास्तविक विकास 1930 के आसपास हुआ। जयशंकर प्रसाद, भुवनेश्वर और डॉ. रामकुमार वर्मा इसके आरंभिक प्रमुख लेखक हैं। रेडियो ने एकांकी को और लोकप्रिय बनाया।
मुख्य बिंदु
भारतेंदु युग: 'अंधेर नगरी' जैसे छोटे प्रहसन, जिनमें व्यंग्य प्रधान है; इन्हें एकांकी की पृष्ठभूमि माना जाता है।
प्रसाद की 'एक घूँट' को कई विद्वान आधुनिक ढंग का पहला हिंदी एकांकी मानते हैं, पर इस पर मतभेद है।
भुवनेश्वर के संग्रह 'कारवाँ' ने पश्चिमी शैली के यथार्थवादी एकांकी की शुरुआत की।
डॉ. रामकुमार वर्मा ने ऐतिहासिक और सामाजिक एकांकियों से विधा को प्रतिष्ठा दी; उनके संग्रह 'पृथ्वीराज की आँखें' और 'रेशमी टाई' प्रसिद्ध हैं। उन्हें एकांकी सम्राट भी कहा जाता है।
उपेंद्रनाथ 'अश्क' ('तौलिए') ने मध्यवर्गीय जीवन की समस्याओं पर व्यंग्यपूर्ण एकांकी लिखे।
जगदीशचंद्र माथुर ('भोर का तारा', 'रीढ़ की हड्डी') ने सामाजिक विसंगतियों को सरल और रंगमंचीय ढंग से रखा।
सेठ गोविंददास, उदयशंकर भट्ट, लक्ष्मीनारायण मिश्र, विष्णु प्रभाकर आदि ने एकांकी को विविधता दी।
रेडियो (आकाशवाणी) के लिए ध्वनि-नाटक और रूपक लिखे गए, जिनमें संवाद और ध्वनि-प्रभाव ही सब कुछ हैं।
स्वतंत्रता के बाद नुक्कड़ नाटक और प्रयोगधर्मी एकांकी भी आए।
विषय: सामाजिक कुरीतियाँ, दहेज, नारी-समस्या, मध्यवर्गीय जीवन, इतिहास, राष्ट्रीयता, मनोविज्ञान।
महत्वपूर्ण शब्द
एकांकी – एक अंक में पूरा होने वाला लघु नाटक।
प्रहसन – हास्य-व्यंग्य प्रधान छोटा नाटक।
संकलन-त्रय – स्थान, समय और कार्य की एकता।
अभिनेयता – मंच पर सफलतापूर्वक खेले जाने का गुण।
रंग-संकेत – मंच-सज्जा और अभिनय के निर्देश।
ध्वनि-नाटक – रेडियो के लिए लिखा गया नाटक।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
भारतेंदु हरिश्चंद्र – अंधेर नगरी (प्रहसन)।
जयशंकर प्रसाद – एक घूँट।
भुवनेश्वर – कारवाँ।
डॉ. रामकुमार वर्मा – पृथ्वीराज की आँखें, रेशमी टाई।
उपेंद्रनाथ 'अश्क' – तौलिए; जगदीशचंद्र माथुर – भोर का तारा, रीढ़ की हड्डी।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. एकांकी किसे कहते हैं?
एक अंक में समाप्त होने वाले उस लघु नाटक को एकांकी कहते हैं, जिसमें एक घटना या समस्या को कम पात्रों और सीमित समय में प्रस्तुत किया जाता है।
Q2. डॉ. रामकुमार वर्मा के दो एकांकी-संग्रहों के नाम लिखिए।
'पृथ्वीराज की आँखें' और 'रेशमी टाई'।
Q3. एकांकी के तत्त्व लिखिए।
कथावस्तु: एक केंद्रीय घटना।
पात्र और चरित्र-चित्रण: कम पात्र।
संवाद: छोटे, चुस्त, नाटकीय।
देश-काल-वातावरण और संकलन-त्रय।
अभिनेयता और रंग-संकेत।
उद्देश्य।
Q4. नाटक और एकांकी का अंतर स्पष्ट कीजिए।
अंक: अनेक बनाम एक।
कथा: विस्तृत जीवन बनाम एक घटना।
पात्र: अधिक बनाम कम।
समय: लंबा बनाम संक्षिप्त।
प्रभाव: व्यापक बनाम तीव्र और केंद्रित।
Q5. हिंदी एकांकी के विकास-क्रम पर प्रकाश डालिए।
पृष्ठभूमि: भारतेंदु युग के प्रहसन।
आरंभ: प्रसाद, भुवनेश्वर, रामकुमार वर्मा।
विकास: अश्क, माथुर, सेठ गोविंददास, उदयशंकर भट्ट।
रेडियो एकांकी और स्वातंत्र्योत्तर प्रयोग।
निष्कर्ष: आज भी विद्यालय-महाविद्यालय मंच की लोकप्रिय विधा।
परीक्षा टिप
'पहला एकांकी' जैसे विवादित प्रश्न में एक ही नाम पर अड़ने के बजाय दो-तीन मत लिखें और अपना निष्कर्ष दें; परीक्षक इसे संतुलित उत्तर मानते हैं।
प्रेमचंद (1880–1936) हिंदी और उर्दू के महान कथाकार हैं, जिन्हें 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम का सिपाही' कहा जाता है। उन्होंने किसान, मज़दूर, स्त्री, दलित और मध्यवर्ग के जीवन को सच्चाई के साथ अपनी कहानियों और उपन्यासों में उतारा। उनकी रचनाओं ने हिंदी कथा-साहित्य को मनोरंजन से हटाकर जीवन के यथार्थ से जोड़ा।
मुख्य बिंदु
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ। उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।
आरंभ में वे 'नवाब राय' नाम से उर्दू में लिखते थे।
उनका उर्दू कहानी-संग्रह 'सोज़े वतन' (1908) देशभक्ति के स्वर के कारण अंग्रेज़ी सरकार ने ज़ब्त कर लिया। इसके बाद वे 'प्रेमचंद' नाम से लिखने लगे।
प्रमुख उपन्यास: सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, निर्मला, गबन, गोदान (1936); मंगलसूत्र अधूरा रह गया।
लगभग तीन सौ कहानियाँ 'मानसरोवर' (आठ भाग) में संकलित हैं।
प्रसिद्ध कहानियाँ: कफ़न, पूस की रात, ईदगाह, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, नमक का दारोगा, शतरंज के खिलाड़ी, ठाकुर का कुआँ, सद्गति, दो बैलों की कथा।
उन्होंने 'हंस' और 'जागरण' पत्रिकाओं का संपादन किया।
1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता की।
आरंभिक रचनाओं में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद है; अंतिम रचनाओं (गोदान, कफ़न) में कठोर यथार्थवाद।
गोदान में किसान होरी का जीवन-संघर्ष है; होरी की गाय पालने की इच्छा और कर्ज़ में डूबा जीवन भारतीय किसान की त्रासदी है। इसे 'भारतीय किसान का महाकाव्य' कहा जाता है।
भाषा सरल, मुहावरेदार हिंदुस्तानी है, जो आम पाठक तक सीधे पहुँचती है।
8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हुआ।
महत्वपूर्ण शब्द
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद – यथार्थ दिखाते हुए आदर्श समाधान की ओर संकेत।
यथार्थवाद – जीवन को जैसा है, वैसा दिखाना।
किसान जीवन – कर्ज़, लगान, महाजन और ज़मींदार का शोषण।
हिंदुस्तानी – हिंदी-उर्दू की मिली-जुली बोलचाल की भाषा।
मानसरोवर – प्रेमचंद की कहानियों का संकलन।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
1880 – जन्म, लमही (वाराणसी)।
1908 – सोज़े वतन; सरकार द्वारा ज़ब्त।
1936 – गोदान का प्रकाशन; प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन की अध्यक्षता; 8 अक्टूबर को निधन।
Q1. प्रेमचंद का मूल नाम क्या था? उन्होंने किस नाम से लिखना शुरू किया?
प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उन्होंने आरंभ में 'नवाब राय' नाम से उर्दू में लिखना शुरू किया।
Q2. 'कफ़न' कहानी का मूल भाव लिखिए।
'कफ़न' में घीसू और माधव, बुधिया के कफ़न के लिए मिले पैसों से शराब पी जाते हैं। कहानी दिखाती है कि गरीबी और शोषण इंसान की संवेदना को भी मार देते हैं। यह प्रेमचंद के कठोर यथार्थवाद का उदाहरण है।
Q3. प्रेमचंद के कथा-साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
ग्रामीण और किसान जीवन का यथार्थ चित्रण।
स्त्री समस्याएँ: दहेज, अनमेल विवाह, विधवा जीवन।
दलितों और शोषितों के प्रति सहानुभूति।
राष्ट्रीय चेतना और गांधीवादी प्रभाव।
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से यथार्थवाद की ओर।
सजीव पात्र और स्वाभाविक संवाद।
सरल, मुहावरेदार भाषा।
Q4. 'गोदान' को भारतीय किसान का महाकाव्य क्यों कहा जाता है?
होरी के माध्यम से पूरे किसान वर्ग की कहानी।
कर्ज़, लगान और महाजनी शोषण।
गाय की लालसा: किसान का छोटा सपना और उसकी त्रासदी।
गाँव और शहर दोनों कथाओं का समानांतर चित्र।
धनिया का साहस, गोबर की नई पीढ़ी की सोच।
अंत में होरी की मृत्यु और 'गोदान' की विडंबना।
Q5. प्रेमचंद की कहानी-कला पर प्रकाश डालिए।
जीवन से लिए गए सरल कथानक।
मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता (ईदगाह का हामिद)।
सामाजिक उद्देश्य और सुधार भावना।
संक्षिप्त, पात्रानुकूल संवाद।
प्रभावशाली अंत।
मानसरोवर में लगभग तीन सौ कहानियाँ।
परीक्षा टिप
प्रेमचंद पर लंबे उत्तर में कम से कम तीन उपन्यास और तीन कहानियों के नाम उदाहरण के रूप में दें; 'गोदान' और 'कफ़न' का उल्लेख अवश्य करें।
आलोचना का अर्थ है किसी साहित्यिक कृति को अच्छी तरह देखकर उसके गुण-दोषों, अर्थ और मूल्य का निर्णय करना। हिंदी में आधुनिक आलोचना भारतेंदु युग में पुस्तक-समीक्षा के रूप में शुरू हुई, द्विवेदी युग में परिचयात्मक और तुलनात्मक बनी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हाथों वैज्ञानिक और व्यवस्थित हुई और शुक्लोत्तर युग में स्वच्छंदतावादी, मनोविश्लेषणवादी, मार्क्सवादी आदि अनेक धाराओं में विकसित हुई।
मुख्य बिंदु
संस्कृत काव्यशास्त्र (रस, अलंकार, ध्वनि) और रीतिकालीन लक्षण-ग्रंथ आलोचना की पुरानी परंपरा हैं।
भारतेंदु युग: पत्रिकाओं में पुस्तक-समीक्षा; बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' और बालकृष्ण भट्ट प्रमुख।
द्विवेदी युग: महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भाषा और नैतिकता की कसौटी पर निर्णयात्मक आलोचना की ('रसज्ञ रंजन')।
मिश्रबंधुओं ने 'हिंदी नवरत्न' में नौ कवियों का क्रम तय किया; पद्मसिंह शर्मा ने बिहारी पर तुलनात्मक आलोचना की, जिससे 'देव बड़े या बिहारी' विवाद चला।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: 'हिंदी साहित्य का इतिहास', 'चिंतामणि', 'रस मीमांसा'; तुलसी, सूर और जायसी पर विस्तृत आलोचनाएँ।
शुक्लजी की कसौटी लोकमंगल और रस है; उन्होंने रीतिकाल और रहस्यवाद की आलोचना की और तुलसी को सर्वोच्च माना।
हजारीप्रसाद द्विवेदी: 'हिंदी साहित्य की भूमिका', 'कबीर'; ऐतिहासिक-सांस्कृतिक दृष्टि; कबीर का नया मूल्यांकन।
नंददुलारे वाजपेयी: छायावाद के समर्थक; स्वच्छंदतावादी (सौष्ठववादी) आलोचना।
डॉ. नगेंद्र: रसवादी और मनोविश्लेषणवादी आलोचना।
डॉ. रामविलास शर्मा: मार्क्सवादी आलोचना; 'निराला की साहित्य साधना'।
नामवर सिंह: 'कविता के नए प्रतिमान', 'दूसरी परंपरा की खोज'; नई कविता और समकालीन साहित्य का मूल्यांकन।
मुक्तिबोध ('एक साहित्यिक की डायरी') ने रचना-प्रक्रिया और सामाजिक दायित्व पर गहन चिंतन किया।
आज दलित और स्त्री दृष्टि से भी साहित्य का पुनर्मूल्यांकन हो रहा है।
महत्वपूर्ण शब्द
आलोचना / समालोचना – कृति का सम्यक् मूल्यांकन।
निर्णयात्मक आलोचना – निश्चित मानदंडों पर अच्छा-बुरा तय करना।
तुलनात्मक आलोचना – दो रचनाकारों/कृतियों की तुलना।
मार्क्सवादी आलोचना – सामाजिक-आर्थिक संबंधों के आधार पर मूल्यांकन।
मनोविश्लेषणवादी आलोचना – लेखक और पात्रों के मनोविज्ञान के आधार पर।
लोकमंगल – समाज-कल्याण की कसौटी (शुक्ल)।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
रामचंद्र शुक्ल – हिंदी साहित्य का इतिहास (1929), चिंतामणि, रस मीमांसा।
हजारीप्रसाद द्विवेदी – हिंदी साहित्य की भूमिका, कबीर।
रामविलास शर्मा – निराला की साहित्य साधना।
नामवर सिंह – कविता के नए प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज।
मिश्रबंधु – हिंदी नवरत्न।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. 'कविता के नए प्रतिमान' के लेखक कौन हैं?
डॉ. नामवर सिंह।
Q2. आचार्य शुक्ल की आलोचना की मुख्य कसौटी क्या है?
लोकमंगल और रस; जो साहित्य समाज के कल्याण और हृदय के विस्तार में सहायक हो, वही श्रेष्ठ है।
Q3. द्विवेदी युग की आलोचना की विशेषताएँ लिखिए।
निर्णयात्मक और सुधारवादी दृष्टि।
भाषा-शुद्धि पर बल।
परिचयात्मक आलोचना (मिश्रबंधु)।
तुलनात्मक आलोचना (पद्मसिंह शर्मा)।
नैतिक मानदंड।
Q4. हिंदी आलोचना में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
पहला व्यवस्थित साहित्येतिहास।
सैद्धांतिक (रस मीमांसा) और व्यावहारिक (तुलसी, सूर, जायसी) आलोचना।
लोकमंगल की कसौटी।
सीमाएँ: रीतिकाल, कबीर और छायावाद के प्रति कठोरता।
निष्कर्ष: हिंदी आलोचना के शिखर-पुरुष।
Q5. शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना की प्रमुख धाराओं का परिचय दीजिए।
विमर्श का अर्थ है किसी वर्ग के अनुभव, पीड़ा और अधिकारों पर केंद्रित गंभीर चिंतन। दलित विमर्श जाति-व्यवस्था के कारण सदियों से अपमान और शोषण झेलते आए समाज का साहित्य है, जो 'स्वानुभूति' (अपने भोगे हुए अनुभव) पर आधारित है और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों से प्रेरित है। स्त्री विमर्श पितृसत्ता के कारण स्त्री के साथ होने वाले भेदभाव को सामने लाकर उसकी अस्मिता, स्वतंत्रता और समानता की बात करता है। हिंदी में दोनों विमर्श 1980 के बाद विशेष रूप से उभरे।
मुख्य बिंदु
हिंदी दलित साहित्य पर मराठी दलित साहित्य का गहरा प्रभाव है; महाराष्ट्र इस आंदोलन की प्रमुख भूमि रहा।
आरंभिक स्वर के रूप में हीरा डोम की कविता 'अछूत की शिकायत' का उल्लेख होता है, जो 'सरस्वती' पत्रिका में छपी थी।
दलित साहित्य की कसौटी: स्वानुभूति बनाम सहानुभूति – दलित लेखक मानते हैं कि भोगा हुआ यथार्थ ही प्रामाणिक है।
प्रमुख दलित आत्मकथाएँ: ओमप्रकाश वाल्मीकि – 'जूठन'; मोहनदास नैमिशराय – 'अपने-अपने पिंजरे'; तुलसीराम – 'मुर्दहिया'; कौशल्या बैसंत्री – 'दोहरा अभिशाप' (दलित स्त्री की आत्मकथा)।
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने 'दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र' में दलित साहित्य की अलग कसौटी पर विचार किया।
दलित साहित्य के मूल्य: समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय; जाति, अंधविश्वास और ब्राह्मणवादी वर्चस्व का विरोध।
स्त्री विमर्श की पृष्ठभूमि: महादेवी वर्मा के निबंध 'शृंखला की कड़ियाँ'; पश्चिम में सिमोन द बोउवार की 'द सेकंड सेक्स' (हिंदी अनुवाद प्रभा खेतान – 'स्त्री उपेक्षिता')।
Q5. दलित विमर्श और स्त्री विमर्श की समानताओं और अंतरों पर विचार कीजिए।
समानता: हाशिए की आवाज़, अस्मिता, समानता की माँग, आत्मकथा का महत्त्व।
अंतर: जाति बनाम लिंग आधारित शोषण; प्रेरणा-स्रोत।
दलित स्त्री का दोहरा शोषण।
साहित्य और समाज पर प्रभाव।
परीक्षा टिप
विमर्श वाले प्रश्नों में लेखक–रचना के ठोस उदाहरण ही अंक दिलाते हैं। कम से कम चार नाम उनकी रचनाओं के साथ लिखें और महाराष्ट्र के दलित आंदोलन का संदर्भ जोड़ें।
काव्यशास्त्र के आरंभिक प्रश्न तीन हैं: काव्य क्या है (लक्षण), काव्य की रचना कैसे संभव होती है (हेतु) और काव्य क्यों रचा व पढ़ा जाता है (प्रयोजन)। संस्कृत आचार्यों – भामह, दंडी, वामन, मम्मट, विश्वनाथ, जगन्नाथ – ने काव्य की अलग-अलग परिभाषाएँ दीं। मम्मट ने 'काव्यप्रकाश' में काव्य के तीन हेतु (शक्ति/प्रतिभा, निपुणता/व्युत्पत्ति, अभ्यास) और छह प्रयोजन बताए। पश्चिमी और हिंदी विद्वानों ने भी काव्य को अपने ढंग से परिभाषित किया।
मुख्य बिंदु
भामह: शब्द और अर्थ का साथ-साथ होना काव्य है – "शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्"।
दंडी: इच्छित अर्थ से युक्त पदावली काव्य का शरीर है।
वामन: रीति को काव्य की आत्मा माना।
मम्मट ('काव्यप्रकाश'): दोष-रहित, गुण-सहित शब्द और अर्थ काव्य है; अलंकार कहीं-कहीं स्पष्ट न हों तब भी काव्य हो सकता है।
विश्वनाथ ('साहित्यदर्पण'): रसात्मक वाक्य ही काव्य है – "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्"।
पंडितराज जगन्नाथ ('रसगंगाधर'): रमणीय अर्थ प्रकट करने वाला शब्द काव्य है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: हृदय की मुक्तावस्था को रस-दशा कहा और उस अवस्था के लिए वाणी जो शब्द-विधान करती है, उसे कविता माना।
पश्चिमी परिभाषाएँ: वर्ड्सवर्थ – प्रबल भावों का स्वतःस्फूर्त प्रवाह; कॉलरिज – सर्वोत्तम शब्द सर्वोत्तम क्रम में; मैथ्यू आर्नल्ड – जीवन की आलोचना।
काव्य-हेतु (मम्मट): शक्ति/प्रतिभा (जन्मजात क्षमता), निपुणता/व्युत्पत्ति (लोक, शास्त्र और काव्य के अध्ययन से प्राप्त ज्ञान), अभ्यास (काव्य-मर्मज्ञ की शिक्षा में लगातार रचना)। अधिकांश आचार्य प्रतिभा को प्रमुख मानते हैं।
काव्य-प्रयोजन (मम्मट): यश, अर्थ (धन), व्यवहार-ज्ञान, अमंगल का नाश, तुरंत परम आनंद, कांता-सम्मित उपदेश।
'कांता-सम्मित उपदेश' का अर्थ है पत्नी की तरह मधुर, प्रिय ढंग से दी गई सीख – वेद (प्रभु-सम्मित) और पुराण (मित्र-सम्मित) से भिन्न।
आधुनिक दृष्टि में आनंद और लोकमंगल दोनों काव्य के प्रमुख प्रयोजन हैं।
रस को काव्य की आत्मा कहा गया है। काव्य पढ़ने, सुनने या नाटक देखने से जो आनंद मिलता है, वही रस है। आचार्य भरतमुनि ने अपने ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' में रस-सूत्र दिया। रस के चार अंग हैं: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव। मुख्य रूप से नौ रस माने जाते हैं, और बाद में वात्सल्य तथा भक्ति को जोड़कर ग्यारह।
मुख्य बिंदु
भरतमुनि का रस-सूत्र: "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
भरतमुनि ने नाटक के संदर्भ में आठ रस बताए; शांत रस बाद में जोड़ा गया।
स्थायी भाव: मन में स्थायी रूप से रहने वाले भाव, जो रस में बदलते हैं।
विभाव: भाव जगाने वाले कारण। इसके दो भेद: आलंबन (जिसके कारण भाव जागे) और उद्दीपन (जो भाव को बढ़ाए, जैसे चाँदनी, एकांत)।
अनुभाव: भाव जागने पर शरीर की चेष्टाएँ, जैसे आँसू, रोमांच, काँपना।
संचारी (व्यभिचारी) भाव: थोड़ी देर के लिए आने-जाने वाले भाव; इनकी संख्या 33 मानी जाती है (जैसे चिंता, हर्ष, शंका, लज्जा)।
श्रृंगार को रसराज कहा जाता है; इसके दो भेद हैं: संयोग और वियोग (विप्रलंभ)।
महत्वपूर्ण शब्द
रस – काव्य से मिलने वाला अलौकिक आनंद।
सहृदय – काव्य का रस लेने वाला संवेदनशील पाठक/दर्शक।
आलंबन – भाव का मुख्य आधार (जैसे नायक-नायिका)।
उद्दीपन – भाव को तीव्र करने वाली परिस्थितियाँ।
आश्रय – जिसके मन में भाव जागता है।
साधारणीकरण – पात्र का भाव सहृदय का अपना भाव बन जाना।
भाषा अध्ययन
रस और उनके स्थायी भाव
रस
स्थायी भाव
श्रृंगार
रति
हास्य
हास
करुण
शोक
रौद्र
क्रोध
वीर
उत्साह
भयानक
भय
वीभत्स
जुगुप्सा (घृणा)
अद्भुत
विस्मय
शांत
निर्वेद
वात्सल्य
वत्सलता (संतान के प्रति स्नेह)
भक्ति
भगवद्-विषयक रति (अनुराग)
उदाहरण
संयोग श्रृंगार (बिहारी): "बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करै भौंहनि हँसै, दैन कहै नटि जाय॥" – गोपियों ने कृष्ण से बात करने के लालच में मुरली छिपा दी।
वियोग श्रृंगार (सूरदास): "निसिदिन बरसत नैन हमारे।" – कृष्ण के वियोग में गोपियों की आँखें दिन-रात बरसती हैं।
वीर (सुभद्राकुमारी चौहान): "बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।"
रौद्र (मैथिलीशरण गुप्त, जयद्रथ वध): "श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे।"
करुण (हरिऔध, प्रियप्रवास): "प्रिय पति, वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है?" – कृष्ण के मथुरा जाने पर यशोदा का विलाप।
वात्सल्य (सूरदास): "मैया मैं नहिं माखन खायो।"
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. रस की परिभाषा और रस-सूत्र लिखिए।
काव्य पढ़ने-सुनने या नाटक देखने से सहृदय को जो अलौकिक आनंद मिलता है, उसे रस कहते हैं। भरतमुनि का रस-सूत्र है: "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः"।
Q2. वीर और रौद्र रस के स्थायी भाव बताइए।
वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है और रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है।
Q3. रस के अंगों का सोदाहरण परिचय दीजिए।
स्थायी भाव: रति, शोक, क्रोध आदि।
विभाव: आलंबन (नायिका) और उद्दीपन (चाँदनी, बसंत)।
अनुभाव: आँसू, मुस्कान, रोमांच।
संचारी भाव: लज्जा, चिंता, हर्ष (33)।
आश्रय: जिसके मन में भाव जागे।
उदाहरण: वियोग श्रृंगार में गोपियाँ आश्रय, कृष्ण आलंबन, आँसू अनुभाव, चिंता संचारी।
Q4. श्रृंगार रस को रसराज क्यों कहा जाता है? उसके भेद उदाहरण सहित लिखिए।
शब्द में अर्थ को प्रकट करने वाली शक्ति को शब्द-शक्ति कहते हैं। काव्यशास्त्र में तीन शब्द-शक्तियाँ मानी गई हैं: अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। अभिधा से शब्द का सीधा, कोश वाला अर्थ (वाच्यार्थ) मिलता है; लक्षणा से मुख्य अर्थ बाधित होने पर उससे जुड़ा दूसरा अर्थ (लक्ष्यार्थ) मिलता है; और व्यंजना से छिपा हुआ, संकेत वाला अर्थ (व्यंग्यार्थ) मिलता है। काव्य का सौंदर्य विशेष रूप से लक्षणा और व्यंजना में होता है।
मुख्य बिंदु
शब्द और अर्थ का संबंध ही शब्द-शक्ति है; शब्द के तीन रूप – वाचक, लक्षक, व्यंजक – और अर्थ के तीन रूप – वाच्यार्थ, लक्ष्यार्थ, व्यंग्यार्थ।
अभिधा: शब्द का प्रचलित, सीधा अर्थ। जैसे 'गाय दूध देती है' में गाय = पशु।
अभिधा से प्राप्त शब्द तीन प्रकार के माने जाते हैं: रूढ़ (पेड़), यौगिक (विद्यालय), योगरूढ़ (पंकज = कमल)।
लक्षणा की तीन शर्तें: मुख्य अर्थ में बाधा, मुख्य अर्थ से संबंधित दूसरा अर्थ, और उसके पीछे रूढ़ि या प्रयोजन।
लक्षणा के भेद: रूढ़ा – परंपरा से चला आ रहा प्रयोग ('वह बड़ा गधा है' = मूर्ख); प्रयोजनवती – किसी विशेष उद्देश्य से ('गंगा पर गाँव' = गंगा के तट पर गाँव; उद्देश्य – शीतलता और पवित्रता का बोध)।
मुहावरों में प्रायः लक्षणा काम करती है ('आँखें खुलना', 'हाथ खींचना')।
व्यंजना: अभिधा और लक्षणा के रुक जाने पर जो गूढ़ अर्थ निकलता है।
व्यंजना के भेद: शाब्दी (शब्द विशेष पर निर्भर; पर्यायवाची रखने से अर्थ बदल जाए) और आर्थी (वक्ता, श्रोता, प्रसंग, काल पर निर्भर)।
उदाहरण: 'सूरज डूब गया' – किसान के लिए काम खत्म, विद्यार्थी के लिए दीया जलाने का समय, पुजारी के लिए संध्या-आरती; यह आर्थी व्यंजना है।
आनंदवर्धन ने व्यंजना पर आधारित ध्वनि सिद्धांत दिया ('ध्वन्यालोक'); उनके अनुसार व्यंग्यार्थ प्रधान काव्य ही उत्तम काव्य (ध्वनि काव्य) है।
मम्मट ने 'काव्यप्रकाश' में शब्द-शक्तियों का विस्तार से विवेचन किया।
महत्वपूर्ण शब्द
वाच्यार्थ – अभिधा से मिलने वाला सीधा अर्थ।
लक्ष्यार्थ – लक्षणा से मिलने वाला संबंधित अर्थ।
व्यंग्यार्थ – व्यंजना से मिलने वाला संकेतित अर्थ।
ध्वनि – व्यंग्यार्थ की प्रधानता वाला काव्य।
रूढ़ि – परंपरा से स्वीकार किया गया प्रयोग।
प्रयोजन – विशेष उद्देश्य।
भाषा अध्ययन
शब्द-शक्ति
अर्थ
उदाहरण
अभिधा
वाच्यार्थ
शेर जंगल का राजा है।
लक्षणा (रूढ़ा)
लक्ष्यार्थ
वह तो पूरा गधा है। (मूर्ख)
लक्षणा (प्रयोजनवती)
लक्ष्यार्थ
मोहन शेर है। (वीर)
व्यंजना (आर्थी)
व्यंग्यार्थ
शाम हो गई। (प्रसंग के अनुसार अलग अर्थ)
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. शब्द-शक्ति किसे कहते हैं? इसके भेद लिखिए।
शब्द में निहित अर्थ प्रकट करने वाली शक्ति शब्द-शक्ति है; इसके तीन भेद हैं – अभिधा, लक्षणा, व्यंजना।
Q2. 'गंगा पर गाँव' में कौन-सी शब्द-शक्ति है?
प्रयोजनवती लक्षणा; 'गंगा पर' का मुख्य अर्थ (धारा पर) बाधित है, लक्ष्यार्थ है 'गंगा के तट पर', और प्रयोजन है शीतलता-पवित्रता का बोध।
Q3. लक्षणा शब्द-शक्ति को उदाहरण सहित समझाइए।
परिभाषा और तीन शर्तें।
रूढ़ा लक्षणा: उदाहरण।
प्रयोजनवती लक्षणा: उदाहरण।
मुहावरों में लक्षणा।
Q4. व्यंजना शब्द-शक्ति और उसके भेदों का विवेचन कीजिए।
परिभाषा; अभिधा-लक्षणा से अंतर।
शाब्दी व्यंजना: पर्यायवाची रखने पर अर्थ का बदलना।
आर्थी व्यंजना: वक्ता, श्रोता, प्रसंग के अनुसार अर्थ।
'सूरज डूब गया' जैसे उदाहरण।
ध्वनि सिद्धांत से संबंध।
Q5. काव्य में शब्द-शक्तियों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
अभिधा: स्पष्टता, सूचना।
लक्षणा: चमत्कार और प्रभाव।
व्यंजना: गहराई, अनेक अर्थ, सहृदय का आनंद।
आनंदवर्धन का ध्वनि सिद्धांत।
निष्कर्ष: श्रेष्ठ काव्य व्यंजना-प्रधान होता है।
परीक्षा टिप
हर शब्द-शक्ति के लिए अपना एक सरल उदाहरण पहले से तय रखें और उत्तर में वाच्यार्थ, लक्ष्यार्थ, व्यंग्यार्थ अलग-अलग लिखें; यही अंक दिलाता है।
अलंकार का अर्थ है आभूषण या गहना। जैसे गहने शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाते हैं। अलंकार के दो मुख्य भेद हैं: शब्दालंकार (जहाँ चमत्कार शब्दों पर आधारित हो) और अर्थालंकार (जहाँ चमत्कार अर्थ पर आधारित हो)। कुछ विद्वान दोनों के मेल को उभयालंकार कहते हैं।
मुख्य बिंदु
आचार्य दंडी ने कहा कि काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म अलंकार हैं। भामह को अलंकार संप्रदाय का प्रमुख आचार्य माना जाता है।
शब्दालंकार: अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति। यहाँ शब्द बदलने पर चमत्कार समाप्त हो जाता है।
अर्थालंकार: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, संदेह, भ्रांतिमान, दृष्टांत आदि। यहाँ पर्यायवाची शब्द रखने पर भी चमत्कार बना रहता है।
उपमा के चार अंग: उपमेय (जिसकी तुलना हो), उपमान (जिससे तुलना हो), वाचक शब्द (सा, सी, सम, सरिस, जैसे) और साधारण धर्म (समान गुण)।
रूपक में उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप होता है (उपमेय ही उपमान है)।
उत्प्रेक्षा में उपमेय में उपमान की संभावना की जाती है; वाचक शब्द: मनु, मानो, जनु, जानो, मनहुँ।
यमक में एक ही शब्द बार-बार आता है, पर हर बार अर्थ भिन्न होता है।
श्लेष में एक शब्द एक ही बार आता है, पर उसके अनेक अर्थ निकलते हैं।
महत्वपूर्ण शब्द
अलंकार – काव्य का शोभाकारक धर्म।
उपमेय – जिसका वर्णन हो रहा है।
उपमान – जिससे तुलना की जाए।
वाचक शब्द – समानता बताने वाला शब्द।
साधारण धर्म – उपमेय और उपमान का समान गुण।
आरोप – एक वस्तु को दूसरी मान लेना।
भाषा अध्ययन
शब्दालंकार
अनुप्रास (एक वर्ण की आवृत्ति): "चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में।" – 'च' वर्ण की आवृत्ति (मैथिलीशरण गुप्त)।
यमक: "कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। या खाए बौराय जग, वा पाए बौराय॥" – पहला कनक = धतूरा, दूसरा कनक = सोना (बिहारी)।
श्लेष: "रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून॥" – पानी के तीन अर्थ: मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए इज़्ज़त, चूने के लिए जल (रहीम)।
अर्थालंकार
उपमा: "पीपर पात सरिस मन डोला।" – मन (उपमेय), पीपर पात (उपमान), सरिस (वाचक), डोला (साधारण धर्म) (तुलसीदास)।
रूपक: "चरण-कमल बंदौं हरि राई।" – चरणों को ही कमल मान लिया गया (सूरदास)।
उत्प्रेक्षा: "सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप परयौ प्रभात॥" – कृष्ण के साँवले शरीर पर पीला वस्त्र मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह की धूप पड़ी हो (बिहारी)।
अतिशयोक्ति: "हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आगि। सगरी लंका जल गई, गए निसाचर भागि॥" – बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहना।
मानवीकरण: "मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।" – बादलों को मेहमान की तरह सज-धजकर आते दिखाया गया (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)।
भ्रांतिमान: एक वस्तु को भ्रम से दूसरी समझ लेना; जैसे तोता नाक के मोती को अनार का दाना समझ ले (साकेत का प्रसंग)।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. अलंकार किसे कहते हैं? उसके मुख्य भेद लिखिए।
काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्द और अर्थ के चमत्कार को अलंकार कहते हैं। इसके दो मुख्य भेद हैं: शब्दालंकार और अर्थालंकार।
Q2. यमक और श्लेष में अंतर बताइए।
यमक में एक शब्द बार-बार आता है और हर बार उसका अर्थ अलग होता है (कनक कनक ते...)। श्लेष में शब्द एक बार आता है, पर उसके कई अर्थ निकलते हैं (रहिमन पानी राखिए...)।
Q3. उपमा अलंकार के अंग उदाहरण सहित समझाइए।
परिभाषा: दो वस्तुओं में समान गुण के आधार पर तुलना।
उपमेय: जिसकी तुलना हो।
उपमान: जिससे तुलना हो।
वाचक शब्द: सा, सम, सरिस, जैसे।
साधारण धर्म: समान गुण।
उदाहरण: 'पीपर पात सरिस मन डोला' – चारों अंगों की पहचान।
Q4. उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उपमा: समानता (मुख चंद्रमा के समान है)।
रूपक: अभेद, उपमेय ही उपमान (मुख-चंद्र, चरण-कमल)।
उत्प्रेक्षा: संभावना (मुख मानो चंद्रमा है)।
उपमा में वाचक सा/सम, उत्प्रेक्षा में मनु/मानो/जनु।
रूपक में वाचक शब्द नहीं होता।
Q5. किन्हीं चार अर्थालंकारों की उदाहरण सहित परिभाषा लिखिए।
उपमा: पीपर पात सरिस मन डोला।
रूपक: चरण-कमल बंदौं हरि राई।
उत्प्रेक्षा: मनहुँ नीलमनि सैल पर...।
मानवीकरण: मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
अतिशयोक्ति: हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आगि...।
परीक्षा टिप
अलंकार पहचानने में वाचक शब्द देखें: 'सा/सम/सरिस' = उपमा, 'मनु/मानो/जनु' = उत्प्रेक्षा, बिना वाचक अभेद = रूपक। उदाहरण के साथ कारण भी लिखें।
छंद काव्य की वह रचना-व्यवस्था है जिसमें मात्रा या वर्ण की गिनती, यति (रुकाव), गति (लय) और तुक के नियमों का पालन होता है। छंद से कविता में संगीत, लय और स्मरणीयता आती है। छंद के दो मुख्य भेद हैं: मात्रिक छंद (मात्राओं की गिनती पर आधारित) और वर्णिक छंद (वर्णों की गिनती पर आधारित)। छंदशास्त्र को पिंगल भी कहते हैं।
मुख्य बिंदु
मात्रा: किसी वर्ण के उच्चारण में लगने वाला समय। लघु (।) = 1 मात्रा (अ, इ, उ, ऋ वाले वर्ण), गुरु (ऽ) = 2 मात्राएँ (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ वाले वर्ण, अनुस्वार/विसर्ग वाले वर्ण और संयुक्त अक्षर से पहले का वर्ण)।
चरण/पाद: छंद की एक पंक्ति का भाग; प्रायः छंद में चार चरण होते हैं।
यति: पढ़ते समय बीच में रुकने का स्थान; गति: छंद का प्रवाह; तुक: चरणों के अंत में समान ध्वनि।
गण: तीन वर्णों का समूह। आठ गण हैं, जिन्हें सूत्र 'यमाताराजभानसलगा' से याद किया जाता है।
मात्रिक छंद के भेद: सम (चारों चरणों में समान मात्राएँ, जैसे चौपाई), अर्धसम (पहला-तीसरा और दूसरा-चौथा चरण समान, जैसे दोहा, सोरठा), विषम (जैसे कुंडलिया, छप्पय)।
कुंडलिया = एक दोहा + एक रोला (छह चरण); जिस शब्द से शुरू होता है, प्रायः उसी पर समाप्त होता है।
छप्पय = रोला के चार चरण + उल्लाला के दो चरण।
महत्वपूर्ण शब्द
पिंगल – छंदशास्त्र।
लघु/गुरु – 1 और 2 मात्रा वाले वर्ण।
यति – रुकने का स्थान।
तुक – अंत्यानुप्रास, समान ध्वनि।
गण – तीन वर्णों का समूह।
मुक्त छंद – मात्रा, वर्ण और तुक के बंधन से मुक्त छंद (निराला)।
भाषा अध्ययन
आठ गण (सूत्र: यमाताराजभानसलगा)
गण
रूप
उदाहरण
यगण
।ऽऽ
यमाता
मगण
ऽऽऽ
मातारा
तगण
ऽऽ।
ताराज
रगण
ऽ।ऽ
राजभा
जगण
।ऽ।
जभान
भगण
ऽ।।
भानस
नगण
।।।
नसल
सगण
।।ऽ
सलगा
प्रमुख छंद और उनके लक्षण
दोहा (अर्धसम मात्रिक): विषम चरण (1, 3) में 13 और सम चरण (2, 4) में 11 मात्राएँ; सम चरणों के अंत में गुरु-लघु। उदाहरण (कबीर): "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥"
सोरठा: दोहे का उलटा; विषम चरणों में 11, सम चरणों में 13 मात्राएँ। उदाहरण (रामचरितमानस): "जो सुमिरत सिधि होइ, गन नायक करिबर बदन।"
चौपाई (सम मात्रिक): चार चरण, हर चरण में 16 मात्राएँ; अंत में जगण या तगण नहीं होता। उदाहरण: "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥"
रोला: हर चरण में 24 मात्राएँ, 11 और 13 पर यति।
हरिगीतिका: हर चरण में 28 मात्राएँ, 16 और 12 पर यति, अंत में लघु-गुरु।
कवित्त (मनहरण): वर्णिक; हर चरण में 31 वर्ण, 16 और 15 पर यति, अंत में गुरु।
सवैया: वर्णिक; हर चरण में 22 से 26 वर्ण; रसखान के सवैये प्रसिद्ध हैं।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. मात्रिक और वर्णिक छंद में अंतर बताइए।
मात्रिक छंद में मात्राओं की गिनती होती है (जैसे दोहा, चौपाई), जबकि वर्णिक छंद में वर्णों की गिनती और क्रम होता है (जैसे कवित्त, सवैया)।
Q2. दोहा और सोरठा में क्या अंतर है?
दोहे के विषम चरणों में 13 और सम चरणों में 11 मात्राएँ होती हैं। सोरठा इसका उलटा है: विषम चरणों में 11 और सम चरणों में 13 मात्राएँ। दोहे में तुक सम चरणों में, सोरठे में विषम चरणों में मिलती है।
Q3. छंद के अंगों का परिचय दीजिए।
चरण/पाद।
मात्रा और वर्ण।
लघु और गुरु।
यति और गति।
तुक।
गण (यमाताराजभानसलगा)।
Q4. चौपाई और दोहा छंद के लक्षण उदाहरण सहित लिखिए।
चौपाई: सम मात्रिक, चार चरण, 16-16 मात्राएँ।
चौपाई के अंत में जगण/तगण वर्जित।
उदाहरण: 'जय हनुमान ज्ञान गुन सागर...' (16 मात्राओं की गणना)।
दोहा: अर्धसम, 13-11 मात्राएँ, सम चरणों के अंत में गुरु-लघु।
उदाहरण: 'बड़ा हुआ तो क्या हुआ...' (13 + 11 की गणना)।
रामचरितमानस में दोनों का प्रयोग।
Q5. काव्य में छंद का महत्व स्पष्ट कीजिए।
लय और संगीतात्मकता।
कविता को याद रखना आसान।
भाव की प्रभावशाली अभिव्यक्ति।
रचना में अनुशासन और सौंदर्य।
गेयता: भजन, लोकगीत।
आधुनिक काल में मुक्त छंद भी, पर उसमें भी आंतरिक लय।
परीक्षा टिप
छंद पहचानने के प्रश्न में पहली पंक्ति की मात्राएँ लघु (।) और गुरु (ऽ) चिह्न लगाकर गिनें और कुल संख्या लिखें; गणना दिखाने पर पूरे अंक मिलते हैं।
अनुवाद का अर्थ है एक भाषा में कही गई बात को दूसरी भाषा में उसके अर्थ, भाव और शैली के साथ प्रस्तुत करना। जिस भाषा से अनुवाद होता है उसे स्रोत भाषा और जिसमें अनुवाद होता है उसे लक्ष्य भाषा कहते हैं। बहुभाषी भारत में प्रशासन, शिक्षा, साहित्य, व्यापार और जनसंचार के लिए अनुवाद बहुत आवश्यक है। आज अनुवाद रोज़गार का भी बड़ा क्षेत्र है।
मुख्य बिंदु
'अनुवाद' शब्द संस्कृत के 'अनु' (पीछे) + 'वाद' (कहना) से बना है, अर्थात् किसी के कहे हुए को फिर से कहना। अंग्रेज़ी में इसे Translation कहते हैं।
अच्छा अनुवाद वह है जो मूल का अर्थ सुरक्षित रखे और लक्ष्य भाषा में स्वाभाविक लगे।
अनुवाद के प्रकार: शब्दानुवाद (शब्द के बदले शब्द), भावानुवाद (भाव पर ज़ोर), सारानुवाद (मुख्य बातें संक्षेप में), छायानुवाद (मूल की छाया लेकर स्वतंत्र रचना), व्याख्यानुवाद (व्याख्या के साथ), आशु अनुवाद/दुभाषिया कार्य (बोलते समय तुरंत मौखिक अनुवाद)।
विषय के आधार पर: साहित्यिक, कार्यालयी, वैज्ञानिक-तकनीकी, विधिक, वाणिज्यिक और जनसंचार अनुवाद।
अनुवाद की प्रक्रिया (यूजीन नाइडा के अनुसार): विश्लेषण (मूल पाठ को समझना) → अंतरण (अर्थ को लक्ष्य भाषा में ले जाना) → पुनर्गठन (लक्ष्य भाषा में स्वाभाविक रूप देना)। इसके बाद पुनरीक्षण (जाँच) भी ज़रूरी है।
राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 3(3) के अनुसार कुछ सरकारी दस्तावेज़ (जैसे संकल्प, अधिसूचना, परिपत्र) हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में जारी होते हैं, इसलिए सरकारी कार्यालयों में अनुवाद अनिवार्य है।
अनुवादक के गुण: दोनों भाषाओं का गहरा ज्ञान, विषय की समझ, दोनों संस्कृतियों की जानकारी, पारिभाषिक शब्दावली का ज्ञान, ईमानदारी और धैर्य।
अनुवाद की समस्याएँ: मुहावरे, लोकोक्तियाँ, सांस्कृतिक शब्द, पारिभाषिक शब्द, काव्य का अनुवाद।
महत्वपूर्ण शब्द
स्रोत भाषा – जिस भाषा से अनुवाद किया जाए।
लक्ष्य भाषा – जिस भाषा में अनुवाद किया जाए।
पारिभाषिक शब्द – किसी विषय के निश्चित अर्थ वाले तकनीकी शब्द।
दुभाषिया – मौखिक रूप से तुरंत अनुवाद करने वाला।
मशीनी अनुवाद – कंप्यूटर द्वारा किया गया अनुवाद।
पुनरीक्षण – अनुवाद की जाँच और सुधार।
भाषा अध्ययन
कार्यालयी पारिभाषिक शब्द (अंग्रेज़ी → हिंदी)
English
हिंदी
Notification
अधिसूचना
Circular
परिपत्र
Memorandum
ज्ञापन
Office Order
कार्यालय आदेश
Acknowledgement
पावती
Draft
मसौदा/प्रारूप
Agenda
कार्यसूची
Minutes
कार्यवृत्त
Annexure
अनुलग्नक
Applicant
आवेदक
वाक्य-अनुवाद के उदाहरण
Please take necessary action. → कृपया आवश्यक कार्रवाई करें।
The meeting is postponed till further orders. → अगले आदेश तक बैठक स्थगित की जाती है।
Knowledge is power. → ज्ञान ही शक्ति है।
मुहावरे का अनुवाद शब्दशः नहीं, अर्थ से करें: "It is raining cats and dogs." → "मूसलधार बारिश हो रही है।"
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. अनुवाद की परिभाषा लिखिए।
एक भाषा (स्रोत भाषा) में व्यक्त अर्थ, भाव और शैली को दूसरी भाषा (लक्ष्य भाषा) में यथासंभव समान और स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत करना अनुवाद कहलाता है।
Q2. शब्दानुवाद और भावानुवाद में अंतर बताइए।
शब्दानुवाद में मूल के शब्दों के क्रम और अर्थ के अनुसार शब्द-दर-शब्द अनुवाद होता है; यह विधिक-तकनीकी पाठों में उपयोगी है। भावानुवाद में मूल के भाव को लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुसार व्यक्त किया जाता है; यह साहित्य के लिए उपयुक्त है।
Q3. अनुवाद के महत्व पर प्रकाश डालिए।
बहुभाषी भारत में राष्ट्रीय एकता।
प्रशासन और राजभाषा कार्यान्वयन।
ज्ञान-विज्ञान का प्रसार।
विश्व साहित्य से परिचय (गीतांजलि, शेक्सपियर)।
व्यापार, पर्यटन और कूटनीति।
जनसंचार: समाचार, विज्ञापन, फ़िल्म उपशीर्षक।
रोज़गार के अवसर।
Q4. अनुवाद की प्रक्रिया समझाइए।
पाठ का पठन और विश्लेषण।
कठिन शब्दों, मुहावरों, संदर्भ की पहचान।
अर्थ का अंतरण।
लक्ष्य भाषा में पुनर्गठन।
पुनरीक्षण और भाषा की शुद्धता की जाँच।
अंतिम प्रारूप तैयार करना।
Q5. एक अच्छे अनुवादक के गुण लिखिए।
स्रोत और लक्ष्य दोनों भाषाओं पर अधिकार।
विषय-ज्ञान।
सांस्कृतिक समझ।
पारिभाषिक शब्दावली का ज्ञान, शब्दकोश का प्रयोग।
मूल के प्रति ईमानदारी।
धैर्य और पुनरीक्षण की आदत।
परीक्षा टिप
परिभाषा में 'स्रोत भाषा' और 'लक्ष्य भाषा' शब्द ज़रूर लिखें। अनुवाद के प्रकार पूछे जाएँ तो हर प्रकार का एक-एक उदाहरण या उपयोग-क्षेत्र भी दें।
प्रयोजनमूलक हिंदी का अर्थ है किसी विशेष प्रयोजन (उद्देश्य) के लिए प्रयोग की जाने वाली हिंदी, जैसे कार्यालय, बैंक, न्यायालय, विज्ञान, जनसंचार और कंप्यूटर में। इसे कामकाजी या व्यावहारिक हिंदी भी कहते हैं। साहित्यिक हिंदी जहाँ भाव और सौंदर्य पर ज़ोर देती है, वहीं प्रयोजनमूलक हिंदी स्पष्टता, निश्चित अर्थ और औपचारिकता पर। आज यह रोज़गार की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
मुख्य बिंदु
अंग्रेज़ी में इसे Functional Hindi कहते हैं।
हिंदी के तीन रूप माने जाते हैं: बोलचाल की हिंदी, साहित्यिक हिंदी और प्रयोजनमूलक हिंदी।
प्रयोजनमूलक हिंदी के क्षेत्र: कार्यालयी (प्रशासनिक) हिंदी, बैंकिंग और वाणिज्यिक हिंदी, विधिक (कानूनी) हिंदी, वैज्ञानिक-तकनीकी हिंदी, जनसंचार की हिंदी (समाचार-पत्र, रेडियो, टेलीविज़न, विज्ञापन), कंप्यूटर और इंटरनेट की हिंदी।
विशेषताएँ: पारिभाषिक शब्दावली, एकार्थकता (एक शब्द का एक निश्चित अर्थ), कर्मवाच्य का अधिक प्रयोग ("आदेश दिया जाता है"), औपचारिकता, संक्षिप्तता, वस्तुनिष्ठता।
संवैधानिक आधार: संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 राजभाषा से संबंधित हैं। अनुच्छेद 343 – संघ की राजभाषा हिंदी, लिपि देवनागरी; अनुच्छेद 351 – हिंदी भाषा के विकास का निर्देश।
राजभाषा अधिनियम 1963 सरकारी कामकाज में हिंदी-अंग्रेज़ी के प्रयोग के नियम बताता है।
पारिभाषिक शब्दावली बनाने के लिए केंद्र सरकार का वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग कार्य करता है।
कार्यालयी हिंदी के प्रमुख रूप: सरकारी पत्र, अर्ध-सरकारी पत्र, ज्ञापन, परिपत्र, अधिसूचना, कार्यालय आदेश, टिप्पण, प्रारूपण, संक्षेपण, पल्लवन।
महत्वपूर्ण शब्द
प्रयोजनमूलक – विशेष उद्देश्य पर आधारित।
टिप्पण (Noting) – फ़ाइल पर मामले को निपटाने के लिए लिखी गई टिप्पणी।
प्रारूपण (Drafting) – पत्र या आदेश का मसौदा तैयार करना।
संक्षेपण (Precis) – लंबे पाठ को उसका सार रखते हुए छोटा करना।
पल्लवन (Expansion) – किसी सूक्ति या विचार का विस्तार करना।
परिपत्र (Circular) – एक साथ कई कार्यालयों/कर्मचारियों को भेजी जाने वाली सूचना।
अर्ध-सरकारी पत्र – अधिकारियों के बीच व्यक्तिगत नाम से लिखा जाने वाला पत्र, जिसमें आत्मीयता के साथ औपचारिकता रहती है।
जनसंचार की हिंदी: छोटे वाक्य, सरल शब्द, आकर्षक शीर्षक; विज्ञापन में तुकबंदी और नारे।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. प्रयोजनमूलक हिंदी किसे कहते हैं?
किसी विशेष प्रयोजन, जैसे कार्यालय, बैंक, विधि, विज्ञान या जनसंचार के कामकाज में प्रयोग होने वाली हिंदी को प्रयोजनमूलक हिंदी कहते हैं। इसमें पारिभाषिक शब्दावली, स्पष्टता और औपचारिकता प्रमुख होती है।
Q2. टिप्पण और प्रारूपण में अंतर लिखिए।
टिप्पण फ़ाइल पर किसी मामले के बारे में तथ्य, नियम और सुझाव लिखने की प्रक्रिया है, जो कार्यालय के भीतर रहती है। प्रारूपण किसी पत्र, आदेश या सूचना का मसौदा तैयार करना है, जो अनुमोदन के बाद बाहर भेजा जाता है।
Q3. प्रयोजनमूलक हिंदी की विशेषताएँ लिखिए।
पारिभाषिक और तकनीकी शब्दावली।
एकार्थकता और स्पष्टता।
कर्मवाच्य प्रधान, निर्वैयक्तिक शैली।
औपचारिकता और शिष्टता।
संक्षिप्तता और तथ्यपरकता।
निश्चित प्रारूप (पत्र, परिपत्र, अधिसूचना)।
भावात्मकता और अलंकार का अभाव।
Q4. प्रयोजनमूलक हिंदी के प्रमुख क्षेत्रों का परिचय दीजिए।
कार्यालयी हिंदी: पत्र, टिप्पण, प्रारूपण।
बैंकिंग-वाणिज्यिक हिंदी: खाता, ऋण, व्यापारिक पत्र।
सरकारी और अर्ध-सरकारी कार्यालयों में प्रयुक्त हिंदी को कार्यालयी हिंदी कहते हैं। इसके दो प्रमुख कौशल हैं: टिप्पण (नोटिंग) और प्रारूपण (ड्राफ्टिंग)। किसी आवती (आए हुए पत्र) या मामले पर निर्णय के लिए फाइल में लिखी गई टिप्पणी टिप्पण है, और निर्णय के बाद भेजे जाने वाले पत्र, आदेश या परिपत्र का पहला मसौदा प्रारूप है। संविधान के अनुच्छेद 343–351, राजभाषा अधिनियम 1963 और राजभाषा नियम 1976 कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग का आधार हैं।
मुख्य बिंदु
टिप्पण का उद्देश्य: मामले के तथ्य, नियम और पिछले निर्णय सामने रखकर अधिकारी को निर्णय में सहायता देना।
अच्छी टिप्पणी के गुण: संक्षिप्त, तथ्यपरक, स्पष्ट, निष्पक्ष, क्रमबद्ध; अन्य पुरुष और कर्मवाच्य में ('प्रस्तुत है', 'देखा जाए')।
टिप्पणी में व्यक्तिगत भावना या अनावश्यक विस्तार नहीं होना चाहिए।
टिप्पणी के अंत में बाईं ओर हस्ताक्षर, नाम, पदनाम और तिथि लिखी जाती है।
प्रारूपण का उद्देश्य: अधिकारी के निर्णय को सही, शुद्ध और औपचारिक भाषा में पत्र के रूप में ढालना।
प्रारूप के गुण: शुद्धता, पूर्णता, संक्षिप्तता, शिष्टता, निर्धारित प्रारूप (फॉर्मेट) का पालन।
प्रारूप के प्रमुख प्रकार: सरकारी पत्र, अर्ध-सरकारी पत्र, कार्यालय ज्ञापन, परिपत्र, आदेश, अधिसूचना, अनुस्मारक, प्रेस विज्ञप्ति।
प्रारूप पर सबसे ऊपर 'प्रारूप' या 'अनुमोदनार्थ प्रारूप' लिखा जाता है; अनुमोदन के बाद ही साफ प्रति भेजी जाती है।
राजभाषा अधिनियम की धारा 3(3) के अनुसार कुछ दस्तावेज़ (जैसे परिपत्र, अधिसूचना, संविदा) हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में जारी होते हैं।
14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया।
महत्वपूर्ण शब्द
टिप्पण (Noting) – फाइल पर निर्णय हेतु लिखी गई टिप्पणी।
प्रारूपण (Drafting) – भेजे जाने वाले पत्र का मसौदा तैयार करना।
आवती – कार्यालय में आया हुआ पत्र।
जावक – कार्यालय से भेजा गया पत्र।
अनुस्मारक – पहले पत्र की याद दिलाने वाला पत्र।
परिपत्र – अनेक कार्यालयों/कर्मचारियों को एक साथ भेजा जाने वाला पत्र।
कार्यालय ज्ञापन – एक ही सरकार के विभागों के बीच औपचारिक संदेश।
भाषा अध्ययन
टिप्पणी का नमूना विषय: पुस्तकालय के लिए हिंदी पुस्तकों की खरीद। आवती क्रमांक 15 में हिंदी विभाग ने इस वर्ष के लिए पुस्तकों की सूची भेजी है। बजट में इस मद के लिए प्रावधान उपलब्ध है। खरीद-नियमों के अनुसार कोटेशन मँगाए जा सकते हैं। अनुमोदनार्थ प्रस्तुत। (हस्ताक्षर, नाम, पदनाम, तिथि)
प्रारूप के मानक अंश (सरकारी पत्र): पत्र संख्या → कार्यालय का नाम-पता → दिनांक → प्रेषक → प्रेषिती → विषय → संदर्भ → संबोधन ('महोदय') → मुख्य भाग → अधोलेख ('भवदीय') → हस्ताक्षर और पदनाम।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. टिप्पण और प्रारूपण में क्या अंतर है?
टिप्पण फाइल पर निर्णय से पहले लिखी गई आंतरिक टिप्पणी है; प्रारूपण निर्णय के बाद बाहर भेजे जाने वाले पत्र का मसौदा है।
Q2. हिंदी दिवस 14 सितंबर को क्यों मनाया जाता है?
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था।
Q3. अच्छी टिप्पणी की विशेषताएँ लिखिए।
संक्षिप्त और स्पष्ट।
तथ्य, नियम और पूर्व निर्णयों पर आधारित।
निष्पक्ष और व्यक्तिगत भावना से मुक्त।
अन्य पुरुष और कर्मवाच्य।
क्रमबद्ध अनुच्छेद, अंत में सुझाव।
Q4. प्रारूपण के प्रमुख प्रकारों का परिचय दीजिए।
सरकारी पत्र और अर्ध-सरकारी पत्र (भेद सहित)।
कार्यालय ज्ञापन, परिपत्र।
आदेश, अधिसूचना।
अनुस्मारक, प्रेस विज्ञप्ति।
हर प्रकार का उद्देश्य और एक पंक्ति का उदाहरण।
Q5. कार्यालयी हिंदी की विशेषताएँ और उसके संवैधानिक आधार पर प्रकाश डालिए।
विशेषताएँ: औपचारिकता, निश्चित शब्दावली, कर्मवाच्य, स्पष्टता।
अनुच्छेद 343–351।
राजभाषा अधिनियम 1963 और नियम 1976।
द्विभाषिकता (धारा 3(3))।
चुनौतियाँ और सुझाव।
परीक्षा टिप
परीक्षा में नमूना टिप्पणी या सरकारी पत्र का प्रारूप लिखने को आता है। प्रारूप के सभी अंश सही क्रम में लिखें; क्रम छूटने पर अंक कटते हैं।
किसी विशेष ज्ञान-क्षेत्र – विज्ञान, प्रशासन, विधि, वाणिज्य, बैंकिंग – में एक निश्चित अर्थ में प्रयुक्त शब्दों को पारिभाषिक शब्द (Technical Terms) कहते हैं, और उनके समूह को पारिभाषिक शब्दावली। स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राजभाषा और शिक्षा की भाषा बनाने के लिए बड़ी मात्रा में ऐसे शब्दों की आवश्यकता हुई। इसके लिए वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग (1961) बनाया गया, जिसने विभिन्न विषयों के लाखों शब्दों की मानक शब्दावलियाँ तैयार कीं।
मुख्य बिंदु
सामान्य शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं, पर पारिभाषिक शब्द का अपने क्षेत्र में एक ही निश्चित अर्थ होता है।
पारिभाषिक शब्द की विशेषताएँ: एकार्थकता, सुनिश्चितता, संक्षिप्तता, सुबोधता, उत्पादकता (उससे नए शब्द बन सकें) और एकरूपता (पूरे देश में एक रूप)।
शुद्धतावादी/संस्कृतवादी – संस्कृत धातुओं और उपसर्ग-प्रत्ययों से नए शब्द; प्रमुख नाम डॉ. रघुवीर।
अंतरराष्ट्रीयतावादी – अंग्रेज़ी/अंतरराष्ट्रीय शब्दों को ज्यों का त्यों अपनाना।
लोकवादी (हिंदुस्तानी) – बोलचाल के प्रचलित शब्द।
समन्वयवादी – तीनों का संतुलन; आयोग ने मुख्यतः यही मार्ग अपनाया।
शब्द-निर्माण के प्रमुख दृष्टिकोण:
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित वैज्ञानिक शब्द, इकाइयाँ और प्रतीक प्रायः ज्यों के त्यों रखे जाते हैं (मीटर, ऑक्सीजन, रेडियो)।
निर्माण की विधियाँ: अनुवाद (Pollution – प्रदूषण), अनुकूलन (Academy – अकादमी), नव-निर्माण (Computer – संगणक), ग्रहण (Bank – बैंक)।
पारिभाषिक शब्द राजभाषा हिंदी, उच्च शिक्षा, अनुवाद और जनसंचार में एकरूपता लाते हैं।
समस्याएँ: कुछ शब्दों का कठिन और अप्रचलित होना, एक अंग्रेज़ी शब्द के कई हिंदी पर्याय, प्रयोग में कमी।
समाधान: मानक शब्दावली का प्रचार, प्रशिक्षण, सरल शब्दों का चयन और नियमित प्रयोग।
महत्वपूर्ण शब्द
पारिभाषिक शब्द – विशेष क्षेत्र में निश्चित अर्थ वाला शब्द।
अर्ध-पारिभाषिक शब्द – जो सामान्य और विशेष दोनों अर्थों में चलें (जैसे 'आयोग')।
एकार्थकता – एक शब्द का एक ही अर्थ।
उत्पादकता – शब्द से नए व्युत्पन्न शब्द बनने की क्षमता।
मानक शब्दावली – आयोग द्वारा स्वीकृत शब्द-सूची।
भाषा अध्ययन
अंग्रेज़ी
हिंदी पर्याय
Administration
प्रशासन
Gazette
राजपत्र
Notification
अधिसूचना
Circular
परिपत्र
Memorandum
ज्ञापन
Allowance
भत्ता
Deputation
प्रतिनियुक्ति
Probation
परिवीक्षा
Ad hoc
तदर्थ
Ex officio
पदेन
Ordinance
अध्यादेश
Quorum
गणपूर्ति
Treasury
कोषागार
Audit
लेखापरीक्षा
Enclosure
संलग्नक
Applicant
आवेदक
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. पारिभाषिक शब्द किसे कहते हैं?
किसी विशेष ज्ञान-क्षेत्र में एक निश्चित, सुपरिभाषित अर्थ में प्रयुक्त शब्द पारिभाषिक शब्द कहलाता है।
Q2. निम्नलिखित के हिंदी पर्याय लिखिए: Gazette, Probation, Ad hoc।
राजपत्र, परिवीक्षा, तदर्थ।
Q3. पारिभाषिक शब्द की विशेषताएँ लिखिए।
एकार्थकता और सुनिश्चितता।
संक्षिप्तता।
सुबोधता और सरलता।
उत्पादकता।
अखिल भारतीय एकरूपता।
Q4. पारिभाषिक शब्दावली निर्माण के विभिन्न दृष्टिकोणों की समीक्षा कीजिए।
शुद्धतावादी (डॉ. रघुवीर) – गुण-दोष।
अंतरराष्ट्रीयतावादी – गुण-दोष।
लोकवादी – गुण-दोष।
समन्वयवादी – आयोग की नीति।
निष्कर्ष: संतुलित मार्ग ही व्यावहारिक।
Q5. हिंदी में पारिभाषिक शब्दावली के विकास में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
1961 में स्थापना; उद्देश्य।
विभिन्न विषयों की मानक शब्दावलियाँ और कोश।
शब्द-निर्माण के सिद्धांत तय करना।
विश्वविद्यालय स्तर की पुस्तकों में प्रयोग।
चुनौतियाँ और आगे का मार्ग।
परीक्षा टिप
परीक्षा में 10–15 अंग्रेज़ी शब्दों के हिंदी पर्याय पूछे जाते हैं। प्रशासनिक और बैंकिंग के 50 आम शब्दों की सूची रोज़ दोहराएँ; यह सबसे आसान अंक हैं।
एक साथ बहुत बड़े जनसमूह तक सूचना, विचार और मनोरंजन पहुँचाने वाले साधनों को जनसंचार माध्यम कहते हैं। इनके तीन मुख्य रूप हैं: मुद्रित माध्यम (समाचार पत्र, पत्रिकाएँ), इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (रेडियो, टेलीविज़न, फ़िल्म) और नव माध्यम (इंटरनेट, वेबसाइट, सोशल मीडिया)। हिंदी इन सभी माध्यमों की प्रमुख भाषा है, और इन माध्यमों ने हिंदी को देश-विदेश में फैलाने के साथ उसकी भाषा को अधिक सरल और बोलचाल वाला भी बनाया है।
मुख्य बिंदु
जनसंचार के कार्य: सूचना देना, शिक्षित करना, मनोरंजन करना, जनमत बनाना।
मुद्रित माध्यम: पहला हिंदी समाचार पत्र 'उदंत मार्तंड' (1826)। स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी पत्रकारिता ने राष्ट्रीय चेतना जगाई। आज हिंदी समाचार पत्र देश में सबसे अधिक पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में हैं।
मुद्रित माध्यम की भाषा: स्थायी, विस्तृत, विश्लेषण-प्रधान; पाठक दोबारा पढ़ सकता है।
रेडियो (आकाशवाणी): 'कान का माध्यम'; छोटे, सरल वाक्य, बोलचाल की भाषा, दोहराव। गाँव-गाँव तक पहुँच; समाचार, कृषि कार्यक्रम, नाटक, गीत।
टेलीविज़न (दूरदर्शन और निजी चैनल): 'आँख और कान दोनों का माध्यम'; दृश्य प्रधान, इसलिए शब्द दृश्य के पूरक हों। भारत में दूरदर्शन की शुरुआत 1959 में दिल्ली से हुई।
फ़िल्म: हिंदी सिनेमा ने हिंदी को अहिंदी भाषी क्षेत्रों और विदेशों तक पहुँचाया।
नव माध्यम: वेब पोर्टल, ब्लॉग, यूट्यूब, सोशल मीडिया; यूनिकोड के कारण देवनागरी में लिखना आसान हुआ। हर व्यक्ति अब उपभोक्ता के साथ निर्माता भी है।
समाचार लेखन के छह ककार: क्या, कौन, कब, कहाँ, क्यों, कैसे; संरचना – उल्टा पिरामिड (सबसे महत्त्वपूर्ण बात पहले)।
माध्यमों का हिंदी पर प्रभाव: शब्द-भंडार में वृद्धि, सरलता, नए शब्द-प्रयोग; साथ ही अंग्रेज़ी शब्दों की अधिकता (हिंग्लिश) और भाषा-शुद्धता की चिंता।
जनसंचार में करियर: संवाददाता, उपसंपादक, उद्घोषक, पटकथा लेखक, अनुवादक, सोशल मीडिया कंटेंट लेखक।
महत्वपूर्ण शब्द
जनसंचार – एक साथ विशाल जनसमूह तक संदेश पहुँचाना।
संवाददाता – समाचार एकत्र कर भेजने वाला पत्रकार।
संपादक – समाचार/सामग्री का चयन और संशोधन करने वाला।
उल्टा पिरामिड – मुख्य बात पहले, विवरण बाद में देने वाली समाचार-शैली।
नव माध्यम – इंटरनेट आधारित डिजिटल माध्यम।
हिंग्लिश – हिंदी-अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा।
भाषा अध्ययन
माध्यम
किसके लिए लिखें
भाषा की विशेषता
समाचार पत्र
आँख (पढ़ना)
विस्तृत, शुद्ध, विश्लेषणात्मक
रेडियो
कान (सुनना)
छोटे वाक्य, सरल शब्द, दोहराव
टेलीविज़न
आँख + कान
दृश्य के अनुरूप, संक्षिप्त
सोशल मीडिया
मोबाइल स्क्रीन
अति संक्षिप्त, अनौपचारिक
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. जनसंचार माध्यम के तीन प्रकार लिखिए।
मुद्रित माध्यम (समाचार पत्र, पत्रिकाएँ), इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (रेडियो, टेलीविज़न, फ़िल्म) और नव माध्यम (इंटरनेट, सोशल मीडिया)।
Q2. समाचार लेखन के छह ककार कौन-से हैं?
क्या, कौन, कब, कहाँ, क्यों और कैसे।
Q3. रेडियो के लिए लेखन की विशेषताएँ लिखिए।
कान के लिए लेखन; श्रोता दोबारा नहीं पढ़ सकता।
छोटे, सरल वाक्य।
बोलचाल के शब्द; कठिन संख्याओं से बचना।
महत्त्वपूर्ण बात का दोहराव।
ध्वनि-प्रभाव और संगीत का उपयोग।
Q4. हिंदी के प्रचार-प्रसार में जनसंचार माध्यमों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
हिंदी पत्रकारिता: स्वतंत्रता आंदोलन से आज तक।
रेडियो और दूरदर्शन: गाँव-गाँव तक पहुँच।
हिंदी सिनेमा: अहिंदी भाषी और विदेशी दर्शक।
नव माध्यम: वैश्विक हिंदी समुदाय।
निष्कर्ष।
Q5. जनसंचार माध्यमों का हिंदी भाषा पर पड़े प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
सकारात्मक: सरलता, नया शब्द-भंडार, व्यापक पहुँच, रोज़गार।