११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 1
प्रेरणा
संक्षिप्त सार
प्रेरणा में युवा कवि त्रिपुरारि की त्रिवेणियाँ हैं (‘साँस के सिक्के’ संग्रह से)। तीन-तीन पंक्तियों की इन रचनाओं में माँ का ममत्व, पिता का छिपा हुआ कोमल हृदय, व्यस्त नौकरीपेशा माता-पिता से बच्चों को ‘टुकड़ों में’ मिलने वाला प्यार और जीवन में आशा, धैर्य तथा सकारात्मकता का संदेश है। कवि कहते हैं – गिरकर सँभलो, अँधेरे में भी उजाले की आस रखो, और उम्मीद का दामन कभी मत छोड़ो।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: त्रिपुरारि (जन्म ५ दिसंबर १९८८, समस्तीपुर, बिहार) – शिक्षा पटना, दिल्ली और हिसार में; दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के बाद फिल्म और दूरदर्शन के लिए लेखन; ‘त्रिवेणी’ के रचयिता के रूप में पहचान।
प्रमुख कृतियाँ: नींद की नदी (कविता संग्रह), नॉर्थ कैंपस (कहानी संग्रह), साँस के सिक्के (त्रिवेणी संग्रह)।
काव्य प्रकार – त्रिवेणी: तीन पंक्तियों का मुक्त छंद; पहली दो पंक्तियों में भाव-विचार, तीसरी पंक्ति उन्हें नया आयाम देती है; विषय – सामयिक स्थितियाँ, रिश्ते, जीवन के प्रति सकारात्मकता।
माँ: फोन पर बात होते ही माँ बे-वजह रोती है, और फोन रखने पर कवि भी रोते हैं।
पिता: ऊपर से सख्त, दिल से नाजुक – बेटे को चोट लगे तो तड़प उठते हैं; ‘हर पिता में ही कोई माँ भी छुपी होती है।’
व्यस्त जीवन: एक की दिन की शिफ्ट, दूसरे की रात की – नन्हे बच्चों को माँ-बाप टुकड़ों में मिलते हैं।
डूबते सूरज को मत भूलो – डूबना-उगना तो नजरों का धोखा है (बुरे समय में साथ दो)।
गिर जाओ तो सँभलकर फिर चलो – चोट खाकर ही सीख मिलती है।
घनघोर अँधेरे में भी आस रखो – रात की कोख से ही सुबह जन्म लेती है।
एक ही दीप से यात्रा शुरू करो – जहाँ कदम रखोगे, रोशनी होगी।
अपनी आँखों में झाँकने पर कवि खुद को बच्चा पाते हैं – मन से उम्र नहीं बढ़ती।
आँसू और खुशियाँ एक ही चीज के दो नाम हैं – जैसे पेड़ में बीज और बीज में पेड़; उम्मीद न छोड़ो, नाउम्मीदी मौत है।
महत्वपूर्ण शब्द
त्रिवेणी – तीन पंक्तियों का काव्य प्रकार
घनघोर – घना
हसरत – चाह, इच्छा
आगाज-ए-सफर – यात्रा का आरंभ
शय – वस्तु, चीज
आपाधापी – भागदौड़
नाउम्मीदी – निराशा
भाषा अध्ययन
रस (काव्यशास्त्र): रस काव्य की आत्मा है; अंग – विभाव, अनुभाव, संचारी भाव, स्थायी भाव।
करुण रस: प्रियजन के कष्ट, शोक या मृत्यु से हृदय में पीड़ा – उदा. ‘अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।’ (मैथिलीशरण गुप्त)
प्रतीकात्मक पंक्ति: ‘रात की कोख ही से सुबह जनम लेती है’ – रात = दुख, सुबह = सुख।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कारण लिखिए : (१) माँ, मेरी आवाज सुनकर रोती है (२) बच्चों को माता-पिता का प्यार टुकड़ों में मिलता है (३) कवि की उम्र बढ़ती ही नहीं है
(१) बेटे से दूर रहने के कारण माँ का ममत्व उमड़ आता है। (२) माता-पिता अलग-अलग शिफ्ट (दिन-रात) में काम करते हैं। (३) अपनी आँखों में झाँकने पर कवि को अपने भीतर एक बच्चा दिखाई देता है।
Q2. परिणति लिखिए : चोट खाने की; अँधेरा होने पर भी आस रखने की; एक ही दीप से सफर आरंभ करने की।
चोट खाने की – सीख मिलती है; आस रखने की – किसी दिन उजाला होगा; एक दीप से सफर – जहाँ कदम रखोगे वहाँ रोशनी होगी।
Q3. ‘त्रिवेणी’ काव्य प्रकार की विशेषताएँ लिखिए।
तीन पंक्तियों का मुक्त छंद।
पहली दो पंक्तियों में भाव-विचार स्पष्ट।
तीसरी पंक्ति पहले भाव को नया आयाम देती है।
सामयिक स्थितियाँ, रिश्ते और सकारात्मकता इसके विषय।
Q4. ‘आधुनिक जीवन शैली की समस्याओं से जूझने की प्रेरणा’ – रसास्वादन कीजिए।
रचनाकार और रचना: त्रिपुरारि, ‘प्रेरणा’ (त्रिवेणियाँ)।
पसंद की पंक्ति: ‘रात की कोख ही से सुबह जनम लेती है।’
पसंद का कारण: निराशा में आशा जगाने वाला सुंदर प्रतीक।
केंद्रीय भाव: व्यस्त जीवन में बिखरते रिश्तों की पीड़ा के साथ धैर्य, आशा और गिरकर उठने की प्रेरणा; सरल हिंदुस्तानी भाषा।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘पालनाघर की आवश्यकता’।
नौकरीपेशा माता-पिता के बच्चों की देखभाल के लिए सुरक्षित स्थान।
प्रशिक्षित देखभाल, खेल और पोषण की व्यवस्था।
पर पालनाघर माता-पिता के स्नेह का विकल्प नहीं।
इसलिए समय निकालकर बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना जरूरी है।
परीक्षा टिप
त्रिवेणी की विशेषताएँ और रस-स्थायी भाव की तालिका साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान में पक्के प्रश्न हैं; रसास्वादन में चार मुद्दे (रचनाकार, पंक्ति, कारण, केंद्रीय भाव) जरूर लिखें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 2
लघुकथाएँ
संक्षिप्त सार
इस पाठ में संतोष श्रीवास्तव की दो लघुकथाएँ हैं। ‘उषा की दीपावली’ में दस वर्षीय उषा देखती है कि सफाईकर्मी बबन आटे के बुझे दीपक कचरे में न डालकर जेब में रख रहा है, ताकि घर जाकर सेंककर खा सके। दावतों में बरबाद होता अन्न याद कर उषा की आँखें भर आती हैं और वह पकवानों की थैली बबन को दे आती है। ‘मुस्कुराती चोट’ में बीमार पिता के कारण पढ़ाई छोड़कर रद्दी जमा करने वाला बबलू अपने पैसे देकर रद्दी की स्कूली किताबें बचा लेता है; डाँट खाकर भी मुस्कुराता है। उसकी लगन देखकर ताना मारने वाली मालकिन उसकी आगे की पढ़ाई का खर्च उठाने का निश्चय करती है।
मुख्य बिंदु
लेखिका परिचय: संतोष श्रीवास्तव (जन्म २३ नवंबर १९५२, मंडला, म.प्र.) – एम.ए. (इतिहास, हिंदी), बी.एड., पत्रकारिता; नारी जागरूकता, अस्मिता, सामाजिक विसंगतियाँ और परिस्थितियों से लड़ने की सोच उनके विषय।
प्रमुख कृतियाँ: ‘बहके बसंत तुम’, ‘बहते ग्लेशियर’ (कहानी संग्रह); ‘दबे पाँव प्यार’, ‘टेम्स की सरगम’, ‘ख्वाबों के पैरहन’ (उपन्यास); ‘फागुन का मन’ (ललित निबंध); ‘नीली पत्तियों की शायराना हरारत’ (यात्रा संस्मरण)।
विधा – लघुकथा: आकार में लघु, पर कथा के तत्त्वों से पूर्ण; कम शब्दों में संवेदना की सघन प्रस्तुति। अन्य लघुकथाकार – डॉ. कमल किशोर गोयनका, डॉ. सतीश दुबे, संतोष सुपेकर, कमल चोपड़ा।
उषा की दीपावली: नरक चौदस पर दादी ने आटे के दीपक जलाए; घर में गुझिया, पपड़ी, चकली; उषा को चॉकलेट और बंगाली मिठाई पसंद।
सुबह कंपाउंड पटाखों के कचरे से भरा; बबन ने कहा – ‘अन्न में हजारों देवता हैं न’; उषा को दावतों की जूठी प्लेटों का अंबार याद आया।
उषा ने पकवानों की थैली भरकर बबन को दी – उसकी आँखों में दीप जल उठे, बबन की आँखों में खुशी के आँसू।
मुस्कुराती चोट: बाबा बीमार, माँ चौका-बर्तन करती; बबलू की पढ़ाई छूटी, वह घर-घर रद्दी जमा करने लगा।
मालकिन ने ताना मारा – अजीब माँ-बाप हैं, बाल मजदूरी अपराध है; बबलू ने बताया – किताबों के पैसे न होने से पढ़ाई रुकी।
बेटी ने किताबें मुफ्त देने को कहा, पर मालकिन बोलीं – पैसे लेकर चाट-पकौड़ी में उड़ा देगा।
बबलू ने अपने पैसे देकर किताबें अलग रख लीं; दुकानदार ने ‘रुपये खर्च हो गए’ सुनकर डाँटा, फिर भी वह मुस्कुराता रहा।
किताबें हाथ में देखकर मालकिन को अपराध-बोध हुआ; उसने बबलू की आगे की पढ़ाई का खर्च उठाने का निश्चय किया।
Q1. दावत में होने वाली अन्न की बरबादी पर उषा की प्रतिक्रिया लिखिए।
उसे भरी प्लेटों से जरा-सा खाकर छोड़ने वाले मेहमान और कचरे के डिब्बे में पड़ी प्लेटों का अंबार याद आया; उसकी आँखों में आँसुओं का सैलाब उमड़ आया और उसने बबन को पकवानों की थैली दी।
Q2. संवादों का उचित घटनाक्रम लगाइए।
(१) ‘स्कूल नहीं जाता तू? अजीब हैं…!’ (२) ‘माँ, बाल मजदूरी तो अपराध है न?’ (३) ‘अरे क्या हुआ? जाता क्यों नहीं?’ (४) ‘रुपये खर्च हो गए सेठ।’
Q3. ‘उषा की दीपावली’ लघुकथा द्वारा प्राप्त संदेश लिखिए।
अन्न का एक-एक कण मूल्यवान है, उसे बरबाद नहीं करना चाहिए।
समाज में बहुत लोग भरपेट भोजन को तरसते हैं।
त्योहार की खुशी जरूरतमंदों के साथ बाँटने में है।
बच्चों में संवेदनशीलता के संस्कार जगाने चाहिए।
Q4. ‘मुस्कुराती चोट’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
बबलू को मालकिन के अपशब्द और दुकानदार की डाँट की ‘चोट’ लगी।
फिर भी वह किताबें बचाकर पढ़ाई जारी रखने की खुशी में मुस्कुराता रहा।
उसकी लगन ने मालकिन का मन बदल दिया और उसकी पढ़ाई का रास्ता खुला।
चोट के बीच की यह मुस्कान ही कहानी का केंद्र है, इसलिए शीर्षक सार्थक है।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘अन्न बैंक की आवश्यकता’।
शादी, दावत और होटलों में रोज बहुत भोजन बचकर फेंका जाता है।
अन्न बैंक यह भोजन सुरक्षित ढंग से जरूरतमंदों तक पहुँचाते हैं।
इससे भूख और अन्न की बरबादी दोनों कम होती हैं।
स्वयंसेवी संस्थाओं और नागरिकों को मिलकर ऐसे बैंक चलाने चाहिए।
परीक्षा टिप
दोनों लघुकथाओं के पात्र (उषा-बबन, बबलू-मालकिन-दुकानदार) और संदेश अलग-अलग लिखें; कृदंत-तद्धित और लिंग परिवर्तन शब्द संपदा में आते हैं।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 3
पंद्रह अगस्त
संक्षिप्त सार
पंद्रह अगस्त गिरिजाकुमार माथुर का गीत है (‘धूप के धान’ संग्रह से)। स्वतंत्रता की पहली रात कवि देश के पहरुए (पहरेदार) – देशवासियों और सैनिकों – को सावधान रहने का आह्वान करते हैं। गुलामी की बेड़ियाँ टूटी हैं और नये स्वर्ग का पहला चरण आया है, पर दुख की छाया अभी मिटी नहीं; शत्रु हट गया है, पर उसकी छायाओं का डर है और शोषण से समाज कमजोर है। इसलिए हमें अचल दीपक की तरह जागरूक रहकर स्वतंत्रता की रक्षा करनी है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: गिरिजाकुमार माथुर (जन्म २२ अगस्त १९१९, अशोक नगर, म.प्र.; मृत्यु १९९४) – आरंभिक शिक्षा झाँसी, स्नातकोत्तर लखनऊ; ऑल इंडिया रेडियो दिल्ली और आकाशवाणी लखनऊ में सेवा; संयुक्त राष्ट्र संघ, न्यूयॉर्क में सूचनाधिकारी; काव्य में राष्ट्रीय चेतना।
प्रमुख कृतियाँ: मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले, जो बँध नहीं सका, साक्षी रहे वर्तमान, मैं वक्त के हूँ सामने।
काव्य प्रकार – गीत: एक मुखड़ा और दो-तीन अंतरे; लोकजीवन से प्रतीक, बिंब और उपमान।
मुखड़ा: आज जीत की रात है, पहरुए सावधान रहना; देश के द्वार खुले हैं – अचल दीपक की तरह रहना।
पहला अंतरा: यह नये स्वर्ग का प्रथम चरण है, मंजिल अभी दूर; जनमंथन से पहली रत्न-लहर उठी है; जीवन की मोती-माला पूरी होना शेष है, क्योंकि दुख की साँवली कोर मिटी नहीं – युग की पतवार लेकर महासागर-से महान बने रहना।
दूसरा अंतरा: विषम (गुलामी की) शृंखलाएँ टूटीं, सब दिशाएँ खुलीं; युग से बंदी हवाएँ आँधी बनकर चल रही हैं; सिमटी सीमाएँ प्रश्नचिह्न बनी हैं; पुराने सिंहासन की प्रतिमाएँ टूट रही हैं – तूफान उठ रहा है, चंद्रमा की तरह दीप्तिमान रहना।
तीसरा अंतरा: हमारी मशाल ऊँची हुई है, पर डगर कठिन है; शत्रु हट गया, उसकी छायाओं का डर है; शोषण से समाज मृतप्राय और घर कमजोर है; पर नई जिंदगी आ रही है – यह विश्वास अमर है; जनगंगा में ज्वार की लहर बनकर बहते रहना।
संदेश: स्वतंत्रता पाना जितना कठिन, उसकी रक्षा उससे भी अधिक जरूरी; शोषित समाज का उत्थान ही सच्ची आजादी है।
महत्वपूर्ण शब्द
पहरुए – पहरेदार, प्रहरी
प्रभंजन – आँधी, तूफान
पतवार – नाव खेने का साधन
अंबुधि – सागर
इंदु – चंद्रमा
दीप्तिमान – प्रकाशमान
विषम शृंखलाएँ – गुलामी की कठोर बेड़ियाँ
भाषा अध्ययन
वीर रस: स्थायी भाव उत्साह; शत्रु के प्रति विद्रोह, अत्याचार का विनाश, ओज और उमंग – उदा. ‘साजि चतुरंग सैन, अंग में उमंग धरि…’ (भूषण); ‘चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी’ (सुभद्राकुमारी चौहान)।
प्रतीक और बिंब: जीत की रात – स्वतंत्रता की पहली रात; अचल दीपक – निरंतर जागरूकता; मशाल – स्वतंत्रता; छायाएँ – शत्रु के षड्यंत्र; जनगंगा – जनता।
रूपक: ‘युग की पतवार’, ‘जनगंगा’, ‘जीवन मुक्ता डोर’।
टेक: ‘पहरुए, सावधान रहना !’
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संकल्पना स्पष्ट कीजिए : (१) नये स्वर्ग का प्रथम चरण (२) विषम शृंखलाएँ (३) युग बंदिनी हवाएँ
(१) स्वतंत्रता मिलना – समृद्ध भारत की ओर पहला कदम। (२) गुलामी की कठोर बेड़ियाँ। (३) सदियों से बंधन में रही जनता की आकांक्षाएँ, जो अब आँधी बनकर चल रही हैं।
Q2. लिखिए : समाज की वर्तमान स्थिति।
शोषण के कारण समाज मृतप्राय है और देश (घर) कमजोर है; दुख की छाया अभी पूरी तरह मिटी नहीं है।
Q3. आशय लिखिए : ‘ऊँची हुई मशाल हमारी … कमजोर हमारा घर है।’
स्वतंत्रता की मशाल ऊँची हुई है, पर आगे का मार्ग कठिन है।
शत्रु चला गया, पर उसके षड्यंत्रों की छाया का डर है।
शोषण के कारण समाज कमजोर है।
इसलिए देशवासियों को सावधान और जागरूक रहना होगा।
Q4. स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ समझते हुए गीत का रसास्वादन कीजिए।
रचनाकार और रचना: गिरिजाकुमार माथुर, ‘पंद्रह अगस्त’ (गीत)।
पसंद की पंक्ति: ‘आज जीत की रात पहरुए, सावधान रहना !’
पसंद का कारण: उल्लास के साथ कर्तव्य का बोध – ओजपूर्ण टेक।
केंद्रीय भाव: स्वतंत्रता का अर्थ केवल शासन बदलना नहीं, शोषित समाज का उत्थान और राष्ट्र की निरंतर रक्षा है; तत्सम शब्दावली, प्रतीक-बिंब, वीर रस।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘देश के विकास में युवकों का योगदान’।
युवा शक्ति ही देश की सबसे बड़ी पूँजी है।
शिक्षा, विज्ञान, उद्यमिता और खेल में आगे बढ़कर देश का नाम ऊँचा करें।
सामाजिक कुरीतियों और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाएँ।
मतदान, स्वच्छता और सेवा कार्यों में सक्रिय भागीदारी करें।
परीक्षा टिप
‘संकल्पना स्पष्ट कीजिए’ प्रश्न (नये स्वर्ग का प्रथम चरण, विषम शृंखलाएँ, युग बंदिनी हवाएँ) और वीर रस का उदाहरण अवश्य तैयार रखें; तार सप्तक के कवियों के नाम याद रखें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 4
मेरा भला करने वालों से बचाएँ
संक्षिप्त सार
मेरा भला करने वालों से बचाएँ डॉ. राजेंद्र सहगल का व्यंग्य लेख है। लेखक कहते हैं कि आजकल हर कोई उनका ‘भला’ करना चाहता है – अखबार के साथ आने वाले पैंफलेट, ‘एक के साथ एक मुफ्त’ वाली दुकानें, क्रेडिट कार्ड और लोन वाले, योग वाले, फिल्म टिकट के साथ महँगा खाना, मॉल की सेल, ब्यूटी पार्लर और मोबाइल फोन। ‘मुफ्त’ और ‘आपके फायदे’ के नाम पर ये सब असल में अपना फायदा देखते हैं। लेखक इस बाजारवाद और उपभोक्ता को फँसाने की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य करते हैं।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: डॉ. राजेंद्र सहगल (जन्म २४ अगस्त १९५३) – दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए., पीएच.डी.; बैंक में उपप्रबंधक; आकाशवाणी पर वार्ताएँ और फीचर लेखन; लगभग पचास व्यंग्य लेख प्रकाशित।
प्रमुख कृतियाँ: ‘हिंदी उपन्यास’, ‘तीन दशक’ (शोध प्रबंध); ‘असत्य की तलाश’, ‘धर्म बिका बाजार में’ (व्यंग्य संग्रह)।
विधा – व्यंग्य: विसंगतियों, कुरीतियों पर हास्य के साथ चोट करने वाली गद्य विधा। अन्य व्यंग्यकार – हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, के.पी. सक्सेना।
अखबार के साथ इतने पैंफलेट आते हैं कि उन्हें पढ़ो तो अखबार पढ़ने का समय नहीं बचता।
लोग पैसे की बात नहीं करते – बस फार्म भर दीजिए, किस्तों में पता ही नहीं चलेगा; क्रेडिट कार्ड वाला फ्री डेबिट कार्ड, गाड़ी वाला लोन के कागज साथ दे रहा है।
साबुन माँगो तो चार टिकियाँ, जिसमें एक मुफ्त; ‘ऐसी मिठाई जिसमें मीठे का असर न हो’।
योग वाले: पार्क में घेर लेते हैं; ठहाके लगाने वालों के दायरे में शामिल हुए तो पता चला कि ठहाकों का आधार चुटकुले थे – लेखक का मोह भंग हो गया।
अखबार के दफ्तर के दो युवा: फिल्में दिखाने के नाम पर हस्ताक्षर लेने लगे – असल में विदेशी बैंक के कॉन्ट्रैक्ट के तहत क्रेडिट कार्ड बनवाने का लक्ष्य पूरा करना था।
सिनेमा: टिकट के साथ खाना जोड़ दिया जाता है – ‘आधे पैसे चार्ज करते हैं’; १० रुपये का पॉपकॉर्न १०० में खाकर भी एहसान मानना पड़ता है।
मॉल की सेल: विक्रेता कहता है – ‘मैं भारत माँ का सपूत हूँ, धरती का कर्ज उतार रहा हूँ’ – पर बेचता सेकंड का सस्ता माल।
ब्यूटी पार्लर: नाखून कटवाने गए, वह फेशियल करके ‘फेस वैल्यू’ बढ़ाना चाहता है।
मोबाइल: लोग मिलकर कम, फोन पर ज्यादा बात करते हैं; ‘जो हमारा शुभ कर पाए, उसे ही शुभकामनाएँ’ – स्वार्थी रिश्ते।
लेखक की गुहार – मुझे अपना भला नहीं करवाना, ऐसे ही ठीक हूँ; भला करने वालों से बचाएँ।
व्यंग्यात्मक प्रयोग: ‘जन कल्याण के लिए लाई गई स्कीम’, ‘भारत माँ का सपूत’।
रस के उदाहरण: वीर – ‘चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी’; करुण – ‘आँचल में है दूध और आँखों में पानी’; भयानक – भय उत्पन्न करने वाला वर्णन (स्थायी भाव भय)।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. लिखिए : (१) लेखक की चिंता करने वाले (२) लेखक का योग के प्रति मोह भंग होने का कारण
(१) पैंफलेट वाले, क्रेडिट कार्ड-लोन वाले, योग संस्थान वाले, मॉल विक्रेता, ब्यूटी पार्लर वाले। (२) पार्क में ठहाके लगाने वालों का राज समझ आया कि उनकी हँसी का आधार केवल चुटकुले थे।
Q2. कारण लिखिए : लेखक की परेशानी के कारण।
हर कोई ‘फायदे’ के नाम पर कुछ न कुछ बेचना चाहता है।
अखबार के साथ ढेर सारे पैंफलेट आते हैं।
बिना माँगे क्रेडिट कार्ड, लोन और ‘फ्री’ स्कीमें थोपी जाती हैं।
Q3. पाठ के आधार पर ग्राहकों की वर्तमान स्थिति का चित्रण कीजिए।
ग्राहक ‘मुफ्त’ और ‘सेल’ के लालच में फँस जाता है।
बिना जरूरत के सामान खरीद लेता है।
महँगा सामान खरीदकर भी एहसान मानता है।
विज्ञापनों और विक्रेताओं की मीठी बातों से उसका निर्णय प्रभावित होता है।
Q4. अखबार के दफ्तर से आए दो युवाओं से मिले लेखक के अनुभव लिखिए।
उन्होंने कहा कि वे फिल्में दिखाकर लेखक की राय लेंगे। लेखक को व्यस्त देखकर हस्ताक्षर के लिए कागज आगे कर दिए। बाद में पता चला कि उनका किसी विदेशी बैंक से कॉन्ट्रैक्ट था और उन्हें क्रेडिट कार्ड बनवाने का लक्ष्य पूरा करना था।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘मुफ्त में मिलने वाली चीजों के प्रति लोगों की मानसिकता’।
‘मुफ्त’ शब्द लोगों को तुरंत आकर्षित करता है।
असल में उसकी कीमत मुख्य वस्तु में जोड़ दी जाती है।
लोग अनावश्यक खरीदारी करके पैसे और समय गँवाते हैं।
जागरूक उपभोक्ता बनकर जरूरत और गुणवत्ता देखकर ही खरीदना चाहिए।
परीक्षा टिप
व्यंग्य के उदाहरण (पैंफलेट, ‘एक मुफ्त’, योग के ठहाके, दो युवा, भारत माँ का सपूत) क्रम से याद रखें; उपसर्ग-प्रत्यय वाले शब्द हर बार पूछे जाते हैं।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 5
भक्ति महिमा
संक्षिप्त सार
भक्ति महिमा में निर्गुण संत कवि दादू दयाल की साखियाँ हैं (‘संत दादू दयाल ग्रंथावली’ से)। इनमें बताया गया है कि माया में डूबा मन पत्थर बन जाता है और राम-नाम से पत्थर मन भी मक्खन-सा कोमल हो जाता है; अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते; वेद-पुराण पढ़ने से नहीं, प्रेम का एक अक्षर समझने से ज्ञान मिलता है; मनुष्य का शत्रु उसका अपना अहंकार है; ईश्वर सबमें बसता है, इसलिए किसी को दुख न दो।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: संत दादू दयाल (जन्म १५४४, अहमदाबाद, गुजरात; मृत्यु १६०३) – गुरु बुड्ढन; साँभर (राजस्थान) में स्थापित संप्रदाय ‘दादू पंथ’ कहलाया; कबीर की भाँति निर्गुण-निराकार उपासक; सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास का विरोध; निर्गुण संप्रदाय में कबीर के बाद अन्यतम स्थान।
प्रमुख कृतियाँ: ‘अनभैवाणी’, ‘कायाबेलि’।
काव्य प्रकार – साखी: ‘साक्षी’ का अपभ्रंश; दोहा छंद में; अर्थ – साक्ष्य, प्रत्यक्ष ज्ञान; नीति, ज्ञानोपदेश और व्यावहारिक ज्ञान; नाथ परंपरा में गुरु वचन, सूफी कवियों ने भी प्रयोग किया।
१. माया-रस पीने से मक्खन जैसा मन पत्थर हो गया; राम-रस लेने से पत्थर मन मक्खन हो गया।
२. जहाँ राम हैं वहाँ ‘मैं’ (अहंकार) नहीं, जहाँ ‘मैं’ है वहाँ राम नहीं – हृदय रूपी महल इतना बारीक है कि दो के लिए जगह नहीं।
३. दादू ध्यान से गाते हैं, वाणी ताल देती है, मन प्रेम से नाचता है और सामने दीनदयाल (ईश्वर) हैं।
४. जो (ईश्वर तक) पहुँचे, सबने एक ही बात कही; सब साधुओं का एक मत है, बीच वाले बारह रास्तों में भटकते हैं।
५-६. प्रेम की पाती कोई बिरला ही पढ़ता है; वेद-पुराण पढ़कर कागज काले करते-करते कितने मर गए – प्रिय (ईश्वर) का एक अक्षर पढ़ने वाला ही सुजान है।
७. मेरा बैरी मेरा ‘मैं’ है; मुझे कोई और नहीं मारता, मैं ही अपने को मारता हूँ – अहंकार मिटाकर मैं ‘मरजीवा’ (वैरागी) हो जाऊँ।
८. हे करतार, जिनकी तू रक्षा करता है वे उबर जाते हैं, जिन्हें तू छोड़ देता है वे संसार में डूब जाते हैं।
९-१०. किसी को दुख क्यों दें – साईं सबमें है, आत्मा एक ही है; संसार में दो अनमोल रत्न हैं – साईं और संतजन।
महत्वपूर्ण शब्द
पाहण – पत्थर; माखण – मक्खन
सुरति – याद, स्मरण
ठाम – स्थान
बाँचै – पढ़े
सुजान – ज्ञानी
मरजीवा – जीवित होते हुए भी (मोह से) मरा हुआ, वैरागी
रख्या – रक्षा
करतार – सृष्टिकर्ता
भाषा अध्ययन
बाबू साहब, ईश्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए।
उसे तो मछुए पर दया करनी चाहिए थी।
उसे तुम्हारी शक्ति पर विश्वास हो गया।
वह निर्भीक व्यक्ति देश में सुधार करता घूमता था।
मल्लिका ने देखा तो आँखें फटी रह गईं।
हमारी तो सबसे प्रीति है।
तुम झूठे साबित होगे।
यह काम आएगा।
वाक्य शुद्धि:
विरोधाभास/चमत्कार: ‘मैं ही मुझकौं मारता’, ‘मरजीवा’।
रूपक: ‘पाती प्रेम की’, ‘दादू महल बारीक है’।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. अंतर स्पष्ट कीजिए : माया रस – राम रस।
माया रस पीने से मक्खन जैसा कोमल मन पत्थर जैसा कठोर हो जाता है; राम रस (नामस्मरण) से पत्थर जैसा मन भी मक्खन जैसा कोमल हो जाता है।
Q2. ‘मैं ही मुझको मारता’ से तात्पर्य लिखिए।
मनुष्य का अहंकार ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है; उसे कोई दूसरा नहीं, उसका अपना अहंकार नष्ट करता है।
Q3. ‘संत दादू के मतानुसार ईश्वर सबमें है’ – दो पंक्तियाँ और भावार्थ।
‘काहै कौं दुख दीजिये, साईं है सब माहिं। दादू एकै आत्मा, दूजा कोई नाहिं।।’ – ईश्वर सबके भीतर है, सबकी आत्मा एक ही है; इसलिए किसी को दुख देना ईश्वर को दुख देना है। सबको समान मानकर प्रेम करना चाहिए।
Q4. ईश्वर भक्ति और प्रेम के आधार पर प्रथम छह साखियों का रसास्वादन कीजिए।
रचनाकार और रचना: संत दादू दयाल, ‘भक्ति महिमा’ (साखी)।
पसंद की पंक्ति: ‘एकै आखर पीव का, दादू पढ़ै सुजान।’
पसंद का कारण: शास्त्र-ज्ञान से बढ़कर प्रेम को महत्त्व देने वाला सरल, गहरा संदेश।
केंद्रीय भाव: नामस्मरण, अहंकार-त्याग और प्रेम ही भक्ति का मार्ग; सधुक्कड़ी (राजस्थानी मिश्रित) भाषा, दोहा छंद, रूपक-विरोधाभास; शांत और भक्ति रस।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।’
अहंकार से मनुष्य दूसरों को तुच्छ समझने लगता है।
वह सीखना और सुधरना बंद कर देता है।
रिश्ते टूटते हैं और अकेलापन बढ़ता है।
रावण जैसे उदाहरण बताते हैं कि अहंकार अंत में विनाश लाता है; विनम्रता ही उन्नति का मार्ग है।
परीक्षा टिप
साखी की परिभाषा, निर्गुण शाखा के संत कवि (कबीर, रैदास, दादू, नानक, सुंदरदास) और ‘मैं ही मुझकौं मारता’ का अर्थ अवश्य तैयार रखें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 6
बाल लीला
संक्षिप्त सार
बाल लीला में सूरदास के दो पद हैं (‘सूरसागर’ से)। पहले पद में बालक कृष्ण चाँद पाने का हठ करते हैं; यशोदा चाँद को बुलाती हैं और अंत में पानी से भरा बर्तन धरती पर रखकर उसमें चाँद की परछाईं दिखा देती हैं – कृष्ण हँसकर बार-बार उसमें दोनों हाथ डालते हैं। दूसरे पद में यशोदा सुबह कृष्ण को जगाकर कलेवा (नाश्ता) करने की मनुहार करती हैं और उनके सामने तरह-तरह के फल, मेवे, पकवान और अंत में पान रखती हैं। दोनों पदों में बाल हठ और माँ के वात्सल्य का सुंदर चित्रण है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: संत सूरदास (जन्म १४७८, सीही गाँव, दिल्ली के पास; मृत्यु १५८०) – आगरा-मथुरा के बीच यमुना किनारे गऊघाट पर रहे; वहीं गुरु वल्लभाचार्य से भेंट; अष्टछाप के सगुण भक्त कवि, जिनकी भक्ति में साख्य, वात्सल्य और माधुर्य भाव; कृष्ण की बाल लीलाओं और वात्सल्य का सजीव चित्रण।
प्रमुख कृतियाँ: ‘सूरसागर’, ‘सूरसारावली’, ‘साहित्यलहरी’।
काव्य प्रकार – पद: गेय शैली; दो परंपराएँ – संतों के ‘सबद’ और कृष्णभक्तों की पद शैली (आधार लोकगीत)।
पद १: यशोदा बार-बार पुत्र को समझाती हैं और चाँद को पुकारती हैं – आ चंदा, तुझे लाल बुला रहा है।
वह तुम्हें मधु, मेवा, पकवान, मिठाई खिलाएगा, खुद भी खाएगा; हाथों पर लेकर खेलेगा, धरती पर नहीं बैठाएगा।
यशोदा जल का बर्तन उठाकर कहती हैं – इसी में तू शरीर धरकर आ जा; फिर जलपात्र धरती पर रखकर कहती हैं – देखो, चाँद को पकड़ लाई।
सूरदास के प्रभु (कृष्ण) हँसकर मुस्कुराते हैं और बार-बार दोनों हाथ पानी में डालते हैं।
पद २: उठो श्याम, कलेवा करो; मनमोहन का मुख देखकर ही माँ जीती है।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 7
कलम का सिपाही
संक्षिप्त सार
कलम का सिपाही डॉ. सुनील केशव देवधर का रेडियो रूपक है, जो उपन्यास सम्राट प्रेमचंद पर केंद्रित है। इसमें ‘प्रथम स्वर’, ‘द्वितीय स्वर’ और तीन वक्ताओं (मधु, संजय, सुधीर) की चर्चा के माध्यम से प्रेमचंद के साहित्य, विचारों और उद्देश्य का परिचय दिया गया है। बीच में ‘नमक का दारोगा’ कहानी का नाट्य अंश (ईमानदार वंशीधर और रिश्वत देने वाले पंडित अलोपीदीन) भी है। प्रेमचंद किसान और मजदूर वर्ग के मसीहा, समाज सुधारक और कालजयी साहित्यकार के रूप में सामने आते हैं।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: डॉ. सुनील केशव देवधर (जन्म २१ जुलाई १९५६, छतरपुर, म.प्र.) – बी.सी.जे. (पत्रकारिता), एम.ए. (अर्थशास्त्र, हिंदी), बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से पीएच.डी.; रोचक रेडियो रूपक लेखन; अभिनय और संवाद लेखन से फिल्मों से जुड़े।
प्रमुख कृतियाँ: ‘मत खींचो अंतर रेखाएँ’ (काव्य संग्रह), ‘मोहन से महात्मा’ (रेडियो रूपक संग्रह) आदि।
विधा – रेडियो रूपक: नाटक से विकसित; किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है; सहज, प्रवाही, संवादात्मक प्रस्तुति; ध्वनि प्रभाव और संगीत का प्रयोग; उद्देश्य – जनमानस को विकास में सहयोगी बनने की प्रेरणा। योगदानकर्ता – विष्णु प्रभाकर, लक्ष्मीनारायण लाल, रेखा अग्रवाल, कन्हैयालाल नंदन, सोमदत्त शर्मा।
प्रेमचंद देहात में पले, गरीबी में जिए; उनकी रचनाओं में मुख्यतः ग्रामीण जीवन – ‘गोदान’, ‘कफन’, ‘ईदगाह’, ‘बूढ़ी काकी’।
‘प्रतिज्ञा’, ‘निर्मला’, ‘सेवासदन’ जैसे उपन्यास शहरी जीवन पर आधारित।
‘निर्मला’ में भारतीय नारी की समस्या – परंपराओं, रूढ़ियों, कर्मकांडों में जकड़ी स्त्री।
प्रेमचंद किसी एक वाद में बँधकर नहीं चले; वे वास्तविकता की ओर अग्रसर थे, इसलिए उन्हें वस्तुवादी भी कहा जा सकता है।
कृषक वर्ग की आर्थिक शोषण और सामाजिक अन्याय के प्रति घृणा उनकी कृतियों में झलकती है।
प्रेमचंद का व्यक्तित्व सबसे अधिक तब विकसित होता है, जब वे निम्न मध्यवर्ग और कृषक वर्ग का चित्रण करते हुए युग की प्रतिगामी शक्तियों का विरोध करते हैं और श्रेष्ठ विचारक व समाज सुधारक के रूप में प्रकट होते हैं।
युग चेतना के लिए ‘जागरण’ निकाला; विभिन्न भाषाओं के साहित्य को जोड़ने के लिए ‘हंस’ का प्रकाशन किया।
कला को वे सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त करने का साधन मानते थे, मनोरंजन का नहीं।
निष्कर्ष: प्रेमचंद का साहित्य ही नहीं, वे स्वयं भी कालजयी हैं।
महत्वपूर्ण शब्द
रूपक – नाटक का एक प्रकार; यहाँ रेडियो पर प्रस्तुत संवादात्मक कार्यक्रम
काल परिवर्तन: मछुआ नदी के तट पर पहुँचता है (सामान्य वर्तमान); वे वास्तविकता की ओर अग्रसर हुए (सामान्य भूत); बबन ने उसे सलाम किया था (पूर्ण भूत); हम स्वयं ही आपके पास आएँगे (सामान्य भविष्य)।
रूपक की तकनीक: ‘परिवर्तन सूचक ध्वनि प्रभाव’, ‘संगीत के ध्वनि प्रभाव से समाप्त’ – रेडियो के लिए मंच-निर्देश।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. प्रेमचंद की रचनाओं का वर्गीकरण कीजिए : कफन, प्रतिज्ञा, बूढ़ी काकी, निर्मला, नमक का दारोगा, गोदान, रंगभूमि, सेवासदन।
कहानी – कफन, बूढ़ी काकी, नमक का दारोगा। उपन्यास – प्रतिज्ञा, निर्मला, गोदान, रंगभूमि, सेवासदन।
Q2. प्रेमचंद का व्यक्तित्व अधिक विकसित होता है, जब –
(१) वे निम्न मध्यवर्ग और कृषक वर्ग का चित्रण करते हुए युग की प्रतिगामी शक्तियों का विरोध करते हैं। (२) वे श्रेष्ठ विचारक और समाज सुधारक के रूप में प्रकट होते हैं।
Q3. रूपक के आधार पर प्रेमचंद की साहित्यिक विशेषताएँ लिखिए।
ग्रामीण और कृषक जीवन का यथार्थ चित्रण।
नारी समस्या, शोषण और सामाजिक अन्याय का विरोध।
कला को समाज सुधार का साधन मानना।
किसी वाद से न बँधकर वास्तविकता की ओर बढ़ना; ‘हंस’ और ‘जागरण’ द्वारा युग चेतना।
Q4. रेडियो रूपक की विशेषताएँ लिखिए।
नाटक से विकसित, श्रव्य माध्यम के लिए लिखा जाता है।
सहज, प्रवाही, संवादात्मक भाषा।
ध्वनि प्रभाव, संगीत और विभिन्न स्वरों का प्रयोग।
किसी भी विषय, व्यक्ति या घटना पर; उद्देश्य जनजागृति।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा सफलता के सोपान हैं।’
‘नमक का दारोगा’ का वंशीधर रिश्वत ठुकराकर अपने कर्तव्य पर अडिग रहा।
ईमानदार व्यक्ति पर सब विश्वास करते हैं।
तात्कालिक नुकसान के बाद भी अंत में सम्मान और सफलता मिलती है।
भ्रष्टाचार-मुक्त समाज के लिए ईमानदारी सबसे जरूरी मूल्य है।
परीक्षा टिप
प्रेमचंद की कहानी-उपन्यासों का वर्गीकरण और रेडियो रूपक की विशेषताएँ पक्के प्रश्न हैं; भिन्नार्थक शब्दों की जोड़ियाँ भी याद रखें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 8
स्वागत है !
संक्षिप्त सार
स्वागत है ! मॉरिशस के प्रवासी कवि शाम दानीश्वर की कविता है। कवि दुनिया भर में बिखरे भारतीय मूल के भाइयों – विशेषकर गिरमिटिया मजदूरों की संतानों – का मॉरिशस की धरती पर स्वागत करते हैं। वे कहते हैं कि हम सब एक ही माँ के बालक हैं, जो अलग-अलग जहाजों पर चढ़कर अनेक देशों में बिखर गए; अब पुरानी दुखद कथा भूल जाओ। ‘लघु भारत’ मॉरिशस अब नैहर (मायके) जैसा है, जहाँ बिछड़े बंधु मिलेंगे। पत्थरों में प्राण डालकर ‘मारीच’ को मॉरिशस बनाने वाले गिरमिटियों के परिश्रम का गौरव भी कविता में है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: शाम दानीश्वर (जन्म फरवरी १९४३; मृत्यु २००६) – हिंदी अध्यापक; प्रवासी साहित्य में मॉरिशस के कवि के रूप में पहचान; परिजनों से विछोह, गुलामी का दंश और भविष्य के प्रति आशा उनके काव्य की विशेषता।
प्रमुख कृतियाँ: ‘पागल’, ‘कमल कांड’ (उपन्यास), काव्य संग्रह।
काव्य प्रकार – प्रवासी भारतीय हिंदी साहित्य: विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा हिंदी में रचा साहित्य; नीति-मूल्य, मिथक, इतिहास के माध्यम से भारतीयता की रक्षा; प्रवास की संस्कृति से परिचय। अन्य प्रवासी साहित्यकार – अभिमन्यु अनत, जोगिंदर सिंह कंवल, स्नेहा ठाकुर।
गिरमिटिया: परतंत्रता में अंग्रेजों ने अनुबंध (एग्रीमेंट/‘गिरमिट’) पर भारतीयों को फीजी, सूरीनाम, मॉरिशस, सेशल्स आदि में मजदूर बनाकर भेजा।
कवि सबका स्वागत करते हैं – एक ही माँ के बालक अनेक देशों में बिखरे हैं; कई युगों बाद मिलन हो रहा है; हम सब ‘जहाजिया भाई’ हैं।
कोई इस जहाज पर चढ़ा, कोई उस पर; लंगर पड़ा तो हक्के-बक्के – भाई-भतीजे कहाँ गए?
सलाह: वह पुरानी कथा और जहाजी कारनामे भूल जाओ; जो प्रारब्ध में था वही हुआ; रोने से क्या होगा।
डर: पानी के जहाज पर चढ़ने से अब डर लगता है – कहीं इतिहास फिर न दोहराए और हम फिर न बिखर जाएँ; इसलिए आसमान की राह (हवाई जहाज) से आओ।
मॉरिशस नैहर जैसा है – बाबुल के लोग वहीं मिलेंगे, देश-परदेश के नाम मिट जाएँगे।
‘परमिट’ (अनुबंध) पर दासता के कीचड़ में गिरे थे; कितने युग लगे पंकज (कमल) बनने में और ‘मारीच’ से मॉरिशस बनने में।
तब घास ही पत्थर थी – पत्थरों में प्राण हमने डाले (कठोर श्रम से बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया)।
भारत, नेपाल, श्रीलंका, फीजी, सूरीनाम, पाक, गयाना, दक्षिण अफ्रीका, यूके, यूएसए, कनाडा, फ्रांस, रियूनियन के सहोदर बंधुओ – इसे हिंद महासागर का ‘स्वर्ग’ कहते हैं; कल्पना भी हो तो तुम इसे स्वर्ग बना जाओ।
महत्वपूर्ण शब्द
लंगर – जहाज रोकने का लोहे का काँटा
पनिया जहाज – पानी पर चलने वाला जहाज
नैहर – मायका
बाबुल – पिता
प्रणयन – ले जाना, रचना
प्रारब्ध – भाग्य
पंक – कीचड़; पंकज – कमल
सहोदर – सगा भाई
भाषा अध्ययन
अलंकार: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्व; भेद – शब्दालंकार, अर्थालंकार, उभयालंकार।
शब्दालंकार: अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति।
अनुप्रास: एक वर्ण की आवृत्ति – ‘तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए’ (भारतेंदु); ‘चारु चंद्र की चंचल किरणें’ (गुप्त)।
वक्रोक्ति: श्रोता द्वारा वक्ता के कथन का चमत्कारपूर्ण भिन्न अर्थ लगाना – उदा. ‘मैं सुकुमारी नाथ बन जोगू…’ (तुलसीदास)।
Q1. उत्तर लिखिए : (अ) ‘स्वागत है’ काव्य में दी गई सलाह (आ) ‘मारीच’ से बना शब्द
(अ) पुरानी जहाजी कथा और दुखद स्मृतियाँ भूल जाओ, रोने से कुछ नहीं होगा। (आ) मॉरिशस।
Q2. प्रथम स्वागत करते हुए कवि ने कौन-सा विश्वास दिलाया?
हम सब एक ही माँ के बालक हैं, जो अनेक देशों में बिखर गए; आज कई युगों बाद हमारा मिलन हो रहा है।
Q3. आशय स्पष्ट कीजिए : ‘यह तो तब था, घास ही पत्थर / पत्थर में प्राण हमने डाले।’
जब गिरमिटिया मजदूर मॉरिशस पहुँचे, तब वहाँ की भूमि पथरीली और बंजर थी।
घास तक पत्थर जैसी कठोर थी।
उन्होंने कठोर परिश्रम से उस भूमि को उपजाऊ और जीवंत बनाया।
आज का समृद्ध मॉरिशस उन्हीं के श्रम का फल है।
Q4. गिरमिटियों की भावना और कवि की संवेदना समझते हुए रसास्वादन कीजिए।
रचनाकार और रचना: शाम दानीश्वर, ‘स्वागत है !’ (प्रवासी कविता)।
पसंद की पंक्ति: ‘कितने युग लगे पंकज बनने में, मारीच से मॉरिशस बनने में।’
पसंद का कारण: दासता के कीचड़ से कमल बनने का सुंदर प्रतीक।
केंद्रीय भाव: बिछड़े भारतीयों के प्रति आत्मीयता, विछोह का दर्द, परिश्रम का गौरव और विश्वबंधुत्व; सरल भाषा, भोजपुरी पुट (पनिया, नैहर, बाबुल), मुक्त छंद।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘विश्वबंधुत्व आज के समय की आवश्यकता’।
दुनिया आज एक ‘वैश्विक गाँव’ बन चुकी है।
आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, महामारी जैसी समस्याएँ मिलकर ही सुलझ सकती हैं।
भारत की ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना इसका आधार है।
आपसी सम्मान और सहयोग से ही शांति और प्रगति संभव है।
परीक्षा टिप
‘गिरमिटिया’ की टिप्पणी, प्रवासी साहित्य की विशेषताएँ और शब्दालंकार (अनुप्रास, वक्रोक्ति) के उदाहरण अवश्य याद रखें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 9
तत्सत
संक्षिप्त सार
तत्सत जैनेंद्र कुमार की प्रतीकात्मक कहानी है। एक गहन वन में दो शिकारी एक बड़े बरगद (बड़ दादा) की छाँह में बैठकर ‘कैसा भयानक वन है’ कहते हैं। उनके जाने के बाद पेड़-पौधे और जीव-जंतु – शीशम, बाँस, बबूल, सिंह, साँप, घास आदि – सोच में पड़ जाते हैं कि ‘वन’ क्या है और कहाँ है; कोई उसे पहचान नहीं पाता। अंत में शिकारी बताते हैं कि तुम सब मिलकर ही वन हो। बड़ दादा को अनुभूति होती है कि अंश में ही संपूर्ण है – ‘वह है, वह है।’ कहानी व्यक्ति और समष्टि (अंश और पूर्ण) के संबंध का दार्शनिक सत्य बताती है।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: जैनेंद्र कुमार (जन्म २ जनवरी १९०५, अलीगढ़, उ.प्र.; मृत्यु १९८८) – प्रारंभिक शिक्षा ऋषभ ब्रह्मचर्याश्रम, हस्तिनापुर; १९२० में असहयोग आंदोलन के कारण काशी हिंदू विश्वविद्यालय की पढ़ाई छोड़ी; हिंदी उपन्यास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक; पद्मभूषण से सम्मानित।
प्रमुख कृतियाँ: ‘त्यागपत्र’, ‘कल्याणी’ (उपन्यास); ‘पाजेब’, ‘वातायन’, ‘नीलम देश की राजकन्या’ (कहानी संग्रह); ‘पाप और प्रकाश’ (नाटक); ‘मेरे भटकाव’, ‘ये और वे’ (संस्मरण)।
विधा – प्रतीकात्मक कहानी: प्रतीकों के माध्यम से गहरे विचार की अभिव्यक्ति।
दो पुराने शिकारी घने जंगल से डरकर कहते हैं – ‘ओह, कैसा भयानक वन है!’
शीशम कहता है – ये लोग ओछे रहते हैं, ऊँचे नहीं उठते; बड़ दादा – इनमें हमारी तरह जड़ें नहीं होतीं।
बाँस, बबूल, साल, सेमर, सिरस – सब पूछते हैं कि ‘वन’ नामक जानवर कैसा है; किसी ने उसे नहीं देखा।
सिंह: दहाड़कर चुनौती देता है – या वन है या मैं हूँ; कोई वन सामने नहीं आता।
साँप: धरती के सारे गर्त जानता है, पर कहता है – वन फर्जी है, ऊपरी और उथली बात है।
घास: सब कहीं व्याप्त है, फिर भी वन को नहीं जानती।
जवानों के कहने पर ‘वन के न होने’ का फैसला पास हो जाता है।
शिकारी फिर आते हैं; बड़ दादा उनकी रक्षा करते हैं और पूछते हैं – वन कहाँ है? शिकारी कहते हैं – ‘हम सब जहाँ हैं, वहीं तो वन है’; ‘यह सब कुछ ही वन है’; ‘आप लोग सभी वह हो।’
जीव क्रोधित होते हैं – तुम झूठे हो, धोखेबाज! शिकारी कहते हैं – भोले प्राणियों को भुलावे में कैसे रखूँ।
एक शिकारी बड़ दादा पर चढ़कर नए पत्तों की जोड़ी को पुचकारता है; पत्तों में चैतन्य भर आता है – उन्होंने खंड में कुल (संपूर्ण) देख लिया।
बड़ दादा की समाधि टूटती है – उन्हें अपने चरमशीर्ष से अनुभूति मिलती है: ‘वह है, वह है।’ (तत्सत = वह सत्य है)
महत्वपूर्ण शब्द
तत्सत – वह सत्य है (परम सत्य)
दहशत – डर
ओछे – छोटे, संकीर्ण
तुमुल – भयंकर, जोर का
गर्त – गड्ढा
उद्ग्रीव – गर्दन उठाए हुए
खंड / कुल – अंश / संपूर्ण
चरमशीर्ष – सबसे ऊँचा भाग
भाषा अध्ययन
प्रतीक: वन – समष्टि/परम सत्ता; पेड़-पशु – व्यक्ति (अंश); बड़ दादा – अनुभवी, ज्ञानी; शिकारी (मनुष्य) – ज्ञान का संवाहक; नए पत्ते – नई चेतना।
मानवीकरण: पेड़, पशु और घास का बोलना, बहस करना।
मुहावरे: पाला पड़ना – वास्ता होना; अकल गुम होना – घबरा जाना; जान से निराश होना – मरने का डर होना।
वाक्य शुद्धि (पाठ से): ‘हमारी तो सबसे प्रीति है’; ‘तुम झूठे साबित होगे’।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : वन के बारे में अपनी राय देने वाले।
शीशम, बाँस, बबूल, सिंह, साँप, घास (और बड़ दादा)।
Q2. कारण लिखिए : (१) बड़ दादा ने घास से वन के बारे में पूछने को कहा (२) साँप ने वन को फर्जी कहा
(१) घास की पहुँच सब कहीं है, वह हर जगह फैली रहती है। (२) साँप केवल धरती के गर्त (गहराई) जानता है; उसके लिए वन ऊपरी और उथली बात थी।
Q3. शिकारियों ने ‘वन’ को किस प्रकार समझाया?
हम सब जहाँ हैं, वहीं वन है।
सेमर, सिरस, साल, घास, सिंह, पानी, धरती, बड़ दादा – यह सब कुछ ही वन है।
वन कहीं दूर या बाहर नहीं, आप सभी वन हो।
भोले प्राणियों को भुलावे में रखना उन्हें स्वीकार नहीं था।
Q4. ‘तत्सत’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
‘तत्सत’ का अर्थ है – ‘वह सत्य है’।
सभी जीव अपने-अपने अहं और सीमित ज्ञान में वन को खोजते रहे।
अंत में बड़ दादा को अनुभूति हुई कि अंश में ही संपूर्ण है – ‘वह है, वह है।’
यही परम सत्य कहानी का केंद्र है, इसलिए शीर्षक सार्थक है।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र बनता है।’
जैसे पेड़-पौधे और जीव मिलकर वन बनाते हैं, वैसे ही व्यक्ति मिलकर समाज बनाते हैं।
हर व्यक्ति का आचरण समाज की पहचान बनाता है।
व्यक्ति अपने को अलग समझे तो एकता टूटती है।
सबके सहयोग और कर्तव्यपालन से ही सशक्त राष्ट्र बनता है।
परीक्षा टिप
प्रतीकों (वन, बड़ दादा, शिकारी, पत्तों की जोड़ी) का अर्थ और अंतिम वाक्य ‘वह है, वह है’ का आशय लिखना न भूलें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 10
गजलें
संक्षिप्त सार
इस पाठ में डॉ. राहत इंदौरी की दो गजलें हैं। पहली गजल ‘दोस्ती’ (‘दो कदम और सही’ से) में सच्ची मित्रता का अर्थ बताया गया है – दोस्त की बात मानना, उससे शिकवा करना और बुरा भी मानना, उसकी बातों से सबक लेना। दूसरी गजल ‘मौजूद’ (‘मौजूद’ संग्रह से) में आज के समाज के दोगलेपन पर व्यंग्य है – लोग जैसे होते हैं वैसे दिखाते नहीं; ज़हरीले यार, कागज़ की पोशाक पहनकर आने वाला कातिल, कपड़ों पर इत्र लगाकर दिमागों में दुर्गंध बोने वाले लोग।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: डॉ. राहत इंदौरी (जन्म १ जनवरी १९५०, इंदौर, म.प्र.) – उर्दू में एम.ए., पीएच.डी.; इंदौर विश्वविद्यालय में सोलह वर्ष उर्दू अध्यापन; त्रैमासिक ‘शाखें’ के दस वर्ष संपादक; मुशायरों को साहित्यिक स्तर देने वाले शायर; आधुनिक प्रतीक और बिंब।
प्रमुख कृतियाँ: ‘चाँद पागल है’, ‘रुत’, ‘मौजूद’, ‘धूप बहुत है’, ‘दो कदम और सही’ (गजल संग्रह)।
काव्य प्रकार – गजल: पहला शेर ‘मतला’, अंतिम शेर ‘मकता’; तुकांत शब्द ‘काफिया’, दोहराए जाने वाले शब्द ‘रदीफ’; हर शेर स्वयंपूर्ण; कसौटी – प्रभावोत्पादकता। अन्य गजलकार – गुलजार, नीरज, दुष्यंत कुमार, कुँअर बेचैन, राजेश रेड्डी।
दोस्ती: दोस्त है तो मेरा कहा मान, मुझसे शिकवा भी कर, बुरा भी मान – सच्ची दोस्ती में खुलापन।
दिल को सबसे बड़ा शत्रु (हरीफ) समझो और इसी पत्थर (संग) को खुदा भी मानो।
कागज़ों की खामोशी भी पढ़ो, हर अक्षर को आवाज़ मानो; आज़माने में क्या बिगड़ता है – मुझे भला मानकर देखो।
मेरी बातों से सबक लो, और उनका बुरा भी मानो; गम से बचने की तरकीब सोचो और गम को सहारा भी मानो।
मौजूद: शहर में तूफ़ान अक्सर आता है – देखें अब किसकी बारी है।
यारों के दाँत भी ज़हरीले हैं – पर हमें भी साँपों का मंतर आता है।
सूखे बादल (प्यासे होंठ) और आँखों में सैलाब का दृश्य – दुख का विरोधाभास।
भाषणों (तकरीरों) में सबका असली रूप खुल जाता है – जो अंदर पलता है वही बाहर आता है।
बस्ती में एक कातिल कागज़ की पोशाक पहनकर आता है; जो कपड़ों पर इत्र लगाकर आता है, वही दिमागों में दुर्गंध बोता है।
सूख चुका हूँ, फिर भी मेरे किनारे पर रोज़ समंदर पानी पीने आता है; जिन आँखों को सपने मिलते हैं, उनकी नींद गुम हो जाती है।
महत्वपूर्ण शब्द
हरीफ – शत्रु; संग – पत्थर
गाहे-गाहे – कभी-कभी
हर्फ – अक्षर; सदा – आवाज़
मंजर – दृश्य; तकरीर – बातचीत, भाषण
जौहर – कौशल, असलियत
तअफ्फुन – दुर्गंध; जहन – मस्तिष्क
साहिल – किनारा; मयस्सर – प्राप्त
भाषा अध्ययन
यमक अलंकार: एक ही शब्द की आवृत्ति हो और हर बार अर्थ भिन्न – उदा. ‘कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय’ (कनक = सोना, धतूरा)।
श्लेष अलंकार: एक शब्द एक ही बार आए, पर अनेक अर्थ दे – उदा. ‘रहिमन पानी राखिए…’ (पानी = चमक, इज्ज़त, जल)।
विरोधाभास (गजल में): ‘सूख चुका हूँ फिर भी मेरे साहिल पर, पानी पीने रोज समंदर आता है’; ‘उन आँखों की नींदें गुम हो जाती हैं, जिन आँखों को ख्वाब मयस्सर आता है।’
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 11
महत्त्वाकांक्षा और लोभ
संक्षिप्त सार
महत्त्वाकांक्षा और लोभ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का वैचारिक निबंध है। लेखक कहते हैं – बड़ों में जो महत्त्वाकांक्षा कहलाती है, वही छोटों में लोभ कहलाती है। मछुवा-मछुवी की पुरानी कथा के माध्यम से वे बताते हैं कि मछुवे ने एक छोटी मछली की जान बचाई; मछुवी के कहने पर मछली ने घर, धन और राजकीय वैभव दिया, पर जब मछुवी ने सूर्य-चंद्र-मेघ पर आज्ञा चलाने की इच्छा की, तो मछली ने रुष्ट होकर उन्हें फिर झोंपड़ी में भेज दिया। लेखक का मौलिक निष्कर्ष है कि दोष मछुवी का नहीं, मछली का है – उसने इच्छाएँ जगाईं और उपकार भूलकर अभिशाप दे दिया।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (जन्म २७ मई १८९४, खैरागढ़, छत्तीसगढ़; मृत्यु १९७१) – निबंधों में जीवन की सच्चाइयों की सरल अभिव्यक्ति; नाटकों-सी रमणीयता और कहानी-सी मनोरंजकता।
प्रमुख कृतियाँ: ‘पंचपात्र’, ‘पद्यवन’, ‘कुछ’, ‘और कुछ’ (निबंध संग्रह); ‘कथा चक्र’ (उपन्यास); ‘हिंदी साहित्य विमर्श’, ‘विश्व साहित्य’ (समीक्षा)।
विधा – निबंध: ‘गद्य की कसौटी’; लक्षण – स्वच्छंदता, सरलता, आडंबरहीनता, आत्मीयता, आत्मनिष्ठ दृष्टिकोण। प्रमुख निबंधकार – रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, विद्यानिवास मिश्र।
मछुवा-मछुवी टूटी झोंपड़ी में रहते, वर्तमान में व्यस्त; न आशा, न लालसा।
गड्ढे में लताओं में फँसी छोटी मछली को मछुवे ने छुड़ाया, फिर बर्तन में पानी भरकर नदी तक पहुँचाया; रोज उसके पास बैठता, आटे की गोलियाँ खिलाता।
मछुवी ने कहा – वह कोई देवी है, कुछ माँगो। क्रम से माँग: अच्छा घर → धन → राजकीय वैभव (महल, बाग, नौकर, राजशक्ति) → सूर्य, चंद्र, मेघ उसकी आज्ञा मानें।
मछुवा हिचकिचाया – ‘जो है, वही बहुत है’, पर मछुवी ने न सुनी।
अंतिम माँग पर मछली रुष्ट – ‘जा-जा, अपनी उसी झोंपड़ी में रह।’
लेखक का मत: मछुवी ने मानव स्वभाव के अनुसार किया – अप्राप्य के लिए व्यग्रता और प्राप्त से विरक्ति स्वाभाविक है।
मछली ने दैवी स्वभाव के विरुद्ध किया – उसे पहले ही अपनी शक्ति की सीमा बतानी थी; उपकार भूलकर राजा से भिक्षुक बना देना उचित नहीं; उसमें त्याग, प्रेम, क्षमा, दया नहीं।
हम अपने दोष छिपाकर दूसरों पर दोषारोपण करते हैं; उपकार और सेवा एक बात है, लेन-देन दूसरी।
महत्वपूर्ण शब्द
महत्त्वाकांक्षा – बड़ा बनने की इच्छा
लोभ – लालच
रुष्ट – नाराज
व्यग्रता – अधीरता
मनोरथ – इच्छा
विरक्ति – उदासीनता
कृतघ्नता – किए हुए उपकार को भूल जाना
दोषारोपण – दोष लगाना
भाषा अध्ययन
काल परिवर्तन (भाषा अध्ययन): मछुवा नदी के तट पर पहुँचता है (सामान्य वर्तमान); उन्होंने वास किया → वे वास कर रहे हैं (अपूर्ण वर्तमान); आदमी डर गया → आदमी डर गया है (पूर्ण वर्तमान)।
मुहावरे/कहावतें: संतोषी सदा सुखी; लोभ पाप का मूल है; जितनी चादर उतने पाँव पसारना।
शैली: कथा के माध्यम से विचार; लेखक का मौलिक, चौंकाने वाला निष्कर्ष (‘दोष मछली का है’)।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. मछुवी की बढ़ती माँगों का क्रम (प्रवाह तालिका) लिखिए।
अच्छा घर → धन → राजकीय वैभव (महल, बाग, नौकर-चाकर, राजशक्ति) → सूर्य, चंद्र, मेघ उसकी आज्ञा मानें।
Q2. लेखक के अनुसार महत्त्वाकांक्षा और लोभ में क्या संबंध है?
बड़ों में जो महत्त्वाकांक्षा होती है, उसी को जब हम छोटे (क्षुद्र) लोगों में देखते हैं, तो उसे लोभ कह देते हैं।
Q3. लेखक मछली को दोषी क्यों मानते हैं?
उसने वरदान देकर मछुवी के मन में असीम इच्छाएँ जगाईं।
उसे पहले ही अपनी शक्ति की सीमा बता देनी चाहिए थी।
उसने मछुवे के उपकार को भुला दिया।
एक असंभव माँग पर सब कुछ छीनकर अभिशाप दे दिया – उसमें दया, क्षमा, त्याग नहीं था।
Q4. ‘अप्राप्य की लालसा मानव स्वभाव है’ – पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
जब तक कोई वस्तु नहीं मिलती, उसके लिए व्यग्रता रहती है।
मिलते ही उससे विरक्ति हो जाती है और नई इच्छा जागती है।
मछुवी की माँगें घर से शुरू होकर सूर्य-चंद्र तक पहुँच गईं।
इसलिए संतोष ही सुख का आधार है।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘संतोषी सदा सुखी’।
इच्छाएँ अनंत हैं, उनका अंत नहीं।
संतोष मन को शांति और स्थिरता देता है।
संतोष का अर्थ प्रयत्न छोड़ना नहीं, लालच छोड़ना है।
परिश्रम से जो मिले, उसमें प्रसन्न रहना ही सच्चा सुख है।
परीक्षा टिप
मछुवी की माँगों का क्रम और लेखक का निष्कर्ष (दोष मछली का – उपकार भूलना, इच्छा जगाना) सबसे महत्त्वपूर्ण है; निबंध की विशेषताएँ भी याद रखें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 12
भारती का सपूत
संक्षिप्त सार
भारती का सपूत रांगेय राघव के जीवनीपरक उपन्यास का अंश है। अध्यापक रत्नहास एक विशेष कारण से लोगों को बुलाकर भारतेंदु हरिश्चंद्र के चित्र के सामने उपन्यास के कुछ हिस्से पढ़कर सुनाते हैं। इनमें भारतेंदु का बचपन, उनकी प्रतिभा, उनके खोले स्कूल, पत्नी मन्नो बीबी का चिंतन और अंत में बीमार भारतेंदु को देखकर मल्लिका का दुख दिखाया गया है। पाठ बताता है कि भारतेंदु कुल के कारण नहीं, अपनी प्रतिभा और देशसेवा के कारण महान बने।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: रांगेय राघव (जन्म १७ जनवरी १९२३, आगरा, उ.प्र.; मृत्यु १९६२) – आंचलिक, ऐतिहासिक और जीवनीपरक उपन्यासकार; लगभग सभी विधाओं में लेखन।
प्रमुख कृतियाँ: ‘लोई का ताना’, ‘भारती का सपूत’ (जीवनीपरक उपन्यास), ‘कब तक पुकारूँ’ (उपन्यास), ‘अंगारे न बुझे’ (कहानी संग्रह), ‘पिघलते पत्थर’ (काव्य संग्रह), ‘विरूढक’ (नाटक), ‘संगम और संघर्ष’ (आलोचना)।
विधा – उपन्यास: ‘उप’ = समीप, ‘न्यास’ = थाती। जीवन का बड़ा पटल दिखाने वाली गद्य विधा। जीवनीपरक उपन्यास में किसी व्यक्ति के जीवन को आधार बनाकर कल्पित प्रसंग जोड़े जाते हैं।
भारतेंदु को हिंदी गद्य का जनक / हिंदी का पिता माना जाता है; महाकवि रत्नाकर ने उन्हें ‘भारती का सपूत’ कहा।
जन्म १८५० में, मृत्यु १८८५ में – केवल ३४ वर्ष ४ महीने की आयु।
पाँच-छह वर्ष की उम्र से कविता; अपनी कविताओं की धाक ६ वर्ष की उम्र से जमा ली; पिता के ‘कच्छपकथामृत’ के सोरठे का अर्थ बालक हरिश्चंद्र ने बता दिया और महफिल ‘वाह-वाह’ कर उठी।
तेरह वर्ष में मन्नोदेवी से विवाह; सत्रह वर्ष में नौजवानों का संघ, अगले वर्ष वाद-विवाद सभा (डिबेटिंग क्लब – भाषा और समाज सुधार के लिए); अठारह वर्ष में काशी नरेश की सभा के प्रधान सहायक और ‘कविवचन-सुधा’ पत्र; मुफ्त दवा वाला होम्योपैथिक दवाखाना।
घर पर अंग्रेजी-हिंदी की पाठशाला खोली, क्योंकि मिशन के स्कूलों में भारतीय संस्कृति नहीं पढ़ाई जाती थी; बच्चों को मुफ्त किताबें, कलम और भोजन।
विरोधियों के बारे में वे कहते हैं – वे नासमझ नहीं, अशिक्षित हैं; बीज धूल में मिलकर ही पेड़ बनता है।
उन्होंने कुल के गर्व के बजाय देश के गर्व को दुहराया; उन्नीस वर्ष में ही महत्त्वपूर्ण व्यक्ति माने गए।
अंत में वक्ता कहता है – भारतेंदु के जलाए दीपक से असंख्य दीपक जल उठे।
महत्वपूर्ण शब्द
कौतूहल – जिज्ञासा
तारतम्य – सामंजस्य
तादात्म्य – अभिन्नता, एकरूपता
क्षीणकाय – दुर्बल, जर्जर शरीर
फक्कड़ – मस्तमौला, बेफिक्र
शाहखर्ची – खुले हाथ से खर्च करना
देदीप्यमान इंदु – चमकता हुआ चंद्रमा (‘भारतेंदु’ नाम का भाव)
मुहावरे: बाँछें खिलना – बहुत खुश होना; सिर खपाना – बहुत सोचना, परेशान होना; धाक जमाना – प्रभाव जमाना; आँखें फटी रह जाना – आश्चर्यचकित होना; एक-एक पैसा दाँत से पकड़ना – बहुत कंजूसी करना।
उपमा: ‘रक्तबीज की भाँति बार-बार उठता था’; ‘जैसे मैं काँच की बनी थी’।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. लिखिए : भारतेंदु का व्यक्तित्व (चार विशेषताएँ)।
कवि हृदय और प्रतिभाशाली; उदार दानी; निर्भीक देशभक्त और समाज सुधारक; शिक्षा प्रेमी (मुफ्त स्कूल, किताबें, भोजन)।
Q2. अंतर लिखिए : मिशन के स्कूल और भारतेंदु का भारतीय स्कूल।
मिशन के स्कूल – अंग्रेजों द्वारा खोले गए, भारतीय संस्कृति नहीं पढ़ाते। भारतेंदु का स्कूल – अंग्रेजी के साथ भारतीय संस्कृति भी पढ़ाता था, आधे से ज्यादा बच्चे बिना फीस पढ़ते थे।
Q3. ‘आप क्यों ऐसों के लिए सिर खपाते हैं’ – यहाँ ‘ऐसों’ किनके लिए आया है?
स्कूल के विरोधियों के लिए – निकाले गए मास्टर विश्वेश्वरप्रसाद, बाबू वेणीप्रसाद और उनका साथ देने वाले लोग, जिन्होंने स्कूल के काम में बाधा डाली।
Q4. ‘भारतेंदु ने कुल के गर्व के बजाय देश के गर्व को दुहराया’ – पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उस समय ऊँचे कुल का सम्मान था, पर भारतेंदु से भी धनी लोग प्रसिद्ध नहीं हुए। भारतेंदु ने अपने साहित्य में कुल-वर्ग का पोषण नहीं किया; उन्होंने स्कूल, दवाखाना, डिबेटिंग क्लब और पत्र के द्वारा देश की शिक्षा, भाषा और समाज के लिए काम किया। इसलिए वे प्रतिभा और देशप्रेम के कारण महान बने।
Q5. जानकारी दीजिए : भारतेंदु द्वारा रचित साहित्य।
नाटक – ‘भारत दुर्दशा’, ‘अंधेर नगरी’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’; पत्र-पत्रिकाएँ – ‘कविवचन-सुधा’, ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’ (बाद में ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’), ‘बालाबोधिनी’।
परीक्षा टिप
भारतेंदु की उम्र से जुड़ी घटनाएँ (५–६ वर्ष कविता, १३ विवाह, १७ संघ, १८ कविवचन-सुधा, १९ में प्रसिद्धि) क्रम से याद रखें – घटनाक्रम वाली कृति अक्सर पूछी जाती है।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 13
सहर्ष स्वीकारा है
संक्षिप्त सार
सहर्ष स्वीकारा है गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ की नई कविता है। कवि कहता है कि जीवन में जो कुछ भी मिला है – गरीबी, गंभीर अनुभव, विचार, दुख – सब उसने खुशी से स्वीकार किया है, क्योंकि जो कुछ उसका है वह उसके प्रिय को प्यारा है। प्रिय की ममता इतनी गहरी है कि कवि कभी उससे दूर अंधकार में खो जाना चाहता है, ताकि वह कमजोर न बने; पर वहाँ भी उसे प्रिय का ही सहारा दिखता है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ (जन्म १३ नवंबर १९१७, मुरैना, म.प्र.; मृत्यु १९६४) – स्नातकोत्तर शिक्षा नागपुर में; ‘हंस’ और ‘नया खून’ पत्रिका का संपादन; नई कविता के सबसे चर्चित कवि।
प्रमुख कृतियाँ: ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’, ‘भूरी-भूरी खाक धूल’ (काव्य संग्रह), ‘सतह से उठता आदमी’ (कहानी संग्रह), ‘विपात्र’ (उपन्यास), ‘कामायनी – एक पुनर्विचार’ (आलोचना)।
काव्य प्रकार – नई कविता: आज के मनुष्य की कड़वाहट, विषमता, संघर्ष और जीवन की विसंगतियों का चित्रण; मनुष्य अपना व्यक्तित्व बचाए रखना चाहता है।
कवि की गरीबी भी ‘गरबीली’ (स्वाभिमानी) है; उसके अनुभव, विचार-वैभव, दृढ़ता – सब मौलिक हैं, क्योंकि उनमें प्रिय की संवेदना जाग्रत है।
कवि के दिल में मानो मीठे पानी का झरना है – जितना प्रेम उँड़ेलता है, उतना फिर भर आता है।
जैसे चाँद रात भर धरती पर मुसकाता है, वैसे ही प्रिय का चेहरा कवि पर खिला रहता है।
प्रिय से घिरे रहने का ‘रमणीय उजाला’ अब कवि से सहा नहीं जाता; ममता की कोमलता भीतर पीड़ा देती है और आत्मा कमजोर हो गई है।
इसलिए कवि दंड माँगता है – ‘दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या’ या पाताली अँधेरे में लापता हो जाना चाहता है।
पर वहाँ भी प्रिय का ही सहारा है, क्योंकि कवि का सब कुछ प्रिय के ही कारण है।
केंद्रीय भाव: जीवन में जो मिले, उसे सहज और सानंद स्वीकारना; अत्यधिक मोह मनुष्य को कमजोर बनाता है।
महत्वपूर्ण शब्द
गरबीली – स्वाभिमानी
मौलिक – मूलभूत
अपलक – एकटक
संवेदन – अनुभूति
सोता – झरना
परिवेष्टित – चारों ओर से घिरा हुआ
विवर – बिल, गड्ढा
भवितव्यता – होनी, भविष्य
भाषा अध्ययन
उत्प्रेक्षा / उपमा: ‘मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात भर, मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है’ – प्रिय के चेहरे की तुलना चाँद से।
रूपक: ‘ममता के बादल’, ‘भीतर की सरिता’।
विरोधाभास: ‘गरबीली गरीबी’; ‘रमणीय उजेला सहा नहीं जाता’।
पुनरुक्ति: भर-भर, पल-पल, भूलूँ मैं भूलूँ मैं।
भाषा: मुक्त छंद, तत्सम शब्दों के साथ बोलचाल के शब्द (लापता, बरदाश्त)।
अलंकार पहचान (स्वाध्याय): ‘कूलन में केलिन में, कछारन में, कुंजों में’ – अनुप्रास (‘क’ की आवृत्ति); ‘जगती-जगती की मूक प्यास’ – यमक (जगती = जागती / संसार)।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. असत्य कथन सही करके लिखिए : ‘जो कुछ निद्रित अपलक है, वह तुम्हारा असंवेदन है।’
सही कथन – जो कुछ भी जाग्रत अपलक है, वह संवेदन तुम्हारा है।
Q2. कविता के आधार पर लिखिए : कवि के दिल की तुलना किससे की है और क्यों?
मीठे पानी के सोते (झरने) से; क्योंकि कवि जितना प्रेम उँड़ेलता है, उतना फिर से भर आता है।
Q3. ‘जो कुछ भी मेरा है वह तुम्हें प्यारा है’ – कवि का मंतव्य स्पष्ट कीजिए।
कवि अपने जीवन की हर चीज – गरीबी, अनुभव, विचार, सुख-दुख – को प्रिय की देन मानता है। प्रिय को कवि की हर चीज प्यारी है, इसलिए कवि भी बिना शिकायत सबको खुशी से अपनाता है। यहाँ प्रिय को माँ, प्रेमिका, जनता या ईश्वर – किसी भी आत्मीय शक्ति के रूप में समझा जा सकता है।
Q4. कवि अंधकार में लापता क्यों होना चाहता है?
प्रिय की अधिक ममता और आत्मीयता से कवि की आत्मा कमजोर और अक्षम हो गई है; भविष्य की चिंता उसे डराती है। अपने को मजबूत बनाने के लिए वह प्रिय से दूर अंधकार में जाना चाहता है – यह मोह से अलग होने की इच्छा है।
Q5. रसास्वादन कीजिए (मुद्दे)।
शीर्षक – सहर्ष स्वीकारा है; कवि – मुक्तिबोध; प्रकार – नई कविता, मुक्त छंद; केंद्रीय भाव – जीवन को सानंद स्वीकारना; अलंकार – उपमा, रूपक, विरोधाभास, पुनरुक्ति; भाषा – सरल, भावपूर्ण, प्रतीकात्मक; पसंद का कारण – जीवन की हर स्थिति अपनाने की प्रेरणा।
परीक्षा टिप
रसास्वादन में ‘गरबीली गरीबी’ (विरोधाभास) और ‘चाँद-चेहरा’ (उपमा) के उदाहरण जरूर लिखें; पंक्तियाँ एक-दो से ज्यादा न उतारें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 14
नुक्कड़ नाटक
संक्षिप्त सार
यह पाठ नुक्कड़ नाटक विधा का विशेष अध्ययन है। पहले विधा का परिचय है – नुक्कड़ नाटक क्या है, कहाँ खेला जाता है, इसकी विशेषताएँ और इतिहास। फिर अरविंद गौड़ के दो नुक्कड़ नाटक हैं – (अ) मौसम, जिसमें पानी की कमी, प्रदूषण, कचरा, कीटनाशक और बदलते मौसम जैसी पर्यावरण समस्याएँ हैं, और (आ) अनमोल जिंदगी, जिसमें रक्तदान के बारे में गलत धारणाएँ तोड़कर रक्तदान का महत्त्व बताया गया है।
मुख्य बिंदु
‘नुक्कड़’ = चौक या चौराहा; अंग्रेजी में स्ट्रीट प्ले (Street Play)।
सड़क के किनारे, चौक, मैदान, बस्ती या सोसाइटी के आँगन में – कहीं भी खेला जा सकता है।
उद्देश्य – आम आदमी की समस्याएँ आम भाषा में सीधे जनता तक पहुँचाना; यह एक सांस्कृतिक हथियार और जनआंदोलन का साधन है।
मूलतः आठवें दशक से लोकप्रिय (बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार, शोषण जैसी समस्याओं का दौर)।
विशेषताएँ: छोटा और सटीक; अंक या दृश्य परिवर्तन नहीं; परदा, मंचसेट, नेपथ्य की जरूरत नहीं; अभिनेता दर्शकों के बीच गोलाकार रंगस्थल बनाकर खेलते हैं – कलाकार और दर्शक में दूरी नहीं।
सफदर हाश्मी ने इसे देशव्यापी पहचान दिलाई; उनका जन्मदिन १२ अप्रैल – नुक्कड़ नाटक दिवस।
लेखक परिचय: अरविंद गौड़ (जन्म २ फरवरी १९६३, शाहदरा, दिल्ली) – मजदूर, किसान, आदिवासी आंदोलनों से जुड़े नुक्कड़ नाटककार; कृतियाँ – ‘नुक्कड़ पर दस्तक’ (संग्रह), ‘अनटाइटल्ड’, ‘आई विल नॉट क्राय’, ‘अहसास’ (एकल नाट्य); निर्देशित नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ का ४५० से अधिक बार मंचन।
मौसम: बारिश समय पर नहीं; किसान ने घर बेचकर कीटनाशक खरीदे; प्लास्टिक-कचरा नालियाँ रोकता है, इसलिए थोड़ी बारिश में ‘पूरा शहर स्विमिंग पुल’ बन जाता है; ए.सी. की गैस से ओजोन परत को खतरा; प्रकृति से छेड़छाड़ से ऋतुचक्र उलट गया।
अनमोल जिंदगी: हजारों लोग समय पर खून न मिलने से मरते हैं; लोग बहाने बनाते हैं – सुई से डर, खून देखकर चक्कर, कमजोरी का डर, लंबाई रुकने का डर; सूत्रधार बताता है – रक्तदान किसी की जिंदगी बचाना है, हम हर तीन महीने में रक्तदान कर सकते हैं।
महत्वपूर्ण शब्द
नुक्कड़ – चौक, चौराहा
सूत्रधार – नाटक को जोड़ने और समझाने वाला पात्र
कोरस – समूह में गाने/बोलने वाले कलाकार
रंगस्थल – अभिनय की जगह
नेपथ्य – मंच के पीछे का भाग
विडंबना – उलटी, दुखद स्थिति
ऋतुचक्र – मौसमों का क्रम
भाषा अध्ययन
संवाद शैली: छोटे, चुटीले, बोलचाल के वाक्य; व्यंग्य और हास्य (‘टायर ट्यूब भी हैं’)।
बोलियों का प्रयोग: पंजाबी लहजा (‘मेरा पुत्तर पहले ही इन्ना कमजोर हेगा’) – पात्रों को सजीव बनाता है।
अंग्रेजी शब्द: ए.सी., स्विमिंग पुल, ब्लड डोनेशन, न्यूज – आम जनता की भाषा।
गीत और दोहराव: ‘बात समझ ले, समझ ले’ जैसा दोहराव संदेश को याद रखने योग्य बनाता है।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : नुक्कड़ नाटक की विशेषताएँ।
छोटा और सटीक; खुली जगह में मंचन; साज-सज्जा और परदे की जरूरत नहीं; दर्शकों के बीच गोलाकार रंगस्थल; जनभाषा में सामाजिक समस्या।
Q2. कारण लिखिए : (१) किसान ट्यूबवेल नहीं लगवा पा रहा (२) थोड़ी बारिश में शहर स्विमिंग पुल बन जाता है।
(१) बिजली नहीं आती और पानी का स्तर बहुत नीचे चला गया है। (२) प्लास्टिक की थैलियाँ और कचरा नालियों-सीवर में जाकर पानी की निकासी रोक देते हैं।
Q3. ‘अनमोल जिंदगी’ नाटक में रक्तदान के बारे में कौन-सी गलत धारणाएँ दिखाई गई हैं?
सुई से डर, खून देखकर चक्कर आना, रक्तदान से कमजोरी आना, लंबाई रुक जाना जैसी बातें। नाटक बताता है कि ये भ्रम हैं; रक्तदान से किसी की जान बचती है।
Q4. नुक्कड़ नाटक और मंचीय नाटक में अंतर लिखिए।
मंचीय नाटक – सभागार, परदा, मंचसेट, ध्वनि संयोजन, लंबी अवधि, दर्शक दूर। नुक्कड़ नाटक – खुली जगह, बिना साज-सज्जा, छोटा, दर्शकों के बीच, सीधा संवाद।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘पर्यावरण बचाना हमारी जिम्मेदारी है’ – ‘मौसम’ नाटक के आधार पर अपने विचार लिखिए।
मुद्दे – प्लास्टिक का कम उपयोग, कचरा सही जगह डालना, पानी बचाना, कम कीटनाशक, ए.सी. का संयमित उपयोग, पेड़ लगाना; छोटी आदतें बदलने से ही मौसम का संतुलन लौटेगा।
परीक्षा टिप
विधा परिचय से सफदर हाश्मी, १२ अप्रैल और ‘आठवाँ दशक’ जैसे तथ्य याद रखें – साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान में पूछे जाते हैं।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 15
हिंदी में उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ
संक्षिप्त सार
हिंदी में उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ डॉ. दामोदर खड़से के भाषण का संकलित अंश है। वक्ता विद्यार्थियों को बताते हैं कि हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं, रोजगार की भाषा भी है। राजभाषा विभाग, अनुवाद, विज्ञापन, मनोरंजन, प्रकाशन, पत्रकारिता, विधि, तकनीक, पर्यटन, दूतावास और खेल कमेंटरी जैसे अनेक क्षेत्रों में हिंदी जानने वालों के लिए अवसर हैं। जरूरत है अपना क्षेत्र चुनने और भाषा पर प्रभुत्व पाने की।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: डॉ. दामोदर खड़से (जन्म ११ नवंबर १९४८, जिला कोरिया, छत्तीसगढ़) – स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा नागपुर विश्वविद्यालय से; ३० वर्ष बैंक में सहायक महाप्रबंधक (राजभाषा); कवि, कथाकार, अनुवादक; मराठी से २१ कृतियों का हिंदी अनुवाद।
प्रमुख कृतियाँ: ‘भटकते कोलंबस’, ‘पार्टनर’ (कहानी संग्रह); ‘काला सूरज’, ‘भगदड़’ (उपन्यास); ‘सन्नाटे में रोशनी’, ‘नदी कभी नहीं सूखती’ (कविता संग्रह)।
विधा – भाषण: लोगों तक अपने विचार पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम; उद्देश्य – श्रोताओं को प्रभावित करना।
राजभाषा क्षेत्र: हिंदी भारत संघ की राजभाषा; ‘संसदीय राजभाषा समिति’ का गठन; गृह मंत्रालय में राजभाषा विभाग; अनुवादक, लिपिक, राजभाषा अधिकारी, सहायक/उप/संयुक्त निदेशक जैसे पद; सौ से अधिक कर्मचारियों वाले कार्यालय में एक राजभाषा अधिकारी।
विज्ञापन: हिंदी कॉपी रायटरों की बड़ी माँग; एक-दो पंक्तियों में सटीक बात कहने का कौशल बहुत कमाई देता है।
मनोरंजन: टीवी-फिल्म में संवाद, पटकथा, गीत लेखन; धारावाहिकों का अनुवाद; कार्टून फिल्मों की डबिंग; कलाकारों को हिंदी उच्चारण सिखाना; रेडियो में रूपक, नाटक, धारावाहिक और समाचार लेखन।
प्रकाशन और पत्रकारिता: मुद्रित शोधक, संपादक, पत्रकार, स्तंभ लेखक।
अन्य क्षेत्र: UPSC और अन्य परीक्षाएँ हिंदी माध्यम में; न्यायालयों और संसद में हिंदी; विधि शब्दावली; अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा जैसे तकनीकी विभाग; संगणक के साथ प्रयोजनमूलक हिंदी; पारिभाषिक शब्दावली निर्माण।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर: लगभग १२७ देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है; कई दूतावासों में हिंदी विभाग।
पर्यटन, प्रलेख और खेल: टुरिस्ट गाइड; ‘डाक्यूमेंटरी लेखन’ (प्रलेख लेखन); क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी आदि की हिंदी कमेंटरी।
महत्वपूर्ण शब्द
राजभाषा – सरकारी कामकाज की भाषा
कॉपी रायटर – विज्ञापन की पंक्तियाँ लिखने वाला
मुद्रित शोधक – छपाई की गलतियाँ ठीक करने वाला (प्रूफ रीडर)
डबिंग – पार्श्व आवाज देना
प्रलेख लेखन – डाक्यूमेंटरी के लिए लेखन
प्रयोजनमूलक हिंदी – कामकाज और व्यवहार के लिए प्रयोग होने वाली हिंदी
पारिभाषिक शब्दावली – किसी विषय के निश्चित अर्थ वाले तकनीकी शब्द
भाषा अध्ययन
भाषण शैली: संबोधन (‘मित्रो’), प्रश्न पूछकर श्रोताओं को जोड़ना (‘क्या हिंदी को करियर के रूप में अपना सकते हैं?’), उदाहरण और सीधी बातचीत की भाषा।
हिंदी के रूप: जनभाषा, संपर्क भाषा, राजभाषा, विज्ञापन भाषा, मीडिया भाषा।
मुहावरा/लोकोक्ति: ‘आम के आम, गुठलियों के दाम’ – दोहरा लाभ (पाठ में विज्ञापन का उदाहरण)।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. मनोरंजन के क्षेत्र में हिंदी भाषा के माध्यम से रोजगार की संभावनाएँ लिखिए।
टीवी-फिल्मों के लिए पटकथा, संवाद और गीत लेखन; धारावाहिकों का अनुवाद; कार्टून फिल्मों की डबिंग; कलाकारों को हिंदी उच्चारण सिखाना; रेडियो के लिए रूपक, नाटक, धारावाहिक और समाचार लेखन।
Q2. तालिका बनाइए : हिंदी में रोजगार – विज्ञापन, अनुवाद, अंतर्राष्ट्रीय प्रयोग।
क्षेत्र
रोजगार
विज्ञापन
हिंदी कॉपी रायटर (विज्ञापन की पंक्तियाँ लिखना)
अनुवाद
सरकारी कार्यालय, बैंक, बहुभाषी चैनल, धारावाहिक
अंतर्राष्ट्रीय
विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्यापन, दूतावासों के हिंदी विभाग
Q3. ‘अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी रोजगार की भाषा बनती जा रही है’ – अपने विचार लिखिए।
वैश्वीकरण के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में हिंदी में प्रचार करती हैं; लगभग १२७ देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है; कई दूतावासों में हिंदी विभाग खुल रहे हैं; विदेशी पर्यटकों से संवाद के लिए हिंदी गाइड चाहिए। इसलिए हिंदी जानना देश-विदेश में अवसर खोलता है।
Q4. राजभाषा विभाग में कौन-कौन से पद होते हैं?
अनुवादक (वरिष्ठ, कनिष्ठ), लिपिक, राजभाषा अधिकारी, सहायक निदेशक, उप निदेशक, संयुक्त निदेशक, निदेशक।
Q5. हिंदी कमेंटेटर बनने के लिए कौन-से गुण आवश्यक हैं?
भाषा पर प्रभुत्व, धाराप्रवाह बोलना, खेल की पूरी जानकारी, अपनी विशेष शैली, समय के अनुसार आलंकारिक भाषा या काव्य पंक्तियों का प्रयोग।
परीक्षा टिप
इस पाठ के प्रश्न अक्सर ‘वर्गीकरण तालिका’ के रूप में आते हैं – हर क्षेत्र के कम-से-कम दो रोजगार याद रखें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 16
समाचार : जन से जनहित तक
संक्षिप्त सार
समाचार : जन से जनहित तक डॉ. अमरनाथ ‘अमर’ का लेख है। इसमें समाचारपत्र (पाठ्य), रेडियो (श्राव्य) और दूरदर्शन (दृक्-श्राव्य) – तीनों माध्यमों में समाचार कैसे तैयार होकर हम तक पहुँचता है, यह समझाया गया है। लेखक समाचार के स्रोत, समाचार वाचक के गुण, समाचार की भाषा के नियम और इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएँ भी बताते हैं। उनके अनुसार पत्रकारिता एक मिशन और जनहित की जिम्मेदारी है।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: डॉ. अमरनाथ ‘अमर’ (जन्म ७ अप्रैल १९५६, पटना, बिहार) – ‘मीडिया’ में पीएच.डी.; दूरदर्शन के सैकड़ों कार्यक्रमों के निर्माता-निर्देशक; मीडिया में लगभग ३५ वर्ष का अनुभव; दूरदर्शन के सलाहकार।
प्रमुख कृतियाँ: ‘स्पंदित प्रतिबिंब’ (काव्य संग्रह), ‘वक्त की परछाइयाँ’ (निबंध संग्रह), ‘पुष्पगंधा’ (कहानी संग्रह), ‘इलेक्ट्रॉनिक मीडिया : बदलते आयाम’।
विधा – लेख: किसी विषय को कई अनुच्छेदों में बाँटकर विस्तार से और रोचक ढंग से समझाना; रचनात्मक या सूचनात्मक हो सकता है।
भारत का पहला समाचारपत्र ‘बंगाल गजट’ (१७८०); रेडियो की शुरुआत १६ मई १९२४; दूरदर्शन की शुरुआत १५ दिसंबर १९५९।
आकाशवाणी का मूल मंत्र – ‘बहुजन हिताय: बहुजन सुखाय’; दूरदर्शन का – ‘सत्यं-शिवं-सुंदरं’।
तीनों माध्यमों के कार्यक्रम – मनोरंजन, ज्ञानवर्धन और सूचना।
प्रिंट मीडिया: एजेंसी और रिपोर्टर से समाचार → उपसंपादक लेखन → मुद्रित शोधन → प्रधान संपादक की स्वीकृति → पृष्ठ सेटिंग → छपाई।
दूरदर्शन: समाचार कक्ष, क्लिपिंग्स का संपादन, स्टूडियो में वाचन, पी.सी.आर. पैनल से निर्देश; पटकथा रेडियो से छोटी; टीम में प्रोड्यूसर, कैमरामैन, वीडियो संपादक, ग्राफिक आर्टिस्ट, मेकअप आर्टिस्ट आदि।
टेलीप्रॉम्प्टर से वाचक सामने देखते हुए पढ़ता है, इसलिए लगता है कि वह हमसे बात कर रहा है। आज वाचक एंकर, रिपोर्टर और साक्षात्कारकर्ता की भूमिका भी निभाता है।
समाचार एजेंसियाँ: रायटर, पी.टी.आई., यू.एन.आई., यूनीवार्ता।
रोजगार: प्रोड्यूसर और समाचार संपादक के लिए यू.पी.एस.सी. परीक्षा; कैमरामैन, वीडियो संपादक, ग्राफिक आर्टिस्ट के लिए डिग्री/डिप्लोमा; वाचक और संवाददाता के लिए स्वर परीक्षा और साक्षात्कार।
महत्वपूर्ण शब्द
पाठ्य / श्राव्य / दृक्-श्राव्य – पढ़ने / सुनने / देखने-सुनने का माध्यम
उपसंपादक – समाचार लिखने और संवारने वाला
मुद्रित शोधन – छपाई की गलतियाँ संकेतों से ठीक करना
टेलीप्रॉम्प्टर – कैमरे के सामने स्क्रीन, जिस पर समाचार दिखता है
प्रेस विज्ञप्ति – सरकार या संस्था द्वारा दी गई लिखित सूचना
ब्रेकिंग न्यूज – तत्काल घटी घटना का समाचार
बुलेटिन – निश्चित समय का समाचार कार्यक्रम (२, ५, १०, १५ मिनट)
भाषा अध्ययन
समाचार लेखन के सोपान: तथ्य एकत्र करना → प्रारूप बनाना → दिनांक, स्थान, वृत्तसंस्था का उल्लेख → अनुच्छेदों में लेखन → शीर्षक।
मुख्य अंग: शीर्षक (छोटा, आकर्षक, मूलभाव वाला) और आमुख (कब, कहाँ, कैसे, कौन, क्यों)।
आवश्यक गुण: लेखन कौशल, भाषाई ज्ञान, मानक वर्तनी, व्याकरण।
मुद्रित शोधन का नियम: पंक्ति के पहले आधे भाग की अशुद्धि का संकेत बाईं ओर हाशिये में, दूसरे आधे भाग का दाईं ओर।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. टेलीविजन के लिए समाचार वाचन की विशेषताएँ लिखिए।
प्रभावशाली व्यक्तित्व, सुयोग्य आवाज, शुद्ध उच्चारण, भाषा का ज्ञान, शब्दों का उचित उतार-चढ़ाव, प्रवाहमयी भाषा; टेलीप्रॉम्प्टर देखकर स्वाभाविक ढंग से पढ़ना।
Q2. रेडियो और टेलीविजन के लिए समाचार प्राप्त करने के साधन लिखिए।
समाचार एजेंसियाँ, संवाददाता, प्रेस विज्ञप्तियाँ, भेंटवार्ताएँ और साक्षात्कार, क्षेत्रीय जनसंपर्क अधिकारी, राजनीतिक दलों के प्रवक्ता, मोबाइल पर रिकॉर्ड की गई जानकारी।
Q3. समाचार के महत्त्वपूर्ण पक्ष स्पष्ट कीजिए।
भाषा सरल-सहज हो; वाक्य छोटे हों; क्षेत्र की भाषा की गरिमा रहे; किसी धर्म, जाति या वर्ग की भावना को चोट न पहुँचे; राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे पदों की गरिमा का ध्यान रहे; प्रस्तुति राष्ट्रहित, एकता और अखंडता को ध्यान में रखकर हो।
Q5. व्यावहारिक प्रयोग : अपने कनिष्ठ महाविद्यालय में मनाए गए ‘विज्ञान दिवस’ का समाचार लिखिए (रूपरेखा)।
शीर्षक – ‘विज्ञान दिवस पर विद्यार्थियों ने दिखाए अनोखे प्रयोग’; स्थान, दिनांक, वृत्तसंस्था; आमुख – कब, कहाँ, किसने आयोजन किया; मुख्य अतिथि, प्रदर्शनी, पुरस्कार; अंत में प्राचार्य का संदेश। भाषा छोटी, तथ्यपूर्ण और भूतकाल में।
परीक्षा टिप
समाचार लेखन में शीर्षक, स्थान-दिनांक और ‘कब-कहाँ-कौन-क्या-क्यों’ वाला आमुख न छोड़ें – इन्हीं पर अंक मिलते हैं।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 17
रेडियो जॉकी
संक्षिप्त सार
रेडियो जॉकी एक साक्षात्कार (भेंटवार्ता) है, जिसमें युवक प्रगल्भ रेडियो जॉकी अनुराग पांडेय से बातचीत करता है। अनुराग जी बताते हैं कि आर.जे. कौन होता है, इस क्षेत्र में प्रवेश कैसे मिलता है, कौन-से गुण और तैयारी चाहिए, तकनीक की क्या जानकारी जरूरी है और आर.जे. समाज में जागरूकता कैसे फैलाता है। अंत में वे रेडियो को कभी खत्म न होने वाला जनसंचार माध्यम बताते हैं और युवाओं को इस करियर के लिए प्रेरित करते हैं।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: अनुराग पांडेय (जन्म ११ जुलाई १९७४, सीधी, म.प्र.) – विज्ञान में स्नातक (देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर); मंच संचालन, पार्श्व आवाज, हिंदी डबिंग; रेडियो के लिए पच्चीस से अधिक नाटकों का लेखन।
विधा – साक्षात्कार (प्रश्नोत्तर रूप में बातचीत)।
‘जॉकी’ का प्रचलित अर्थ – राइडर (अश्वारोही), जो ध्यान रखे कि उसका घोड़ा सबसे आगे रहे। उसी तरह आर.जे. अपने चैनल और कार्यक्रम को सबसे आगे रखता है।
पहले रेडियो पर उद्घोषक (अनाउंसर) होते थे और काम ‘इन्फर्मेशन’ देना था; अब रेडियो इंफोटेनमेंट (इन्फर्मेशन + एंटरटेनमेंट) का माध्यम है।
प्रवेश प्रक्रिया: ऑल इंडिया रेडियो में कर्मचारी चयन आयोग और AIR की परीक्षा (स्नातक जरूरी), फिर साक्षात्कार; निजी चैनलों में कला और प्रतिभा देखी जाती है।
आवश्यक गुण: भाषा पर प्रभुत्व, देश-विदेश की जानकारी, पढ़ने की ललक, आवाज में उतार-चढ़ाव, वाणी में नम्रता, समय की पाबंदी, विशेष शैली, अनुवाद का ज्ञान।
तैयारी: भाषा को खूब सुनना, साहित्य और रोज समाचारपत्र पढ़ना, क्षेत्र का सांस्कृतिक-भौगोलिक-ऐतिहासिक ज्ञान, उच्चारण और आरोह-अवरोह पर ध्यान, साक्षात्कार लेने का कौशल।
अपनी बातचीत रिकॉर्ड करके सुनने से गलतियाँ पता चलती हैं – ‘स्वयं अपना गुरु’ बनना।
तकनीक: नए सॉफ्टवेयर, मशीनें और ध्वनिमुद्रण की जानकारी जरूरी।
सामाजिक भूमिका: पर्यावरण दिवस, पोलियो अभियान, जल साक्षरता, बाल मजदूरी, दहेज, कन्या साक्षरता, व्यसन मुक्ति, मतदान जागृति पर मनोरंजक ढंग से चर्चा; परीक्षा के तनाव में विद्यार्थियों का मनोबल बढ़ाना।
प्रसिद्ध नाम (पाठ के अनुसार): अमीन सयानी, काका कालेलकर, हरीश भीमानी आदि।
महत्वपूर्ण शब्द
साक्षात्कार – भेंटवार्ता, प्रश्नोत्तर रूप में बातचीत
उद्घोषक – घोषणा करने वाला (अनाउंसर)
इंफोटेनमेंट – जानकारी के साथ मनोरंजन
संवादक – अच्छी तरह बात पहुँचाने वाला (Communicator)
ध्वनिमुद्रण – आवाज रिकॉर्ड करना
आरोह-अवरोह – आवाज का उतार-चढ़ाव
संहिता – प्रसारण के लिए लिखी पटकथा (स्क्रिप्ट)
भाषा अध्ययन
मुहावरे (पाठ से): सोने पे सुहागा – अच्छी चीज और अच्छी हो जाना; एक ही सिक्के के दो पहलू – आपस में जुड़ी बातें; दिलों पर राज करना – बहुत लोकप्रिय होना।
उपमा: ‘कलाकार एक बीज के समान होता है’ – मौका (धूप, पानी, मिट्टी) मिलते ही पनपता है।
भाषा का मिश्र रूप: आर.जे. की भाषा में हिंदी-अंग्रेजी शब्दों का मेल (टेंशन, स्ट्रेस, ब्रेकिंग न्यूज)।
आर.जे. की भाषा: सहज, सरल, संतुलित, रोचक और प्रवाहमयी।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. आर.जे. के लिए आवश्यक गुण लिखिए।
भाषा पर प्रभुत्व, सामान्य ज्ञान, आवाज में उतार-चढ़ाव, वाणी में नम्रता, समय की पाबंदी, अपनी शैली, अनुवाद का ज्ञान, साक्षात्कार लेने की कुशलता, तकनीकी जानकारी।
Q2. संजाल पूर्ण कीजिए : प्रसारण से पूर्व रेडियो जॉकी के कार्य।
विषय की अधिक जानकारी एकत्र करना; पटकथा लिखना और याद करना; कार्यक्रम की योजना और पूर्वाभ्यास; तकनीकी और निर्मिति समूह के बीच तालमेल।
Q3. प्रसारण के समय आर.जे. क्या-क्या करता है?
कार्यक्रम का परिचय देना; अतिथियों का साक्षात्कार; गीत बजाना; ट्रैफिक, मौसम, ब्रेकिंग न्यूज जैसे संक्षिप्त समाचार; फिल्म समीक्षा; श्रोताओं से फोन पर बातचीत; जरूरत पर तुरंत गीत, कविता या किस्सा सुनाना; समय सारिणी के अनुसार कार्यक्रम चलाना और समस्या आने पर सँभालना।
Q4. सामाजिक सजगता निर्माण में आर.जे. का योगदान अपने शब्दों में लिखिए।
रेडियो हर घर तक, लोगों की अपनी भाषा में पहुँचता है। आर.जे. पर्यावरण, जल साक्षरता, दहेज, बाल मजदूरी, व्यसन मुक्ति, मतदान जैसे विषयों पर मनोरंजक ढंग से बात करता है, जिससे लोग सहज रूप से सीखते हैं। पाठ में प्रगल्भ के दोस्तों ने उत्साह से मतदान किया और कई व्यसनमुक्त हुए – यह इसका उदाहरण है।
Q5. व्यावहारिक प्रयोग : ‘जलसंवर्धन’ कार्यकर्ता के साक्षात्कार के लिए पाँच प्रश्न तैयार कीजिए।
(१) आपको जलसंवर्धन की प्रेरणा कहाँ से मिली? (२) आपके गाँव/क्षेत्र में पानी की मुख्य समस्या क्या है? (३) वर्षा जल संचयन के कौन-से सरल उपाय हैं? (४) लोगों को जोड़ने में क्या कठिनाइयाँ आईं? (५) विद्यार्थी पानी बचाने में कैसे योगदान दे सकते हैं?
परीक्षा टिप
साक्षात्कार संहिता लिखते समय परिचय, प्रश्नों का तर्कसंगत क्रम और अंत में धन्यवाद – तीनों जरूर लिखें।
११ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 18
ई-अध्ययन : नई दृष्टि
संक्षिप्त सार
ई-अध्ययन : नई दृष्टि एक संकलित आलेख है। इसमें बताया गया है कि इंटरनेट, मोबाइल, कंप्यूटर और टैब जैसे ई-संसाधनों ने पढ़ाई का तरीका बदल दिया है। आलेख ई-अध्ययन की संकल्पना, इंटरनेट का अर्थ, ई-पुस्तक और ई-ग्रंथालय, वेबसाइट पर पंजीकरण, ई-मेल के शब्द और ई-अध्ययन करते समय की सावधानियाँ समझाता है। निष्कर्ष है कि मोबाइल-तकनीक का सकारात्मक उपयोग करके हर विद्यार्थी को ई-अध्ययन अपनाना चाहिए।
मुख्य बिंदु
विधा – आलेख: वैचारिक गद्य रचना; किसी एक विषय पर तथ्यात्मक, विश्लेषणात्मक या विचारात्मक जानकारी।
हर चीज के सकारात्मक और नकारात्मक दो पहलू होते हैं; विद्यार्थी मोबाइल के ‘मोहजाल’ से निकलकर उसका सदुपयोग करें।
आज एक बटन दबाते ही ज्ञान का भंडार सामने आ जाता है; कंप्यूटर की विशेषता – ‘कम समय में बहुत सारा काम’।
इंटरनेट = इंटरनेशनल + नेटवर्क, अर्थात विश्वव्यापी ‘अंतरजाल’; दुनिया भर के कंप्यूटरों को जोड़कर डाटा का तुरंत आदान-प्रदान।
ग्रामपंचायत से लेकर राष्ट्रपति भवन तक इंटरनेट का उपयोग – ‘डिजिटल इंडिया’ की ओर कदम; अब हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं के सॉफ्टवेयर भी।
ई-अध्ययन दृक्-श्राव्य होने से रोचक है – मनोरंजन और ज्ञान का समन्वय।
ई-पुस्तक: कहीं भी पढ़ सकते हैं; फटने या गुम होने का डर नहीं; लौटाने की जरूरत नहीं।
ई-ग्रंथालय: वेबसाइट या ऐप से पुस्तकें, ई-वीडियो, वार्तापट; शुल्क सहित और निःशुल्क दोनों; हर समय उपलब्ध; देशी-विदेशी लेखकों का साहित्य।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, खेती, पर्यावरण, योग, व्यंजन – हर क्षेत्र की जानकारी इंटरनेट से।
वेबसाइट पंजीकरण: फॉर्म भरना → ई-मेल में आई लिंक पर क्लिक करके पुष्टि → यूजर नेम और पासवर्ड से लॉग इन।
वेबसाइट पते के अंत: .org – गैर-व्यावसायिक संस्था; .edu – शैक्षिक संस्थान; .com – व्यावसायिक संस्था।
ई-अध्ययन = ज्ञान-मनोरंजन-करिअर का त्रिवेणी संगम; समय, श्रम और धन की बचत, ज्ञान अद्यतन रहता है।
महत्वपूर्ण शब्द
अंतरजाल – इंटरनेट
ई-ग्रंथालय – ऑनलाइन पुस्तकालय
इन-बॉक्स – दूसरों से आए ई-मेल
सेंट आइटम्स – हमारे भेजे ई-मेल की प्रति
आउट बॉक्स – भेजा गया मेल, जो पहुँचने तक यहीं रहता है
अद्यतन – नवीनतम, ताजा
सत्यापन – सच्चाई की जाँच
भाषा अध्ययन
अंग्रेजी शब्दों के हिंदी पर्याय: Internet – अंतरजाल; E-library – ई-ग्रंथालय; Computer – संगणक; Software – सॉफ्टवेयर; Website – वेबसाइट (साइट)।
प्रत्यय ‘ई-’ से बने शब्द: ई-पुस्तक (ई-बुक), ई-मेल, ई-मैगजिन, ई-साहित्य, ई-लर्निंग, ई-कॉपी।
आलेख की भाषा: तथ्यपरक, सरल, तकनीकी शब्दों के साथ व्याख्या; उदाहरणों से बात स्पष्ट करना।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. विद्यार्थी जीवन में ई-अध्ययन का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
ई-अध्ययन से कठिन जानकारी आसानी से समझ में आती है; दृक्-श्राव्य होने से पढ़ाई रोचक बनती है; ई-पुस्तकें कहीं भी मिल जाती हैं; प्रतियोगी परीक्षाओं की तुरंत जानकारी मिलती है; ज्ञान अद्यतन रहता है और समय, श्रम व धन बचता है।
Q2. ई-ग्रंथालय की जानकारी लिखिए।
वेबसाइट या ऐप द्वारा पाठकों तक पुस्तकें पहुँचाने की सुविधा; शुल्क सहित और निःशुल्क दोनों रूपों में; ई-पुस्तकें, ई-वीडियो और वार्तापट उपलब्ध; दिन-रात कभी भी उपयोग; देश-विदेश के लेखकों का साहित्य; पुस्तक लौटाने की जरूरत नहीं।
Q3. ‘आज के विद्यार्थी अध्ययन के लिए कंप्यूटर पर निर्भर हैं’ – पाठ के आधार पर पुष्टि कीजिए।
विद्यार्थी कंप्यूटर को ज्ञान के स्रोत के रूप में देखते हैं; वेबसाइटों से हर विषय की जानकारी, ई-पुस्तकें, परीक्षा की तैयारी और प्रोजेक्ट के लिए सामग्री लेते हैं; ई-मेल से सूचना भेजते हैं। इसलिए उनकी बहुत-सी पढ़ाई कंप्यूटर के सहारे होती है – पर विवेक से उपयोग जरूरी है।
Q4. जोड़ियाँ मिलाइए : वेबसाइट पते का अंत और संस्था का प्रकार।
Q5. ई-अध्ययन करते समय कौन-सी सावधानियाँ रखनी चाहिए?
ई-साहित्य मूल रचना है या नहीं, यह देखना; प्राप्त सामग्री का सत्यापन करना; जरूरत हो तो वेबसाइट उपयोग की स्वीकृति लेना; प्रतिबंधित या विवादास्पद नाम, आशय और मानचित्रों का प्रयोग टालना; मोबाइल का सीमित और सकारात्मक उपयोग करना।
परीक्षा टिप
ई-मेल के शब्द (इन-बॉक्स, सेंट आइटम्स, आउट बॉक्स) और वेबसाइट के अंत (.org, .edu, .com) जोड़ी वाले प्रश्नों के लिए पक्के याद रखें।